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समुद्र में फंसे मछुआरों को बचाने में केरल क्यों है पीछे?

31 जुलाई को समुद्र में तीन मछुआरे लापता होने के बाद उनके गांवों में प्रदर्शन हो रहे हैं. लोगों का आरोप है कि सरकार ने समय पर बचाव अभियान शुरू नहीं किया

केरल में 2015 से अब तक 469 मछुआरे जान गंवा चुके हैं
अपडेटेड 13 अगस्त , 2026

हर साल मानसून के दौरान केरल के समुद्री तट पर कई मछुआरों की जान चली जाती है. इस बार भी 31 जुलाई की रात से तीन मछुआरे समुद्र में लापता हैं. मछुआरा समुदाय अब बस यही उम्मीद कर रहा है कि उनके साथ कोई अनहोनी न हुई हो.

लापता मछुआरों में तिरुवनंतपुरम जिले के जॉन मैथियास और शिजिन और कोल्लम जिले के गौतम कृष्ण शामिल हैं. इनकी तलाश लगातार की जा रही है, लेकिन अभी तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है.

मछुआरों के लापता होने के बाद उनके गांवों में लोगों का गुस्सा बढ़ गया है. कई जगह प्रदर्शन हुए, सड़कें जाम की गईं और सरकार पर आरोप लगाया गया कि उसने समय रहते बचाव अभियान शुरू नहीं किया. प्रदर्शन कर रहे लोगों का यह भी कहना है कि तटीय पुलिस ने मछुआरों को कोई अलर्ट नहीं दिया.

जॉन मैथियास की बेटी जिजी जॉन को अब अपने पिता की चिंता सता रही है. वे कहती हैं, "हमने अधिकारियों और तटीय पुलिस से मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन सरकार ने समय रहते बचाव अभियान शुरू नहीं किया. अगर कोस्ट गार्ड को तुरंत अलर्ट किया गया होता तो शायद मेरे पिता की जान बच सकती थी. पुलिस ने हमारे मछुआरों को भी समुद्र में जाकर तलाश करने की इजाजत नहीं दी."

10 अगस्त को गृह मंत्री रमेश चेन्निथला और मत्स्य पालन मंत्री वी.ई. अब्दुल गफूर, जिजी के घर पहुंचे थे. जिजी ने उनके सामने अपनी शिकायत रखी. उन्होंने कहा कि "हमें बहुत दुख हो रहा है. जब मछुआरे समुद्र में जाते हैं, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है."

इसी दिन मुख्यमंत्री सतीशन और वन मंत्री शिबू बेबी जॉन भी कोल्लम के नीनदाकरा पहुंचे. उन्होंने गौतम कृष्ण के परिवार से मुलाकात की और उनकी मां रेशमा को सांत्वना दी.

रेशमा ने मुख्यमंत्री के सामने हाथ जोड़कर कहा, "मेरी तरह की पीड़ा किसी की न सहनी पड़े. मेरा परिवार वो आखिरी परिवार होना चाहिए जिसने इस दुख का सामना किया है. कृपया ऐसा इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम बनाइए, जिससे मुसीबत में फंसे मछुआरों को जल्दी बचाया जा सके."

मुख्यमंत्री सतीशन ने कहा है कि मछुआरों को बचाने के लिए तेजी से कार्रवाई हो, इसके लिए मौजूदा प्रोटोकॉल की समीक्षा की जाएगी. हालांकि, उनकी सरकार को विपक्ष के नेता पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट के कई सवालों का सामना करना पड़ रहा है.

मत्स्य पालन विभाग के एक पूर्व सचिव ने नाम नहीं बताने की शर्त पर इंडिया टुडे से कहा कि बचाव व्यवस्था में कई कमियां हैं. उनके मुताबिक, समुद्र में होने वाली मौतों को कम करने के लिए तटीय बचाव व्यवस्था को बेहतर बनाने की जरूरत है.

उन्होंने यह भी कहा कि हादसे वाली जगहों पर न तो समुद्री एंबुलेंस हैं और न ही 24 घंटे काम करने वाली इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम. इसके अलावा, मछुआरों को पहले से अलर्ट करने के लिए स्थानीय स्तर पर मौसम की चेतावनी देने की व्यवस्था भी अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है.

केरल फिश वर्कर्स सॉलिडैरिटी फोरम के राज्य अध्यक्ष चार्ल्स जॉर्ज ने भी कहा कि सरकार की लापरवाही साफ नजर आती है. उनका कहना है कि मछुआरों को खोजने और बचाने के लिए जो सबसे जरूरी शुरुआती समय था, वह निकल गया.

मत्स्य पालन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में 55 मछुआरों की समुद्र में मौत हुई है और तीन मछुआरे लापता हुए हैं. 2015 से अब तक करीब 469 मछुआरों की जान समुद्र में जा चुकी है और 160 मछुआरे लापता बताए गए हैं.

हालांकि इसी दौरान 5,072 बचाव अभियानों के जरिए 47,773 मछुआरों को सुरक्षित बचाया भी गया है.

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