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कश्मीर की पहचान चिनार के पेड़ों पर क्यों मंडरा रहा खत्म होने का खतरा?

एशिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े चिनार के पेड़ों वाला कश्मीर अब इस शानदार पेड़ की घटती संख्या का सामना कर रहा है

चिनार का एक पेड़ (फाइल फोटो)
अपडेटेड 6 अक्टूबर , 2026

बडगाम के चट्टरगाम गांव में एक शांत परिसर में एशिया का सबसे पुराना चिनार का पेड़ खड़ा है. यह 650 साल से अधिक पुराना है. पेड़ की कई पुरानी शाखाएं प्राकृतिक रूप से सूखकर गिर चुकी हैं लेकिन बची हुई शाखाएं अब भी हरी हैं. 

जम्मू-कश्मीर सरकार ने मौजूदा विधानसभा के शरदकालीन सत्र के दौरान इस असाधारण तथ्य की पुष्टि की. वहीं एक वैज्ञानिक जनगणना ने इससे जुड़ी एक चिंताजनक तस्वीर भी सामने रखी है. कश्मीर के लैंडस्केप और सांस्कृतिक विरासत की पहचान बन चुका यह शानदार पेड़ लगातार कम हो रहा है. इसी सर्वेक्षण में कश्मीर के गांदरबल जिले में एशिया का सबसे बड़ा चिनार भी मिला है.

जम्मू-कश्मीर के वन, पारिस्थितिकी और पर्यावरण विभाग ने विधानसभा में बडगाम के विधायक आगा सैयद मुंतजिर मेहदी के सवाल के जवाब में कहा, "बडगाम के चट्टरगाम में स्थित चिनार का पेड़ एशिया का सबसे पुराना है. इसकी कुछ पुरानी और सूखी शाखाएं प्राकृतिक रूप से गिर चुकी हैं और चिनार का बचा हुआ हिस्सा हरा है."

जवाब में कहा गया कि सबसे पुराने चिनार की सुरक्षा और संरक्षण के लिए उसकी महत्वपूर्ण जड़ क्षेत्र (बफर जोन) के चारों ओर लोहे की बाड़ लगाई गई है. इसका उद्देश्य ‘मिट्टी के दबने और जड़ों के दम घुटने को रोकना’ है.

कश्मीर में चिनार के पेड़ों की गिनती हो रही है (फाइल फोटो)
कश्मीर में चिनार के पेड़ों की गिनती हो रही है (फाइल फोटो)

सरकार ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा को यह भी बताया कि श्रीनगर स्थित वन अनुसंधान संस्थान (FRI) के सर्वेक्षण में कश्मीर घाटी में 30,000 से अधिक चिनार के पेड़ों की पहचान हुई है. 

सुरक्षा प्रतिष्ठानों के भीतर उग रहे 6,000 से अधिक पेड़ों की अभी गिनती होनी बाकी है. हालांकि शोधकर्ताओं और अधिकारियों का कहना है कि पेड़ों की उम्र बढ़ने, बीमारियों, विकास कार्यों और जमीन के सिकुड़ते दायरे की वजह से लंबे समय से इनकी संख्या घट रही है.

चिनार (प्लेटानस ओरिएंटलिस) को स्थानीय तौर पर 'बोएन' या 'बुएन' कहा जाता है. इसको अपने पूरे भव्यत स्वरूप में आने में करीब 150 साल लगते हैं. कश्मीर में यह सिर्फ एक पेड़ नहीं है. यह सदियों से इस क्षेत्र की कविता, प्रकृति और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहा है और मजबूती, खूबसूरती और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक है.

घटती संख्या

हालिया सर्वेक्षण आधारित जनगणना में करीब 30,000 चिनार की पहचान हुई है. यह जनगणना 2021 की दूसरी तिमाही में शुरू हुई थी. इसके बावजूद दशकों से चिनार के पेड़ों की संख्या लगातार घटती रही है.

नवीनतम जनगणना से पहले शोधकर्ता अक्सर 2007 में प्रकाशित किताब 'द ट्रीज ऑफ आवर हेरिटेज' के आंकड़ों का हवाला देते थे. यह किताब वन विभाग के पूर्व सहायक वन संरक्षक मुहम्मद सुल्तान वाडू ने लिखी थी. कश्मीर में चिनार के पेड़ों की संख्या और उनके घटने की वजहों का ब्यौरा देते हुए वाडू ने प्रमुख जिलों में 2004 के अंत तक चिनार के पेड़ों की संख्या 17,124 बताई थी.

कश्मीर में चिनार के पेड़ों का एक डिजिटल एटलस तैयार करने के लिए पेड़ों पर QR कोड लगाए जा रहे हैं
कश्मीर में चिनार के पेड़ों का एक डिजिटल एटलस तैयार करने के लिए पेड़ों पर QR कोड लगाए जा रहे हैं

उन्होंने लिखा था, "हमने 34 साल की अवधि में 25,369 हरे-भरे विशाल पेड़ खो दिए हैं और हर साल पेड़ों की कमी की दर 1.77 प्रतिशत रही है." दोनों आंकड़ों को जोड़ने पर 1970 के दशक में कश्मीर में मौजूद चिनार के पेड़ों की कुल संख्या 42,493 थी, जिसमें जीवित और काटे गए दोनों पेड़ शामिल थे. अगर वाडू के आंकड़े सही हैं तो इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है.

पेड़ों की संख्या में गिरावट को स्वीकार करते हुए सरकार ने विधानसभा में दिए जवाब में इसके कई कारण गिनाए. इनमें पुराने पेड़ों का प्राकृतिक रूप से कमजोर होना और उम्र बढ़ना, बीमारियां और कीट, विकास कार्यों के लिए पेड़ों की कटाई, जमीन का सिकुड़ना और बढ़ती आबादी शामिल हैं. इन सभी कारणों ने चिनार के स्वास्थ्य और संख्या को प्रभावित किया है.

अगस्त 2020 में निधन हुए वाडू ने कहा था कि अगर पेड़ों के घटने की रफ्तार जारी रही तो उनका भविष्य बेहद चिंताजनक होगा. उन्होंने लिखा था, "अब तक हम हर साल करीब 746 चिनार के पेड़ खो चुके हैं. अगर पेड़ों के नष्ट होने की यह रफ्तार जारी रही तो अगले 22 वर्षों में हमारे पास मौजूद सभी पेड़ खत्म हो सकते हैं."

वाडू को बडगाम के सबसे पुराने चिनार की खोज और अपनी किताब में उसका दस्तावेजीकरण करने का श्रेय दिया जाता है. दुर्भाग्य से दशकों के दौरान अवैध रूप से या सरकारी आदेशों के तहत काटे गए चिनार के पेड़ों की संख्या का अब भी कश्मीर के पास कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है.

पेड़ों की गणना

यह कवायद कश्मीर में चिनार के पेड़ों की पहली वैज्ञानिक गणना है. इसे वन अनुसंधान संस्थान (FRI) ने एक विशेष परियोजना के तहत किया है. FRI में चिनार गणना के परियोजना समन्वयक सैयद तारिक ने इंडिया टुडे को बताया, "जम्मू-कश्मीर सरकार के शानदार चिनार के संरक्षण के लिए चलाए जा रहे 'डिजिटल ट्री आधार' कार्यक्रम के तहत अब तक 30,000 चिनार के पेड़ों की पहचान, सर्वेक्षण और भौगोलिक टैगिंग की जा चुकी है. उनका डेटा भी अपडेट किया गया है."

उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण किए गए 30,000 पेड़ों में से 10,000 पर विशेष स्प्रिंग लगी धातु से बनी क्यूआर आधारित डिजिटल प्लेट लगाई गई हैं. डिजिटल आधार में हर चिन्हित पेड़ की 25 विशेषताओं से जुड़ा डेटा दर्ज है. इसे चिनार ट्री रिकॉर्ड फॉर्म (CTRF-25) में दर्ज किया गया है.

तारिक ने बताया कि बाकी 20,000 पेड़ों को डिजिटल ट्री आधार देने की प्रक्रिया जारी है. इस डेटा को हर जिले के विरासत रजिस्टर में सुरक्षित रखा जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह काम पूरा होने के बाद कश्मीर के सभी चिनार के पेड़ों का एक डिजिटल एटलस तैयार हो जाएगा.

तारिक ने कहा कि इस कवायद को पूरा करने के लिए सरकार के उच्चतम स्तर से समर्थन और प्रोत्साहन जरूरी है. उन्होंने सुझाव दिया कि इस डेटा को सुरक्षित रखा जाए और अधिकारियों, शोधकर्ताओं तथा आम लोगों के लिए डिजिटल रूप से उपलब्ध कराया जाए. उन्होंने कहा, "इसके लिए चिनार के पेड़ को समर्पित एक वेबसाइट की जरूरत है. अगर हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए चिनार को बचाना है तो सरकार को इस दिशा में कदम उठाने होंगे."

एशिया का सबसे बड़ा चिनार

तारिक ने बताया कि दुनिया के 20 सबसे बड़े चिनार के पेड़ों में से 11 कश्मीर में हैं. यह इस पेड़ के असाधारण जैव विविधता मूल्य को दर्शाता है. उन्होंने कहा, "सर्वेक्षण में गांदरबल जिले में एशिया का सबसे बड़ा चिनार मिला है. इसकी परिधि 22.25 मीटर (73 फीट) और ऊंचाई 27 मीटर (88.5 फीट) है. बारामूला जिले के तंगमर्ग के कुंजर इलाके में स्थित एक और उल्लेखनीय चिनार की परिधि 19 मीटर और ऊंचाई 28 मीटर है. यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा चिनार है." उनके मुताबिक, "प्रभावशाली आकार वाले चिनार के अतिरिक्त पेड़ों की खोज से वैश्विक स्तर पर चिनार के संरक्षण में कश्मीर के महत्व की फिर से पुष्टि होती है."

कश्मीर के घने जंगलों में भी चिनार बचा हुआ है. सर्वेक्षण के दौरान बारामूला के उरी स्थित लिम्बर वन्यजीव अभयारण्य में 1,500 चिनार के पेड़ों की पहचान हुई. वहीं, श्रीनगर के दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में 162 चिनार हैं. 

गांदरबल के कंगन के वन क्षेत्र में करीब 1,200 पेड़ों का सर्वेक्षण किया गया. विभिन्न सुरक्षा बलों के प्रतिष्ठानों के भीतर मौजूद 6,000 और चिनार का सर्वेक्षण होना बाकी है. तारिक ने कहा, "इनका सर्वेक्षण होने के बाद कश्मीर में चिनार के पेड़ों की कुल संख्या में इनका आंकड़ा भी जुड़ जाएगा."

चिनार और कश्मीरी संस्कृति

चिनार जम्मू-कश्मीर का राजकीय वृक्ष है. इसकी चौड़ी छतरी गर्मियों में छाया देती है जबकि शरद ऋतु में इसकी पत्तियां गहरे लाल और सुनहरे रंग में बदल जाती हैं. इससे पूरी घाटी ऐसे शानदार रंगों से भर जाती है जो सैकड़ों सालों से लोगों को प्रेरित करती रही है.

मशहूर मुगल उद्यानों में चिनार के पेड़ बड़ी संख्या में हैं. दुनिया भर से आने वाले पर्यटकों की अनगिनत तस्वीरों में ये पेड़ पृष्ठभूमि का हिस्सा रहे हैं. दक्षिण कश्मीर का बिजबेहड़ा, जिसे 'चिनार का शहर' भी कहा जाता है, पदशाही बाग में लगाए गए सबसे पुराने चिनार के पेड़ों में से एक का घर है.

कश्मीरी कला और शिल्प में चिनार की आकृतियां प्रमुखता से दिखाई देती हैं. चिनार की छाया और खूबसूरती कश्मीरी साहित्य में भी रची-बसी है. कश्मीर से गहरे जुड़ाव रखने वाले कवि अल्लामा इकबाल ने अपने कविता संग्रह 'अरमुगान-ए-हिजाज' में चिनार की अग्निमय भावना को अमर कर दिया:

"जिस खाक के जमीर में है आतिश-ए-चिनार,

मुमकिन नहीं कि सर्द हो वो खाक-ए-अर्जुमंद."

(जिस मिट्टी के अंतर्मन में चिनार की आग है,

उसकी महान मिट्टी कभी ठंडी नहीं हो सकती.)

इन्हीं पंक्तियों से शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की आत्मकथा 'आतिश-ए-चिनार' का नाम निकला था.

मुगल संरक्षण

मुगलों के शासन में चिनार को मजबूत संरक्षण मिला था. बताया जाता है कि सम्राट अकबर ने डल झील के पास हजरतबल दरगाह के नसीम बाग में करीब 1,200 चिनार के पेड़ लगवाए थे.

तारिक की FRI टीम ने नसीम बाग में चिनार के पेड़ों का सर्वेक्षण, पहचान और टैगिंग की थी. उन्होंने बताया कि इनमें से ज्यादातर पेड़ अकबर के दौर के हैं. उन्होंने कहा, "चिनार को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाने के इसी विचार के तहत हमने 2022 में सौ हेक्टेयर में फैले सौर इलाके में 1,300 चिनार के पेड़ लगाए थे. इनमें से ज्यादातर अब 15-20 फीट ऊंचे हो चुके हैं और अच्छी तरह बढ़ रहे हैं."

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार एक केंद्रीय चिनार आयोग का गठन करे. इसके जिम्मे पूरे कश्मीर में चिनार की पहचान, संरक्षण, देखभाल और नए पेड़ तैयार करने का काम होना चाहिए. उन्होंने कहा, "अभी चिनार अनाथ है. हालांकि यह पेड़ हर किसी का है लेकिन इसकी देखभाल के लिए एक केंद्रीय निकाय होना चाहिए. इससे कश्मीर के चिनार को बचाया जा सकेगा."

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