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धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर अखिलेश यादव ने BJP को किस मुश्किल में डाला?

धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर अखिलेश ने BJP को घेरा, कार्यक्रमों पर प्रतिबंध की मांग से बदला धार्मिक राजनीति का नैरेटिव, 2027 से पहले हिंदुत्व की लड़ाई तेज़

Akhilesh Yadav Dhirendra Shastri
अखिलेश यादव और धीरेंद्र शास्त्री. (Photo- ITG)
अपडेटेड 6 नवंबर , 2026

भगवान कृष्ण की बांसुरी बजाते समय की त्रिभंग मुद्रा की तुलना भगवान राम की सीधे खड़े होने वाली मुद्रा से करते हुए उसे कमतर बताने वाले बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के एक बयान ने उत्तर प्रदेश की सियासत में नया विवाद खड़ा कर दिया है. 

मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित बागेश्वर धाम के प्रमुख शास्त्री की टिप्पणी पर ब्रज क्षेत्र के संतों और कृष्ण भक्तों में नाराजगी सामने आने के बाद उन्होंने दो नवंबर को वीडियो संदेश जारी कर हाथ जोड़कर माफी मांग ली. धीरेंद्र शास्त्री ने सफाई दी कि उनकी टिप्पणी का संदर्भ अलग था और उनका उद्देश्य किसी भी देवी-देवता का अपमान करना नहीं था. 

लेकिन इस माफी के बावजूद विवाद थमने के बजाय अब 2027 के विधानसभा चुनावों की सियासी जमीन पर पहुंच गया है. समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने की मांग कर दी है. उन्होंने उत्तर प्रदेश में उनके प्रस्तावित कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने के लिए योगी सरकार पर भी दबाव बनाया है.

खास बात यह है कि इस बार धार्मिक मुद्दों पर आमतौर पर आक्रामक रहने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) शुरुआती दौर में बचाव की मुद्रा में नजर आई, जबकि सपा ने भगवान कृष्ण और राम के सम्मान को अपना राजनीतिक मुद्दा बनाकर BJP को घेरने की कोशिश की है.

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर हैं. कथा वाचन, धार्मिक प्रवचन और अपने चर्चित 'दिव्य दरबार' के जरिए उन्होंने देशभर में पहचान बनाई है. वे सनातन धर्म, हिंदू राष्ट्र और हिंदू समाज की एकजुटता जैसे विषयों पर मुखर होकर अपनी बात रखते रहे हैं. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत BJP के कई नेताओं और राजनीतिक हस्तियों के साथ उनकी निकटता की चर्चा होती रही है. यही वजह है कि उनके एक धार्मिक बयान के राजनीतिक विवाद में बदलने के बाद BJP के लिए भी असहज स्थिति पैदा हो गई है.

पीएम मोदी भी बागेश्वर धाम जा चुके हैं
पीएम मोदी भी बागेश्वर धाम जा चुके हैं

अखिलेश यादव ने उनके बयान को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि मानवीय गलतियों को माफ किया जा सकता है, लेकिन ईशनिंदा यानी देवी-देवताओं का अपमान कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता. ऐसे लोगों पर आजीवन प्रतिबंध लगाना समाज के हित में होगा और देशभर में उनके सभी कार्यक्रम रद्द किए जाने चाहिए. 

अखिलेश ने आरोप लगाया कि शास्त्री अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहे हैं. उनके मुताबिक, BJP के साथ शास्त्री का राजनीतिक जुड़ाव किसी से छिपा नहीं है और उनके बयानों के पीछे एक खास राजनीतिक सोच काम कर रही है.

मामला उस समय और तूल पकड़ गया जब अखिलेश ने एक अन्य वीडियो साझा किया, जिसमें शास्त्री कथित तौर पर भगवान राम के पिता को लेकर विवादास्पद टिप्पणी करते नजर आते हैं. इस वीडियो के साथ अखिलेश ने सवाल उठाया कि सनातन विरोधी तत्वों को कौन सक्रिय कर रहा है और वे किसके इशारे पर काम कर रहे हैं. 

सपा अध्यक्ष ने कहा कि पहले भगवान कृष्ण को लेकर विवादास्पद वीडियो सामने आया और अब भगवान राम के पिता के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आ रही हैं. अखिलेश ने कहा कि शास्त्री ने यदुवंशियों और रघुवंशियों, दोनों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है. उन्हें ब्रज या अवध में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा और कोई सच्चा रघुवंशी या यदुवंशी उनका स्वागत नहीं करेगा.

4 नवंबर को अखिलेश ने प्रदेश सरकार से अंबेडकर नगर, कुंडा, गोंडा, झांसी, लखनऊ और आगरा में धीरेंद्र शास्त्री के प्रस्तावित कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने की मांग की. लखनऊ में सपा मुख्यालय के बाहर भी इस विवाद का असर दिखाई देने लगा. वहां शास्त्री को निशाना बनाते हुए पोस्टर लगाए गए, जिनमें उन्हें 'ढोंगी, पाखंडी और व्यापारी' बताया गया. 

वहीं कुछ होर्डिंग में अखिलेश यादव और भगवान कृष्ण की तस्वीरों के साथ '27 में कृष्ण आएंगे' का नारा दिया गया. इन पोस्टरों को 2027 के चुनाव से पहले सपा की धार्मिक और राजनीतिक रणनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

BJP की असहज

आमतौर पर हिंदू देवी-देवताओं, सनातन धर्म या धार्मिक प्रतीकों पर किसी विवादास्पद टिप्पणी के बाद BJP के नेता और संगठन देशव्यापी विरोध दर्ज कराने में आगे रहते हैं. कई बार पार्टी ऐसे बयानों को चुनावी विमर्श का हिस्सा भी बना देती है. लेकिन इस बार तस्वीर उलट दिखाई दी. 

शास्त्री के बयान के बाद अखिलेश यादव लगातार हमलावर रहे और BJP की ओर से शुरुआती स्तर पर कोई बड़ा राजनीतिक अभियान या तीखा विरोध सामने नहीं आया. राजनीतिक हलकों में इस चुप्पी को लेकर सवाल उठने लगे कि जिस तरह BJP दूसरे मामलों में धार्मिक भावनाओं के अपमान पर आक्रामक होती है, वैसी प्रतिक्रिया इस मामले में क्यों नहीं दिख रही है.

हालांकि BJP ने बाद में अखिलेश यादव के आरोपों का जवाब देना शुरू किया. प्रदेश सरकार के मंत्री मनोज पांडे ने सपा पर पलटवार करते हुए कहा कि जिस पार्टी को भगवान राम पर सवाल उठाने, कारसेवकों पर गोलियां चलवाने और रामचरितमानस जलाने के लिए जाना जाता है, उससे धर्म के बारे में अच्छी बात कहने की उम्मीद नहीं की जा सकती. 

दूसरी तरफ सपा प्रवक्ता अब्बास हैदर ने BJP पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि राजनीतिक विचारधारा चाहे जो भी हो, धार्मिक भावनाओं का सम्मान होना चाहिए. भगवान राम और कृष्ण पूजनीय हैं और उनके भक्तों की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणियों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. उन्होंने BJP से सवाल किया कि क्या वह सभी धर्मों का सम्मान करती है या केवल उन्हीं लोगों का बचाव करती है जो उसके राजनीतिक हितों के अनुकूल हैं.

इस राजनीतिक टकराव में BJP के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने भी अखिलेश यादव को निशाने पर लिया. उन्होंने X पर एक वीडियो साझा करते हुए रामचरितमानस की चौपाई 'पर उपदेस कुसल बहुतेरे. जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥' उद्धृत की. चौधरी ने लिखा कि जिनका अपना आचरण दूषित है, वे दूसरों को उपदेश देते हुए अच्छे नहीं लगते. उनके साझा किए गए वीडियो का शीर्षक था, 'इसी को इच्छाधारी हिंदू कहते हैं.' 

इस वीडियो में पहले सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव का संसद में दिया गया कथित बयान दिखाया गया, जिसमें वे कहते सुनाई देते हैं, 'तो हम लोग राम-कृष्ण को लड़ा देंगे.' इसके बाद अखिलेश यादव की एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कही गई बात का क्लिप शामिल किया गया, जिसमें वे हिंदू धर्म में पीपल के पेड़ के नीचे पत्थर और लाल झंडा रखकर मंदिर बन जाने की बात कहते नजर आते हैं. इस वीडियो के जरिए BJP ने अखिलेश की धार्मिक टिप्पणियों और उनके मौजूदा रुख के बीच विरोधाभास दिखाने की कोशिश की.

BJP के हिंदुत्व नैरेटिव को चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक धीरेंद्र शास्त्री विवाद ने उत्तर प्रदेश में BJP और सपा के बीच धार्मिक नैरेटिव की लड़ाई को नया मोड़ दिया है. अब तक हिंदू आस्था, सनातन धर्म और धार्मिक प्रतीकों से जुड़े विवादों में BJP आमतौर पर आक्रामक भूमिका में रहती थी, जबकि सपा ऐसे मुद्दों पर अपेक्षाकृत सतर्क रुख अपनाती थी. इस बार अखिलेश यादव ने पहल करके BJP को जवाब देने की स्थिति में ला दिया है. 

विश्लेषकों का मानना है कि धीरेंद्र शास्त्री की विचारधारा को BJP के हिंदुत्व के राजनीतिक विमर्श के करीब माना जाता है. ऐसे में उनके खिलाफ BJP की ओर से वैसी आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं आना, जैसी दूसरे विवादों में दिखाई देती है, राजनीतिक रूप से पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है.

राजनीतिक वि‍श्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर देवकीनंदन भट्ट का मानना है कि BJP के लिए अपने ही वैचारिक खेमे से जुड़े किसी प्रभावशाली कथावाचक के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोलना आसान नहीं है. 

भट्ट के मुताबिक धीरेंद्र शास्त्री ने ब्रज के संतों और कृष्ण भक्तों की नाराजगी सामने आने के बाद तत्काल माफी मांग ली. इससे BJP के सामने भी उनके बयान की निंदा करते हुए लंबा राजनीतिक अभियान चलाने का नैतिक आधार कमजोर पड़ गया. अखिलेश यादव ने इसी स्थिति को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की है.

देवकी नंदन भट्ट आगे कहते हैं, “अखिलेश केवल धीरेंद्र शास्त्री के बयान की निंदा तक सीमित नहीं रहे बल्कि उनके कार्यक्रम रद्द करने और ब्रज-अवध में उनके प्रवेश का विरोध करने जैसी मांगें उठाकर अपनी राजनीतिक मंशा भी स्पष्ट कर रहे हैं. इसके जरिए वे यह संदेश देना चाहते हैं कि भगवान कृष्ण और राम के सम्मान के मामले में सपा किसी तरह का समझौता नहीं करेगी. अखिलेश BJP के उस आरोप का जवाब भी देना चाहते हैं, जिसमें सपा को हिंदू विरोधी बताकर घेरा जाता रहा है. वह खुद को और अपनी पार्टी को सनातन परंपराओं तथा देवी-देवताओं के सम्मान का पक्षधर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं.” 

इस विवाद के जरिए अखिलेश BJP के हिंदुत्व नैरेटिव पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं. उनका निशाना केवल धीरेंद्र शास्त्री नहीं, बल्कि उनके बहाने BJP की धार्मिक राजनीति भी है. अखिलेश यह सवाल उठा रहे हैं कि दूसरे मामलों में तत्काल कार्रवाई और बुलडोजर नीति की बात करने वाली योगी सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है. 

दरअसल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद केवल एक कथावाचक के बयान और उनकी माफी तक सीमित नहीं रह गया है. इसके केंद्र में भगवान कृष्ण, भगवान राम, यदुवंशी और रघुवंशी पहचान के साथ हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की सियासी कोशिश भी है. सपा के लिए यह विवाद अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण से आगे बढ़कर व्यापक हिंदू मतदाताओं तक पहुंचने का अवसर बन सकता है. 

वहीं BJP के सामने चुनौती है कि वह अपने वैचारिक समर्थक माने जाने वाले कथावाचक के विवादित बयान पर संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए अपने हिंदुत्व के राजनीतिक आधार को भी सुरक्षित रखे.

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