तमिलनाडु की सियासत में 'गिफ्ट' और 'अधिकार' के बीच की जंग अक्सर दिल्ली की अदालतों में लड़ी जाती है. लेकिन इस बार मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने लड़ाई का मैदान ही बदल दिया है. उन्होंने खेल को सुप्रीम कोर्ट से खींचकर सीधे राज्य की 1.3 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में पहुंचा दिया है. 13 फरवरी को अपनी खास योजना 'कलैग्नार मगलिर उरीमई थोगई' (KMUT) के तहत महिलाओं को एक साथ 5,000 रुपये भेजकर DMK सरकार ने अपनी इस स्कीम को कानूनी और चुनावी अड़चनों से पूरी तरह सुरक्षित कर लिया है.
यह 5,000 रुपये का दांव इतना बड़ा क्यों है, इसे समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक मामले को देखना होगा. BJP नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने कोर्ट में अर्जी दी है कि सरकारी पैसे से बांटी जाने वाली ये "मुफ्त की रेवड़ियां" चुनाव की निष्पक्षता को बिगाड़ती हैं और इन पर रोक लगनी चाहिए. BJP विपक्षी राज्यों की इन योजनाओं को 'आर्थिक रूप से गलत' बताकर लगातार हमला कर रही है.
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मार्च में होनी है. DMK खेमे में इस बात का डर था कि मार्च में होने वाली यह सुनवाई आचार संहिता लगने के बाद इस योजना को रोकने का बहाना बन सकती है. चुनाव आयोग के नियम कहते हैं कि आचार संहिता लगने के बाद नई योजनाएं शुरू नहीं हो सकतीं. हालांकि पुरानी योजनाएं जारी रह सकती हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट में 'मुफ्तखोरी' पर सवाल उठता तो विपक्षी दल इसे चुनावी प्रलोभन बताकर इस पर रोक लगवाने की कोशिश कर सकते थे.
स्टालिन ने इसी जोखिम को भांप लिया. उन्हें पता था कि अगर चुनाव प्रचार के दौरान 1,000 रुपये महीने वाली इस स्कीम का पैसा रुक गया, तो उनके सबसे बड़े चुनावी मुद्दे की हवा निकल जाएगी. इसीलिए कानूनी दांव-पेंच का इंतज़ार करने के बजाय सरकार ने 1.31 करोड़ महिलाओं को एक साथ 5,000 रुपये दे दिए. इसमें अगले तीन महीने का एडवांस (3,000 रुपये) और 2,000 रुपये गर्मी की खास मदद के तौर पर शामिल हैं. चुनाव की घोषणा से पहले ही पैसा भेजकर सरकार ने यह पक्का कर दिया कि बाद में कोई जांच या कोर्ट का चक्कर भी आए, तो भी महिलाओं तक मदद पहुंच चुकी हो.
अदालत में DMK हमेशा यह कहती रही है कि यह खैरात नहीं बल्कि 'सामाजिक न्याय' है. उनका तर्क है कि इन पैसों से महिलाएं आत्मनिर्भर बनती हैं और वे बच्चों की पढ़ाई व पोषण पर खर्च कर पाती हैं. स्टालिन ने यह भी ऐलान कर दिया है कि अगर वे दोबारा सत्ता में आए, तो इस मदद को बढ़ाकर 2,000 रुपये महीना कर देंगे.
विपक्ष इस कदम से तिलमिलाया हुआ है. अन्नाद्रमुक (AIADMK) के नेता डी. जयकुमार का कहना है कि यह DMK का 'चुनावी डर' है. उनका आरोप है कि खजाना खाली होने के बावजूद सरकार वोट खरीदने के लिए पैसा बांट रही है. वहीं BJP के प्रवक्ता नारायणन तिरुपति का कहना है कि लोग पिछले पांच साल के कुशासन को इतनी आसानी से नहीं भूलेंगे. BJP की वरिष्ठ नेता तमिलिसाई सुंदरराजन ने इन आरोपों को खारिज किया कि केंद्र सरकार इस योजना को रोकना चाहती है, उन्होंने कहा कि यह सब सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जा रहा है.
देखा जाए तो अन्नाद्रमुक के लिए स्थिति बड़ी नाजुक है. वे खुद जयललिता के समय से ऐसी योजनाएं चलाते रहे हैं, इसलिए वे नकद मदद का खुलकर विरोध भी नहीं कर सकते क्योंकि इससे महिलाएं नाराज़ हो सकती हैं. दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट में जो लोग इस मामले को ले गए हैं, उनका कहना है कि ऐसी होड़ से राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर के डेवलपमेंट के लिए पैसा नहीं बचेगा.
सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या फैसला देता है, यह अलग बात है, लेकिन तमिलनाडु में इसका असर साफ़ दिखने लगा है. DMK ने कानूनी बहस में फंसने के बजाय अपनी योजना की रफ्तार बढ़ाकर इस पूरे मुद्दे को 'सरकारी अधिकार' में बदल दिया है. फिलहाल 1.3 करोड़ खातों में पैसा पहुंच चुका है, और तमिलनाडु की राजनीति में यह साफ़ संदेश गया है कि 'काम' की गूंज बहस से बड़ी होती है.

