उत्तर प्रदेश में पिछले साल करोड़ों रुपए के कोडीन कफ सिरप रैकेट का खुलासा हुआ था. तब माना गया था कि नशे के इस संगठित कारोबार को बड़ा झटका लगा है. हालांकि, अब जांच एजेंसियों के सामने एक और चिंताजनक ट्रेंड उभरकर आया है.
इस बार नशे का जरिया शराब, स्मैक या कोडीन नहीं बल्कि डॉक्टरों द्वारा मरीजों के इलाज के लिए लिखी जाने वाली प्रिस्क्रिप्शन दवाएं हैं. इन्हें बाजार में 'नीले कैप्सूल' के नाम से जाना जाने लगा है.
लखनऊ में पिछले दो सप्ताह के दौरान खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में करोड़ों रुपए की संदिग्ध और नशीली दवाएं पकड़ी गईं.
इनमें स्पाजमो प्रॉक्सीवान, प्रिगाबलिन, गैबापेंटिन और ट्रामाडोल जैसी दवाएं शामिल हैं. ये सभी दवाएं वैध चिकित्सा में उपयोगी हैं लेकिन बिना चिकित्सकीय निगरानी के इनका सेवन गंभीर लत और स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है.
जांच एजेंसियों का मानना है कि यह केवल अवैध बिक्री का मामला नहीं है बल्कि एक संगठित सप्लाई नेटवर्क काम कर रहा है जो दूसरे राज्यों से दवाएं लाकर उत्तर प्रदेश के बाजार तक पहुंचा रहा है. सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि इन दवाओं की पहुंच अब युवाओं तक तेजी से बढ़ रही है.
दर्द की दवा से नशे की लत तक
जिन दवाओं का उद्देश्य मरीज को राहत देना था, वही अब नशे का जरिया बन रही हैं. चिकित्सा विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रिगाबलिन और गैबापेंटिन मूल रूप से न्यूरोपैथिक दर्द और मिर्गी के इलाज में दी जाती हैं.
ट्रामाडोल मध्यम और गंभीर दर्द के लिए इस्तेमाल होने वाली ओपिओइड श्रेणी की दवा है. बता दें कि ओपिओइड दर्द कम करने वाली शक्तिशाली दवाएं हैं जो मुख्य रूप से मॉर्फिन, कोडीन और फेंटेनाइल जैसे प्रमुख रूपों में पाई जाती हैं.
स्पाजमो प्रॉक्सीवान कभी पेट दर्द और ऐंठन के इलाज में आमतौर पर लिखी जाती थी लेकिन इसके दुरुपयोग और लत की वजह से अधिकांश डॉक्टरों ने इसे लिखना लगभग बंद कर दिया है.
चिकित्सकों के अनुसार इन दवाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनका नशा धीरे-धीरे विकसित होता है. शुरूआत में मरीज या युवा केवल 'आराम' या 'रिलैक्स' महसूस करने के लिए इनका सेवन करते हैं. कुछ समय बाद शरीर इनका आदी हो जाता है. मात्रा बढ़ती जाती है और फिर बिना दवा के सामान्य रहना मुश्किल हो जाता है.
विशेषज्ञ बताते हैं कि इन दवाओं के अधिक सेवन से अत्यधिक सुस्ती, चक्कर, उत्साह की कृत्रिम अनुभूति, संतुलन बिगड़ना, याददाश्त पर असर और सांस लेने में परेशानी तक हो सकती है. ओवरडोज की स्थिति में मौत का भी खतरा रहता है.
इसी बढ़ते दुरुपयोग को देखते हुए केंद्र सरकार ने मई 2026 में प्रिगाबलिन को ड्रग्स रूल्स के तहत सख्त शेड्यूल H1 श्रेणी में शामिल कर दिया. इसका मतलब है कि अब इसकी बिक्री केवल वैध चिकित्सकीय पर्चे पर हो सकती है और प्रत्येक बिक्री का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है. इसके बावजूद यदि इतनी बड़ी मात्रा में यह दवा खुले बाजार में मिल रही है तो यह नियामक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है.
एफएसडीए की जांच में क्या मिला?
पूरे मामले की शुरुआत 8 और 9 जुलाई को हुई, जब एफएसडीए के ड्रग इंस्पेक्टर संदेश मौर्य और विवेक कुमार सिंह ने लखनऊ पुलिस के साथ अमीनाबाद स्थित एक अवैध गोदाम पर छापा मारा. वहां हजारों स्ट्रिप और कार्टन एलोपैथिक दवाओं के मिले, जिन्हें बिना वैध लाइसेंस के रखा गया था.
जांच के दौरान अधिकारियों ने कई नामी दवा कंपनियों के लेबल पर स्पेलिंग की गलतियां, प्रिंटिंग की खामियां और पैकेजिंग में असमानताएं देखीं. इससे शक गहरा गया कि नेटवर्क केवल प्रतिबंधित दवाओं की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि नकली ब्रांडिंग का भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
इसके बाद लखनऊ, बीकेटी और गोंडा समेत कई स्थानों पर लगातार छापेमारी हुई, जिसमें कुल मिलाकर लगभग 1.37 करोड़ रुपए की संदिग्ध दवाएं जब्त की गईं. जांचकर्ताओं का दावा है कि नेटवर्क राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था और इसमें बिना मंजूरी वाले गोदाम, फर्जी बिलिंग, नकली ब्रांडिंग तथा नियंत्रित दवाओं की अवैध आपूर्ति शामिल थी.
एफएसडीए ने अब तक आठ लोगों के खिलाफ कार्रवाई की है जिसमें एक आरोपी की गिरफ्तारी भी हुई है. इसके अलावा, कई आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं. लखनऊ मंडल के एफएसडीए अधिकारी बृजेश कुमार यादव के अनुसार, "बरामद कैप्सूल शहर के बाहर से लाए जा रहे थे और फुटकर दुकानों के माध्यम से बेचे जा रहे थे. हमारी जांच केवल जब्ती तक सीमित नहीं है. हम पूरे डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क की जांच कर रहे हैं ताकि सप्लाई चेन में शामिल हर व्यक्ति की पहचान की जा सके."
एफएसडीए आयुक्त रोशन जैकब ने भी स्पष्ट किया है कि नकली दवाओं और बिना वैध प्रिस्क्रिप्शन के बेची जा रही लत लगाने वाली दवाओं के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान जारी रहेगा.
क्रॉस-बिलिंग और फर्जी कंपनियां
इस पूरे मामले ने दवा कारोबार में मौजूद एक और गंभीर खामी को उजागर किया है. एफएसडीए की जांच में सामने आया कि कई कंपनियों ने आपस में ऐसी क्रॉस-बिलिंग कर रखी थी जिसमें कागजों पर लाखों रुपए की दवाओं की खरीद-बिक्री दिखाई गई. हालांकि, वास्तविक स्टॉक कहीं मौजूद नहीं था.
ड्रग इंस्पेक्टर नितिन कुमार सिंह द्वारा दर्ज एफआइआर के अनुसार, कई कंपनियों के नाम पर दवा कारोबार दिखाया गया लेकिन जब उनके पंजीकृत परिसरों की जांच हुई तो वहां दवाओं का कोई स्टॉक नहीं मिला.
कई रजिस्टर्ड मालिकों ने दावा किया कि वे स्वयं कारोबार नहीं चला रहे थे और उनकी जानकारी के बिना कंपनियों का संचालन दूसरे लोग कर रहे थे. जांच एजेंसियों को संदेह है कि यही फर्जी कंपनियां अवैध सप्लाई चेन को वैध दिखाने के लिए इस्तेमाल की जा रही थीं.
कागजों पर बिल बनते थे लेकिन दवाओं की वास्तविक आवाजाही किसी और रास्ते से होती थी. जुलाई महीने में नकली दवाओं और अवैध सप्लाई नेटवर्क के खिलाफ दर्ज यह पांचवीं एफआइआर है. इससे संकेत मिलता है कि समस्या किसी एक गोदाम या मेडिकल स्टोर तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे वितरण तंत्र में कई स्तरों पर गड़बड़ी मौजूद है.
युवाओं पर सबसे बड़ा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि इन दवाओं का नशा तेजी से इसलिए फैल रहा है क्योंकि यह पारंपरिक नशे से अलग दिखाई देता है. इनसे शराब जैसी गंध नहीं आती, इन्हें आसानी से जेब या बैग में रखा जा सकता है.
इनकी कीमत भी अपेक्षाकृत कम होती है और कई जगह बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के उपलब्ध हो जाती हैं. यही कारण है कि परिवार और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की नजर से भी इनका सेवन लंबे समय तक छिपा रह सकता है.
लखनऊ के चिकित्सकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने स्पाजमो प्रॉक्सीवान जैसी दवाएं लिखना लगभग बंद कर दिया है. यदि इसके बावजूद बड़ी मात्रा में ये दवा बाजार में उपलब्ध है तो इसका सीधा मतलब है कि कहीं न कहीं दवा वितरण व्यवस्था का दुरुपयोग हो रहा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार केवल पुलिस कार्रवाई से इस समस्या का समाधान संभव नहीं होगा. मेडिकल स्टोरों पर प्रिस्क्रिप्शन नियमों का सख्ती से पालन, शेड्यूल H1 दवाओं के रिकॉर्ड का नियमित ऑडिट, थोक विक्रेताओं की निगरानी और डॉक्टरों तथा फार्मासिस्टों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा.
साथ ही अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों को भी सतर्क रहना होगा. यदि कोई युवा बिना चिकित्सकीय सलाह के बार-बार ऐसी दवाओं का इस्तेमाल कर रहा है और अत्यधिक उनींदापन, व्यवहार में बदलाव या अचानक मानसिक सुस्ती दिखाई दे रही है तो इसे सामान्य तनाव या थकान समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

