बंगाल के ज्यादातर घरों की उस चिर-परिचित शाम- जहां चाय के दौर चलते हैं और टीवी पर बहसें गरमाती हैं- उसी बीच, फेसबुक रील्स के ज़रिए एक अलग ही किस्म की राजनीति ने दबे पांव दस्तक दी है. कान उन आवाजों को पहचान रहे थे और धुन भी जैसे विरासत में घुली हुई थी. कहीं घुमक्कड़ गायकों की एक जोड़ी सत्ता की विसंगतियों पर चुटकी ले रही थी, तो कहीं एक जासूस खामोशी से कड़ियों को जोड़ता दिख रहा था.
यह सब नया नहीं था, फिर भी इसमें आज के दौर की झलक साफ़ थी. बंगाल BJP की सोशल मीडिया टीम ने आने वाले चुनावों के लिए जो दांव चला है, वह कोई ट्रेडिशनल तरीका नहीं है. दरअसल, यह बंगाल के लोगों की यादों या कहें सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ने की एक कोशिश है. AI से तैयार ये वीडियो, सत्यजीत रे की कालजयी फिल्मों 'गुपी गाइन बाघा बाइन' और 'हीरक राजार देशे' की दुनिया से उधार लिए गए हैं.
ये महज वीडियो नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से लोगों को प्रभावित करने का एक सलीका हैं. इन क्लिप्स में गुपी और बाघा अब केवल भूतों के वरदान पाए सीधे-सादे कलाकार नहीं रह गए हैं, बल्कि वे आज के शासन के हैरान-परेशान दर्शक बनकर महंगाई, सत्ता और पक्षपात पर सवाल उठा रहे हैं. उनका लहजा राजनीतिक होने के बजाय नैतिक लगता है.
फिल्म 'हीरक राजा' की तानाशाही की तुलना सीधे तौर पर किसी जीवित शासक से नहीं की गई है, फिर भी इसका इशारा बिल्कुल स्पष्ट है. यहां वही पुराना 'अपनापन' राजनीति का काम कर दे रहा है. व्यंग्य इतना हल्का है कि विरोध को शांत कर दे और इतना तीखा कि सोचने पर मजबूर कर दे.
इसी जासूसी दुनिया के जरिए एक अलग किस्म का भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जा रहा है. 'व्योमकेश बख्शी' तर्क और सबूतों के साथ लौटते हैं और चुपचाप उन कड़ियों को जोड़ते हैं कि कैसे संस्थाएं काम करती हैं या विफल होती हैं. वहीं 'फेलुदा' कुछ कम धैर्यवान दिखते हैं, वे साफ़ दिख रहे सवालों के जवाब न मिलने पर अपनी चिर-परिचित झुंझलाहट दिखाते हैं.
यहां AI का इस्तेमाल बहुत संयम से किया गया है. चेहरे पूरी तरह असली नहीं हैं, लेकिन पहचान में आ जाते हैं. आवाज़ें हूबहू नकल नहीं हैं, पर उन किरदारों की याद दिला देती हैं. मकसद यहां लोगों की 'पहचान' छिपाना नहीं बल्कि कराना है. बंगालियों ने हमेशा अपने जासूसों पर भरोसा किया है और आरोपों से भरे इस सियासी माहौल में, जांच का यह शांत तर्क लोगों को एक राहत जैसा लगता है.
सबसे तीखा प्रहार एक बिल्कुल अलग वीडियो क्लिप से आता है, जहां कल्चरल नहीं बल्कि सीधे तौर पर राजनीतिक स्मृति पर निशाना है. एक पुलिस अधिकारी (जो पूर्व डीजीपी राजीव कुमार जैसा दिखता है) उस रौब के साथ बोलता है जिसे कई बंगाली शासन के एक खास दौर से जोड़कर देखते हैं.
उनके सामने एक महिला बैठी है जिसके हाव-भाव और बोलने का अंदाज़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिलता-जुलता है. यह पूरा सीन दर्शकों की याददाश्त पर टिका है. जब यह किरदार फोन पर किसी ऐसे व्यक्ति (जिसकी पहचान माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम के रूप में होती है) से 2021 के ‘नो वोट टू BJP’ अभियान जैसी किसी हलचल पर चर्चा करता है, तो इशारा बिना कुछ कहे ही साफ़ हो जाता है. BJP यहां कोई नया आरोप नहीं लगा रही, बल्कि वह मतदाताओं को उस पैटर्न की याद दिला रही है जिसे लेकर वे पहले से ही आशंकित रहे हैं.
BJP बंगाल की सोशल मीडिया टीम के प्रमुख सप्तर्षि चौधरी कहते हैं, "हम AI का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं ताकि प्रचार में भावनात्मक और राजनीतिक जुड़ाव पैदा हो सके. चूंकि हमारी पार्टी की शुरुआत बंगाल से हुई है, इसलिए गुपी-बाघा और फेलुदा जैसे किरदारों का इस्तेमाल स्वाभाविक है."
दरअसल, यह रणनीति बंगाल में BJP की सबसे पुरानी और बड़ी चुनौती का जवाब है. पार्टी के लिए कभी भी सिर्फ चुनावी गणित ही बाधा नहीं रहा, बल्कि 'सांस्कृतिक स्वीकार्यता' असली मुद्दा रही है. BJP को अक्सर यहां एक 'बाहरी' पार्टी के तौर पर देखा जाता है, जो भीड़ तो जुटा लेती है लेकिन यहां के मुहावरों में कच्ची है. इसके नारे अक्सर 'अनुवाद' किए हुए लगते हैं और प्रतीक देशी नहीं लगते. सत्यजीत रे की दुनिया में कदम रखकर BJP की डिजिटल टीम वैचारिक बदलाव से कुछ ज़्यादा गहरा करने की कोशिश कर रही है- वह बंगाल के दिल में सांस्कृतिक प्रवेश चाहती है.
AI ने यह मुमकिन कर दिया है. यह पार्टी को बिना मालिकाना हक जताए लहजा उधार लेने और बिना लेखक बने यादों में प्रवेश करने की इजाजत देता है. इसका असर पीढ़ियों को काटता है- बुजुर्गों को बचपन की कहानियों वाला सुकून मिलता है, तो युवाओं को ये किरदार 'मीम्स' और 'रीमिक्स कल्चर' के रूप में मिलते हैं.
यहां एक और खास बात है- संयम. ये वीडियो शायद ही कभी BJP को केंद्र में रखते हैं. पार्टी किरदारों के ज़रिए नहीं बोलती, बल्कि वह बस देखती है और दूसरों को बोलने देती है. ब्रांडिंग भी हाशिए पर ही दिखती है. यह जानबूझकर किया गया है, क्योंकि बंगाल में सीधा प्रचार अक्सर विरोध को न्यौता देता है, जबकि 'संकेत' बातचीत का रास्ता खोलते हैं.
जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, यह ऑनलाइन राजनीति के बदलते स्वरूप का संकेत है. अब जंग सिर्फ वादों या प्रदर्शन की नहीं, बल्कि इंटरप्रिटेशन की है. सत्ता की कहानी कौन सुनाएगा? साठगांठ का फ्रेम कौन तैयार करेगा? और इस नैतिक लड़ाई को कौन नियंत्रित करेगा? हास्य और यादों के ज़रिए BJP यह परख रही है कि क्या 'सांस्कृतिक अपनापन' राजनीतिक विरोध को कम कर सकता है. यह प्रयोग वोटों में बदलेगा या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन डिजिटल बंगाल के इस शोर में BJP ने अपनी आवाज़ उठाए बिना सुने जाने का रास्ता ज़रूर ढूंढ लिया है.

