
झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की सिविल सेवा परीक्षा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राज्य के पिछले कई वर्षों के सबसे बड़े छात्र आंदोलन में बदल चुका है. रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं.
महतो की भूख हड़ताल अब उस आंदोलन का भावनात्मक केंद्र बन गई है जो धीरे-धीरे पूरे राज्य की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर केंद्रित हो गया है.
5 अगस्त को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से वीडियो कॉल पर बातचीत के बाद महतो ने भूख हड़ताल जारी रखते हुए कम से कम पानी पीने पर सहमति जताई. इसके बाद दो अन्य छात्र नेता, ब्रह्मानंद मंडल और महेंद्र प्रसाद मंडल भी भूख हड़ताल में शामिल हो गए.
उसी दिन विधानसभा में विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी भी धरनास्थल पहुंचे, जिससे आंदोलन को राजनीतिक मजबूती मिली. आंदोलनकारियों की मांगें साफ हैं. विवादित 14वीं संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा रद्द की जाए, मामले की CBI जांच कराई जाए और झारखंड की भर्ती व्यवस्था में लोगों का भरोसा बहाल किया जाए.
विवाद की शुरुआत 2 जुलाई की रात हुई, जब JPSC ने परीक्षा का परिणाम घोषित करते हुए 103 सिविल सेवा पदों के लिए 2,204 अभ्यर्थियों के सफल होने की घोषणा की. शुरुआत में खुशी का माहौल था लेकिन जल्द ही विवाद खड़ा हो गया.

अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए केवल 17 दिन का समय दिया गया. इससे भी बड़ा सवाल यह था कि JPSC ने विभिन्न श्रेणियों के कट-ऑफ अंक जारी नहीं किए जबकि यह पारदर्शिता की बुनियादी शर्त मानी जाती है.
यह खबर भी सामने आई कि आयोग के कुछ सदस्यों ने भी परिणाम घोषित करने के तरीके पर आपत्ति जताई थी. इससे संदेह और गहरा गया.
कुछ ही हफ्तों में यह विवाद आपराधिक जांच तक पहुंच गया. 21 जुलाई को झारखंड अपराध अनुसंधान विभाग (CID) ने आठ लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता के अलावा परीक्षा प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्सों की जिम्मेदारी संभालने वाली लखनऊ की कंपनी TSR डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) के निदेशक और कर्मचारी शामिल थे.
यह खुलासा इसलिए भी गंभीर माना गया क्योंकि TDPL को पहले झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) ब्लैकलिस्ट कर चुका था. शुरुआती जांच में परीक्षा प्रक्रिया में संभावित हेरफेर के संकेत मिले हैं. इनमें डिजिटल छेड़छाड़ और OMR शीट से जुड़ी कथित अनियमितताएं भी शामिल हैं. कुछ दिनों बाद JPSC के अध्यक्ष और झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव एल. खियांगते ने इस्तीफा दे दिया.
राज्यपाल ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही आयोग अपने इतिहास के सबसे उथल-पुथल भरे दौर में बिना अध्यक्ष के रह गया. सिविल सेवा मुख्य परीक्षा सहित नौ प्रतियोगी परीक्षाएं अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गईं.
हालांकि आयोग के भीतर का संस्थागत संकट अब उससे कहीं बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के सामने छोटा पड़ गया है. जुलाई के अंतिम सप्ताह से बड़ी संख्या में नौकरी के अभ्यर्थी जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में JPSC-JSSC रिफॉर्म्स मंच के बैनर तले जुटे हुए हैं. एक परीक्षा के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन अब झारखंड की पूरी भर्ती व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार की मांग करने वाला अभियान बन चुका है.

महतो की भूख हड़ताल, जिसमें ब्रह्मानंद मंडल और महेंद्र प्रसाद मंडल भी शामिल हो गए हैं, ने आंदोलन को मजबूत नैतिक आधार दिया है. वहीं सोनम वांगचुक के दखल और बाबूलाल मरांडी के दौरे ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और राजनीतिक महत्व भी दिलाया है.
यह आंदोलन हाल ही में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन से प्रेरित नजर आता है जिसके बाद धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया था. उस घटनाक्रम ने कई अभ्यर्थियों के बीच यह विश्वास मजबूत किया कि संगठित, शांतिपूर्ण और लगातार चलने वाला आंदोलन सरकारों को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर कर सकता है.
रांची में भी ऐसा ही संकल्प दिखाई दे रहा है. आंदोलन खत्म करने की लगातार अपीलों के बावजूद छात्र अनिश्चितकालीन धरना और भूख हड़ताल जारी रखे हुए हैं. उनकी मांगें स्पष्ट हैं. 14वीं संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा रद्द की जाए, कथित अनियमितताओं की CBI जांच कराई जाए, श्रेणीवार कट-ऑफ अंक जारी किए जाएं, JPSC और JSSC दोनों की कार्यप्रणाली में संरचनात्मक सुधार किए जाएं, भविष्य की भर्तियों में अधिक पारदर्शिता लाई जाए और परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता से समझौता करने वाले सभी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए.
इस आंदोलन ने हेमंत सोरेन सरकार को बातचीत के लिए मजबूर कर दिया है. मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से छात्रों की चिंताओं को गंभीर बता चुके हैं. उन्होंने परीक्षा में गड़बड़ियों और पेपर लीक को राष्ट्रीय चुनौती बताया और भरोसा दिलाया कि झारखंड इस मुद्दे पर तेजी से कार्रवाई करेगा.
जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने धरनास्थल का दौरा किया और छात्रों के प्रतिनिधिमंडल को बातचीत के लिए आमंत्रित किया. इससे भी महत्वपूर्ण कदम यह रहा कि सरकार ने दीपिका पांडेय सिंह, सुदिव्य कुमार, चमरा लिंडा और संजय कुमार प्रसाद की चार सदस्यीय मंत्रिस्तरीय समिति गठित की.
इस समिति को आंदोलनकारियों से बातचीत कर समाधान सुझाने की जिम्मेदारी दी गई है. यह कदम दिखाता है कि सरकार मान चुकी है कि यह आंदोलन अब ऐसे राजनीतिक आयाम हासिल कर चुका है, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
इसके बावजूद आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांग- प्रारंभिक परीक्षा रद्द करने का मुद्दा अब भी अनसुलझा है. सरकार की झिझक भी समझी जा सकती है. परिणाम घोषित होने के बाद परीक्षा रद्द करना कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से बेहद जटिल फैसला होगा.
हजारों ऐसे अभ्यर्थियों को दोबारा पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा जो योग्यता के आधार पर सफल हुए हो सकते हैं. वहीं CID जांच के अंतिम निष्कर्ष आने से पहले परीक्षा रद्द करने पर लंबी कानूनी लड़ाई और मनमाने फैसले के नए आरोप भी लग सकते हैं. इसलिए सरकार किसी न बदले जा सकने वाले फैसले से पहले आपराधिक जांच पूरी होने देना चाहती है.
CID ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए सभी सफल अभ्यर्थियों से OMR शीट की कार्बन कॉपी मांगी है, ताकि संभावित हेरफेर का पता लगाया जा सके. जब तक यह फोरेंसिक (Forensic) जांच स्पष्ट निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती, सरकार प्रारंभिक परीक्षा रद्द करने के पक्ष में नहीं दिख रही.
हालांकि यह सतर्कता आंदोलनकारियों की नाराजगी कम करने वाली नहीं है. कई अभ्यर्थियों के लिए यह अनिश्चितता केवल प्रशासनिक परेशानी नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और त्याग पर सीधा हमला है. हर विवादित परीक्षा, हर रुकी हुई भर्ती और हर लंबी कानूनी लड़ाई उनके करियर को और पीछे धकेल रही है. अब छात्र इस विवाद को किसी एक घटना के बजाय भर्ती विवादों के लंबे इतिहास की नई कड़ी के रूप में देखने लगे हैं.
इस आंदोलन के राजनीतिक असर को भी अब नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है. परंपरागत रूप से झारखंड की राजनीति आदिवासी पहचान, जमीन के अधिकार, कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय आकांक्षाओं जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है.
लेकिन JPSC आंदोलन यह संकेत दे रहा है कि भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और रोजगार अब नई पीढ़ी के मतदाताओं के लिए उतने ही महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे बनते जा रहे हैं.
युवा अभ्यर्थी खुद को एक अलग राजनीतिक वर्ग के रूप में स्थापित कर रहे हैं, जिसकी चिंताओं को पारंपरिक राजनीतिक विमर्श में आसानी से समाहित नहीं किया जा सकता. राज्य की राजधानी में शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ आंदोलन जारी रखकर उन्होंने सरकार को बातचीत के लिए मजबूर किया है. दूसरी ओर सरकार CID जांच की निष्पक्षता का बचाव करते हुए CBI जांच की मांग मानने से अब भी इनकार कर रही है.
मंत्रिस्तरीय समिति और प्रस्तावित वार्ता से कोई समाधान निकलेगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. छात्र नेताओं का कहना है कि बातचीत का परिणाम केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई होना चाहिए.
वहीं सरकार एक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. वह संवेदनशील भी दिखना चाहती है, लेकिन सड़क के दबाव के आगे झुकती हुई भी नहीं दिखना चाहती. साथ ही वह जांच की निष्पक्षता बनाए रखते हुए हजारों अभ्यर्थियों के करियर को अनिश्चितकाल तक अधर में भी नहीं रखना चाहती.
फिलहाल इतना तय है कि JPSC विवाद अब OMR शीट, कट-ऑफ अंक और एक विवादित परीक्षा जैसे तकनीकी मुद्दों से बहुत आगे निकल चुका है. यह अब संस्थागत विश्वसनीयता, राजनीतिक जवाबदेही और जनता के भरोसे की परीक्षा बन गया है.
जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जुटे बड़ी संख्या में युवा अभ्यर्थियों के लिए असली परीक्षा अब वह नहीं है, जो उन्होंने अप्रैल में दी थी. असली सवाल यह है कि क्या राज्य अब भी उन्हें भरोसा दिला सकता है कि उनके भविष्य का फैसला हेरफेर नहीं, बल्कि योग्यता करेगी.
जब तक इस सवाल का पारदर्शी और भरोसेमंद जवाब नहीं मिलता, तब तक झारखंड की भर्ती व्यवस्था पर छाया संकट जल्दी खत्म होता नहीं दिखता.

