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कांशीराम के नाम पर SP और BSP में कैसे शुरू हुई नैरेटिव की लड़ाई?

समाजवादी पार्टी कांशीराम जयंती (15 मार्च) को ‘PDA दिवस’ बनाकर दलित-ओबीसी-अल्पसंख्यक गठजोड़ साधना चाहती है, जबकि BSP इसे राजनीतिक दिखावा बता रही

1993 का सपा-BSP गठबंधन उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा सामाजिकि प्रयोग था
अपडेटेड 27 फ़रवरी , 2026

उत्तर प्रदेश की सियासत में 15 मार्च को लेकर अचानक गर्माहट बढ़ गई है. दरअसल इस दिन बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक कांशीराम की जयंती इस बार सिर्फ एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं रह गई है, बल्कि समाजवादी पार्टी (सपा) और BSP के बीच सीधी राजनीतिक भिड़ंत का मंच बनती दिख रही है. 

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के नेताओं को निर्देश दिया है कि 15 मार्च को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर कांशीराम की जयंती “बहुजन समाज दिवस” या “PDA दिवस” के रूप में बड़े पैमाने पर मनाई जाए. इसके जवाब में BSP प्रमुख मायावती ने इसे “राजनीतिक ड्रामा” करार देते हुए सपा पर बहुजन समाज को गुमराह करने का आरोप लगाया है.

मामला सिर्फ एक आयोजन का नहीं है. इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि और उससे पहले बदलते सामाजिक समीकरणों की आहट साफ सुनी जा सकती है. सपा लंबे समय से अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़कर दलित वोट बैंक में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की अवधारणा के साथ पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया. अब उसी सामाजिक समीकरण को और मजबूत करने के लिए कांशीराम की जयंती को प्रतीकात्मक और राजनीतिक रूप से साधने की कोशिश हो रही है. 

पार्टी की ओर से जारी संदेशों में यह याद दिलाया जा रहा है कि दिसंबर 1993 में कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में बनी गठबंधन सरकार ने दबे-कुचले वर्गों को सत्ता में भागीदारी दिलाई थी. सपा नेतृत्व यह भी दोहरा रहा है कि 1991 में कांशीराम ने इटावा से लोकसभा चुनाव जीता था और उस समय दोनों दलों के बीच आपसी समझदारी का रिश्ता था.

सपा की रणनीति साफ दिखती है. दलितों को यह संदेश देना कि सपा और बहुजन आंदोलन के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं. साथ ही BSP के कमजोर पड़ते संगठनात्मक ढांचे का लाभ उठाकर उसके कोर वोट बैंक में सेंध लगाना. साथ ही पार्टी PDA के जरिए ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोटों को एक साझा राजनीतिक छतरी के नीचे लाना चाहती है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल ने जिला इकाइयों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि कार्यक्रम सिर्फ औपचारिकता न रहें, बल्कि आम बहुजन समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जाए. 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा का यह कदम प्रतीकात्मक राजनीति से आगे जाकर सोशल इंजीनियरिंग की कोशिश है. लखनऊ के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम कहते हैं, “BSP का वोट बैंक पिछले कुछ चुनावों में बिखरा है. BJP ने गैर-जाटव दलितों में पैठ बनाई है, जबकि जाटव वोटों में भी शत-प्रतिशत एकजुटता नहीं रही. ऐसे में सपा यह संदेश देना चाहती है कि वह बहुजन राजनीति की स्वाभाविक उत्तराधिकारी हो सकती है.” 

दूसरी ओर BSP इसे सीधी राजनीतिक चुनौती मान रही है. मायावती ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया है कि सपा ऐतिहासिक रूप से दलित विरोधी रही है और बहुजन महापुरुषों का सम्मान केवल चुनावी फायदे के लिए करती है. उन्होंने 2012 में कांशीराम नगर जिले का नाम बदलकर कासगंज किए जाने का मुद्दा उठाया और पूछा कि अक्टूबर 2006 में कांशीराम के निधन पर तत्कालीन सपा सरकार ने राजकीय शोक क्यों घोषित नहीं किया था. 

BSP की रणनीति भी उतनी ही स्पष्ट है. पहली, अपने कोर जाटव और बहुजन वोटरों को यह याद दिलाना कि सपा के साथ गठबंधन का अनुभव कड़वा रहा है. दूसरी, 1995 के स्टेट गेस्ट हाउस कांड की स्मृति को फिर से उभारना, जब गठबंधन टूटने के बाद मायावती पर हमला हुआ था. तीसरी, सपा और BJP को एक दूसरे का अप्रत्यक्ष लाभार्थी बताकर खुद को स्वतंत्र बहुजन विकल्प के रूप में पेश करना. 

दरअसल 1993 का सपा-BSP गठबंधन उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों का बड़ा प्रयोग था. BJP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन सपा-BSP ने मिलकर सरकार बनाई. यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला और 1995 में गेस्ट हाउस कांड की घटना ने दोनों दलों के रिश्तों में स्थाई दरार डाल दी. 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने एक बार फिर साथ आने का प्रयोग किया लेकिन यह राजनीतिक प्रयोग कुछ ही महीनों में धराशाई हो गया. 

आज जब सपा कांशीराम की विरासत को PDA फ्रेम में रखकर पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रही है, BSP इसे अपने राजनीतिक क्षेत्र में अतिक्रमण के रूप में देख रही है. सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है कि कांशीराम का सपना सामाजिक न्याय का था और PDA उसी का विस्तार है. उनका दावा है कि यह कार्यक्रम बहुजन समाज को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से हो रहा है. वहीं BSP नेताओं का कहना है कि अगर सपा सचमुच सम्मान करती, तो सत्ता में रहते हुए संस्थानों और जिलों के नाम न बदलती. 

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का आकलन है कि यह टकराव दरअसल BJP के खिलाफ विपक्षी राजनीति की दिशा तय करेगा. अगर सपा दलितों के एक हिस्से को अपने साथ जोड़ने में सफल होती है, तो 2027 में मुकाबला त्रिकोणीय से द्विकोणीय हो सकता है. लेकिन अगर BSP अपने कोर वोट को एकजुट रखने में कामयाब रहती है, तो सपा की रणनीति को सीमित लाभ ही मिलेगा. यह भी दिलचस्प है कि सपा ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार अंबेडकर जयंती और कांशीराम जयंती को बड़े स्तर पर मनाने की परंपरा शुरू की है. 2023 में रायबरेली में कांशीराम की मूर्ति का अनावरण और अब जिला स्तर तक कार्यक्रमों का विस्तार इस बात का संकेत है कि पार्टी इसे दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देख रही है. मायावती की ओर से आई तीखी प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि BSP इसे हल्के में नहीं ले रही. उन्होंने अपने समर्थकों से अपील की है कि वे “राजनीतिक दिखावे” से सावधान रहें. उनके अनुसार, बहुजन आंदोलन की असली विरासत BSP के पास है और कोई दूसरी पार्टी उसे प्रतीकात्मक आयोजनों से नहीं हथिया सकती.

अखिलेश यादव ने जवाब में कहा है कि PDA दिवस एक नई शुरुआत है और बहुजन समाज के मिशन को आगे बढ़ाने का संकल्प है. उन्होंने अपने पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए सम्मान की बात भी कही. यह बयान एक तरफ टकराव को नरम करने की कोशिश जैसा लगता है, तो दूसरी तरफ बहुजन समाज को भरोसा दिलाने का प्रयास भी. आखिरकार यह टकराव सिर्फ शब्दों का नहीं, बल्कि सामाजिक आधार की राजनीति का है. 

कांशीराम की जयंती को लेकर सपा और BSP आमने-सामने हैं क्योंकि दोनों जानती हैं कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता बहुजन और ओबीसी मतदाताओं से होकर ही जाता है. एक ओर सपा बहुजन राजनीति को PDA के फ्रेम में समेटकर व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाना चाहती है, दूसरी ओर BSP अपनी विशिष्ट पहचान और कोर समर्थन को बचाए रखने के लिए संघर्षरत है. 

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