
22 सितंबर को बिहार के जमुई में 10वीं की छात्रा से बदसलूकी के मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी बताए जा रहे 30 साल के नंदन यादव के बाएं पैर में गोली मारी. नंदन यादव को इस मामले का मुख्य आरोपी बताया गया है और आरोप है कि छात्रा के साथ हुई घटना के वायरल वीडियो में वह भी नजर आ रहा था.
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, नंदन यादव मड़वा पहाड़ के पास छिपा हुआ था, तभी पुलिस की एक टीम वहां पहुंची. आरोप है कि उसने भागने की कोशिश की. इस दौरान पुलिस और नंदन यादव के बीच झड़प हुई जिसके बाद पुलिस ने गोली चला दी. गोली लगने के बाद नंदन यादव को गिरफ्तार कर जमुई सदर अस्पताल ले जाया गया.
पुलिस के मुताबिक, इस मामले में आठ लोग हिरासत में हैं, जिनमें पांच बालिग और तीन नाबालिग हैं. आरोपियों में शामिल हरेराम यादव, नंदन यादव के साथ भागते समय घायल हो गया और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया. रामाशीष चौधरी को घटना वाली जगह पर मौजूद बताया गया है. वहीं, कुंदन कुमार और फैयाज अहमद को वीडियो फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.
घटना का वीडियो सामने आने और तेजी से फैलने के बाद प्रशासनिक मशीनरी हरकत में आई. छात्रा का पता लगाया गया, FIR दर्ज हुई, स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई गई, गिरफ्तारियां हुईं, सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ केस दर्ज किए गए और फिर पुलिस की गोली चली लेकिन इस मामले में सिर्फ इतनी तेजी से हुई कार्रवाई को देखकर पूरी कहानी को नहीं समझा जा सकता.
19 सितंबर की घटना
उस शाम 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले दो नाबालिग छात्र-एक लड़की और एक लड़का- जमुई के मड़वा पहाड़ वाले इलाके से कोचिंग की कक्षा के बाद अपने घर जा रहे थे. यह जगह पटना से करीब 160 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है. आरोप है कि तभी युवकों के एक समूह ने उन्हें रास्ते में रोक लिया.

पुलिस के मुताबिक और वीडियो में भी दिखता है कि दोनों नाबालिगों के साथ बदसलूकी और मारपीट की गई. लड़की को गलत तरीके से छुआ गया जबकि लड़के को पीटा गया. जब दोनों वहां से जाने की कोशिश करने लगे, तो आरोप है कि वह समूह उनके पीछे भी आया. पुलिस के मुताबिक, घटना का जो वीडियो बनाया गया, उससे संदिग्धों की पहचान करने में मदद मिली.
उस रात कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई लेकिन 21 सितंबर को पुलिस ने दोनों पीड़ित नाबालिगों से संपर्क किया, उनके बयान दर्ज किए और FIR दर्ज की. जमुई के पुलिस अधीक्षक विश्वजीत दयाल के आदेश पर स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई गई. उसी शाम तीन नाबालिगों को संदिग्ध के तौर पर गिरफ्तार किया गया. अगले दिन बाकी संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया और पुलिस की गोलीबारी भी हुई.
दोहरी जिम्मेदारी
लेकिन घटनाओं की इस पूरी कड़ी के बीच एक मुश्किल सवाल सामने आता है. पुलिस को कानून का ऐसा डर पैदा करना होता है कि कोई अपराध करने से पहले डरे. और जब किसी संदिग्ध या आरोपी के खिलाफ कार्रवाई हो तब पुलिस को खुद भी कानून के दायरे में रहकर काम करना होता है.
इस मामले में जमुई पुलिस को जैसे ही घटना की जानकारी मिली, उसने तेजी से कार्रवाई की. नाबालिग की पहचान उजागर करने और वीडियो फैलाने के मामले में करीब 120 सोशल मीडिया प्रोफाइल के खिलाफ केस दर्ज किया गया. पुलिस ने लोगों से वीडियो शेयर नहीं करने की अपील की और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्स (POCSO) एक्ट, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी.
एक अपराध के आधार पर पूरे पुलिस सिस्टम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. फिर भी ये घटनाएं एक सवाल जरूर खड़ा करती हैं: क्या अपराध करने वालों में कानून का इतना डर था कि वे ऐसा करने से पहले रुकते? एक ऐसा समूह, जिस पर आरोप है कि उसने दो स्कूली बच्चों को सार्वजनिक रास्ते पर रोक लिया, उनके साथ बदसलूकी कर सकता है और उसका वीडियो बना सकता है, वह इस सवाल को और गंभीर बना देता है. पुलिस की कार्रवाई या एनकाउंटर यह दिखाता है कि राज्य किसी संदिग्ध तक पहुंच सकता है लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि अपराध से पहले उसके मन में कानून का डर था.
दूसरा अपराध
मामले की रिपोर्ट करने में हुई देरी को उदासीनता या सहमति नहीं माना जा सकता. डरा हुआ बच्चा किसी बड़े व्यक्ति की तरह यह तय नहीं करता कि अपराध हुआ, थाने जाना है और FIR दर्ज करानी है. उसे आरोपियों का डर हो सकता है, परिवार का डर हो सकता है और आसपास के लोगों की नजरों का भी डर हो सकता है.
इसलिए असली सवाल यह है कि ऐसी कौन-सी चीजें होनी चाहिए थीं, जिनसे अपराध की जानकारी देना आसान होता. किसे फोन किया जा सकता था? क्या पहाड़ी वाला रास्ता पहले से सुनसान या जोखिम वाला रास्ता माना जाता था? क्या उस रास्ते पर कभी पुलिस की निगरानी रहती थी? असल में अपराध रोकने की शुरुआत इन्हीं बुनियादी सवालों से होती है.
मारपीट और बदसलूकी एक अपराध था. उसका वीडियो बनाना और उसे वायरल करना दूसरा अपराध था. जैसा कि पुलिस ने बताया, सोशल मीडिया पर एक बार वीडियो शेयर होने से भी नाबालिग लड़की की प्राइवेसी और मानसिक स्थिति को नुकसान पहुंच सकता है. उसकी पहचान की रक्षा करना सबकी जिम्मेदारी थी. पुलिस वीडियो में नजर आ रहे आरोपियों को गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन इंटरनेट को नहीं रोक सकती. वीडियो का फैलना ऐसा नुकसान है, जिसे पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता.
मोरल पुलिसिंग की गलत सोच
आखिर उस समूह को यह भरोसा क्यों था कि वह नाबालिग लड़के और लड़की को रास्ते में रोक सकता है? मामले से सामने आई जानकारियां मोरल पुलिसिंग की ओर इशारा करती हैं: अनजान लोग एक लड़की से उसके आने-जाने और उसके साथ मौजूद व्यक्ति के बारे में जवाब मांग रहे थे लेकिन सार्वजनिक रास्ता किसी की नैतिक अदालत नहीं है.
किसी को किसी के व्यवहार पर आपत्ति हो सकती है, लेकिन इससे उसे पूछताछ करने, डराने या मारपीट करने का अधिकार नहीं मिल जाता. यहीं मोरल पुलिसिंग हिंसा में बदल जाती है और यहीं से मामला पुलिस थाने से निकलकर समाज के बीच पहुंच जाता है.
आरोपी ऐसे घरों और मोहल्लों से आते हैं, जहां उन्हें यह सिखाया जाना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत. ऐसी सोच के खिलाफ कोई FIR नहीं होती, जो दबदबे को मर्दानगी बताती है. ऐसे परिवार के खिलाफ चार्जशीट नहीं होती, जो बेटियों पर बेटों से ज्यादा रोक-टोक लगाते हैं. उस हंसी के लिए कोई लॉक-अप नहीं होता, जिसमें किसी लड़की की बेइज्जती मजाक बन जाती है. और उस व्यक्ति के लिए कोई थाना नहीं है, जो सब कुछ देखते हुए भी चुप रहता है.
यह वीडियो सिर्फ इसलिए परेशान करने वाला नहीं है कि उसमें अपराध दिखता है बल्कि इसलिए भी कि जिस तरह से यह अपराध किया गया, उसमें एक तरह का बेखौफपन नजर आता है. यह समाज के स्तर पर अपराध रोकने से जुड़ी नाकामी है. समाज को यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि किसी दूसरे की इज्जत और गरिमा को अपनी मर्जी से चोट नहीं पहुंचाई जा सकती और आसपास के लोग भी इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे.
जिन दो नाबालिगों के साथ यह हुआ, उनके सामने अब कई सवाल हैं. गलत तरीके से उनकी पहचान और घटना का प्रचार, पढ़ाई में परेशानी और बेइज्जती जैसी मुश्किलें भी आ सकती हैं. मामला अदालत में आगे बढ़ेगा, लेकिन इस भयानक घटना की याद शायद उनके साथ हमेशा रहेगी.
क्या बदलना जरूरी है
जांच पूरी की जाए और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्स (POCSO) समेत बाकी आपराधिक कानूनों के तहत आरोपियों पर कार्रवाई की जाए. नाबालिग आरोपियों के मामलों को जुवेनाइल सिस्टम के तहत आगे बढ़ाया जाए. पुलिस की गोलीबारी की पूरी जानकारी जुटाकर उसकी जांच की जाए, क्योंकि एनकाउंटर किसी आरोपी का ट्रायल नहीं है. यह पता लगाया जाए कि अपराध का वीडियो किसने रिकॉर्ड किया, किसने अपलोड किया और किसने उसे आगे फैलाया.
इसके साथ ही मड़वा पहाड़ और कोचिंग आने-जाने वाले रास्तों की जांच की जाए. वहां रोशनी की व्यवस्था कैसी है, जिन समय पर छात्र उस रास्ते से गुजरते हैं, उस दौरान पुलिस की निगरानी रहती है या नहीं, इन सब बातों को देखा जाए. बच्चों की सुरक्षा को सिर्फ पोस्टर तक सीमित न रखा जाए. स्कूलों और कोचिंग सेंटरों में सहमति, आसपास मौजूद लोगों की जिम्मेदारी और डिजिटल कानून के बारे में सुरक्षा के हिस्से के तौर पर बताया जाए, न कि इसे सिर्फ नैतिक शिक्षा की तरह पढ़ाया जाए. परिवारों को मामले में समझौता करने के दबाव से भी बचाया जाए.
पुलिस ने आरोपियों को पकड़ लिया. एनकाउंटर सही था या नहीं, इसका फैसला सबूत और कानून के आधार पर होना है. साथ ही पुलिस हर सुनसान सड़क पर हर समय मौजूद नहीं रह सकती. इसलिए अपराध रोकने की पहली जिम्मेदारी समाज की भी है. इस मामले में वह जिम्मेदारी पूरी होती नहीं दिखी.
कहानी एक सड़क से शुरू हुई, फिर उस मोबाइल फोन तक पहुंची, जिससे अपराध का वीडियो बनाया गया, उसके बाद सोशल मीडिया फीड, थाना, लॉक-अप और 22 सितंबर को पुलिस की गोलीबारी तक पहुंची लेकिन इन दो बच्चों के लिए यह कहानी इतनी आसानी से एक जगह से दूसरी जगह जाने तक की नहीं थी.
सरकार दोषियों को सजा दे सकता है लेकिन क्या वह उन डरावने सपनों को मिटा सकता है जो इन बच्चों के मन में इस घटना ने पैदा किए हैं? उन्हें अपनी प्राइवेसी बनाए रखने, काउंसलिंग, दोबारा स्कूल लौटने का रास्ता और उस ध्यान से बचाने की जरूरत होगी, जो उनके परिवारों पर आ गया है. जमुई मामले में असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं होगी कि कैमरों के सामने राज्य कितनी सख्ती से कार्रवाई करता है. असली बात यह होगी कि जब कैमरे यहां से चले जाएंगे, तब इस मामले के लिए क्या कुछ किया जाता है और क्या बाकी रह जाता है.

