मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी चाहते हैं कि बिहार का पर्यटन वास्तव में नई उड़ान भरे. इसके लिए सम्राट सरकार नए सिरे से कोशिश कर रही है. सदियों से बिहार के सबसे खास पर्यटन स्थलों तक पहुंचने के लिए लोगों को लंबा और कठिन सफर करना पड़ता है.
कैमूर के प्राचीन मां मुंडेश्वरी मंदिर तक पहुंचने के लिए धूलभरी सड़कों और ग्रामीण रास्तों से होकर लंबी यात्रा करनी पड़ती है. बिहार के इकलौते टाइगर रिजर्व वाल्मीकिनगर जाने के लिए पहले से प्लान बनाना पड़ता है और सड़क यात्रा में लगभग पूरा दिन निकल जाता है.
वहीं, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध धरोहर स्थलों में शामिल राजगीर तक पहुंचने में भी ट्रैफिक, जाम और बिहार की सड़कों की अनिश्चित स्थिति के कारण कई घंटे लग जाते हैं.
अब सीएम सम्राट चौधरी हेलिकॉप्टर सेवा को शुरू कर इन समस्याओं को खत्म करना चाहते हैं.
यही वजह है कि बिहार सरकार की नई पर्यटन परियोजना के तहत हेलिकॉप्टर सेवा के जरिए पटना को राजगीर, मां मुंडेश्वरी मंदिर और वाल्मीकिनगर टाइगर रिजर्व से जोड़ा जा रहा है. इसके कारण अगले सप्ताह से इनमें से कुछ यात्राएं घंटों नहीं, बल्कि मिनटों में पूरी होंगी.
15 जुलाई को बिहार सरकार मुख्यमंत्री हेली-टूरिज्म और एयर टूरिज्म योजना शुरू करेगी. यह छह महीने की पायलट परियोजना है, जिसका उद्देश्य सिर्फ लोगों की नजर में बिहार की नई पहचान बनाना है.
हेलिकॉप्टर सेवा पटना को राजगीर और मां मुंडेश्वरी मंदिर से जोड़ेंगे जबकि सरकार की ओर से संचालित एक छोटे विमान से पर्यटकों को वाल्मीकिनगर ले जाया जाएगा.
इसके अलावा, हर सप्ताहांत पर्यटक और स्थानीय लोग 2,100 रुपए प्रति सीट देकर 10 मिनट की हेलिकॉप्टर सवारी के जरिए पटना का हवाई नजारा देख सकेंगे.
एक ऐसे राज्य के लिए, जहां लंबी सड़क यात्राएं आम बात रही हैं. यह योजना नई सोच का संकेत है. इसे केवल एक नई परिवहन सेवा मानना इसकी असली अहमियत को कम करके आंकना होगा. यह पहल इस बात को दिखाता है कि बिहार पर्यटन को आर्थिक विकास, रोजगार और क्षेत्रीय विकास का महत्वपूर्ण साधन बनाना चाहता है.
दशकों से भारत के पर्यटन मानचित्र पर बिहार की स्थिति कुछ अलग रही है. बहुत कम राज्यों के पास बिहार जितनी समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत है. बोधगया में भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी.
नालंदा कभी पूरे एशिया से विद्वानों को आकर्षित करता था. भगवान महावीर ने इन्हीं इलाकों में भ्रमण किया. गुरु गोबिंद सिंह का जन्म आज के पटना में हुआ था. सीता का जन्मस्थान सीतामढ़ी में है. गंगा के किनारे प्राचीन साम्राज्य फले-फूले थे.
हालांकि केवल इतिहास होने से पर्यटन नहीं बढ़ता है. वहां तक आसानी से पहुंचना भी जरूरी होता है. सरकारों ने वर्षों तक स्मारकों का संरक्षण किया, मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और त्योहारों का प्रचार किया लेकिन पर्यटक आज भी एक ही सवाल पूछते हैं कि वहां पहुंचना कितना आसान है?
यही सवाल इस नई योजना के केंद्र में है. पायलट परियोजना के लिए जिन जगहों का चयन किया गया है, वह सोच-समझकर किया गया है. राजगीर बिहार की अंतरराष्ट्रीय पहचान वाला धरोहर स्थल है जहां दुनिया भर से बौद्ध श्रद्धालु और इतिहास प्रेमी आते हैं.
कैमूर का मां मुंडेश्वरी मंदिर धार्मिक महत्व के साथ-साथ पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है और इसे देश के सबसे पुराने सक्रिय हिंदू मंदिरों में से एक माना जाता है. वहीं, वाल्मीकिनगर बिल्कुल अलग अनुभव देता है, जहां मठों और मंदिरों की जगह जंगल, नदियां और वन्यजीव हैं. ये तीनों स्थान मिलकर बिहार की अलग-अलग पहचान को सामने लाते हैं और दिखाते हैं कि यह राज्य आम धारणा से कहीं अधिक विविध है.
इस सेवा का उद्देश्य यात्रा को आसान बनाना, समय बचाना और कम समय वाले पर्यटन को बढ़ावा देना है. शायद इसकी सबसे दिलचस्प बात इसका संपर्क नहीं, बल्कि पटना की हवाई सैर है. हर शनिवार और रविवार हेलिकॉप्टर एक बार में पांच यात्रियों को लेकर 10 मिनट तक शहर के ऊपर उड़ान भरेंगे.
कल्पना कीजिए कि ऊपर से गंगा चांदी की चमकती हुई पट्टी की तरह दिखाई दे रही हो, नदी पर फैला गांधी सेतु नजर आ रहा हो, शहर के बीचोबीच गोलघर, सचिवालय, नई इमारतें और पुराने मोहल्लों का पूरा दृश्य दिखाई दे रहा हो तो कितना सुखद नजारा होगा.
पटना के अधिकांश लोगों ने अपने शहर की हवाई तस्वीरें तो देखी हैं लेकिन उसे इस तरह खुद देखने का मौका बहुत कम लोगों को मिला है. अब उन्हें यह अवसर मिलेगा. यह पहल बिहार सरकार की बदलती प्राथमिकताओं को भी दिखाती है. अब तक राज्य के विकास एजेंडे में पर्यटन की भूमिका सीमित रही थी और सड़क, कृषि, शिक्षा तथा कल्याण योजनाओं को अधिक महत्व मिलता था. पर पिछले एक वर्ष में पर्यटन को लेकर सरकार की दिलचस्पी काफी बढ़ी है.
गया में विष्णुपद मंदिर क्षेत्र का पुनर्विकास, सीतामढ़ी में सीता जन्मस्थल से जुड़ी बड़ी परियोजना, बिहार में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम का आगमन, मुंगेर में प्रस्तावित आदि योगी परियोजना और बौद्ध तथा जैन पर्यटन सर्किट को मजबूत करने की कोशिशें इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं.
हेलिकॉप्टर सेवा भी इसी बड़ी योजना का एक हिस्सा है. यह इस बात का संकेत है कि बिहार की भविष्य की समृद्धि केवल उद्योगों पर नहीं बल्कि अपनी विरासत को संरक्षित करने उसका प्रचार करने और दुनिया के सामने बेहतर ढंग से पेश करने पर भी निर्भर करेगी.
चौधरी सरकार ने इस योजना की आर्थिक वास्तविकता को छिपाने की कोशिश नहीं की है. सरकारी अनुमान के अनुसार केवल टिकट बिक्री से इसका संचालन खर्च नहीं निकल पाएगा. अगर छह महीने की पायलट अवधि में हेलिकॉप्टर की सभी सीटें भर भी जाएं, तब भी कुछ कमी रहेगी जिसे सरकार वायबिलिटी गैप फंडिंग के जरिए पूरा करेगी. दरअसल, यह सरकार के जरिए उन बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक सेवा परियोजनाओं को प्रदान किया जाने वाला एक वित्तीय अनुदान है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यंत आवश्यक हैं.
अगर सभी सीटें भरती हैं तो छह महीने में अनुमानित सरकारी सहायता करीब 3.88 करोड़ रुपये होगी. अगर औसत सीट भरने की दर 60 फीसद रहती है तो यह सहायता बढ़कर लगभग 4.35 करोड़ रुपये हो जाएगी. योजना के दस्तावेज में साफ कहा गया है कि इसका उद्देश्य व्यावसायिक लाभ कमाना नहीं, बल्कि पर्यटन और क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देना है. यह स्पष्टता स्वागत योग्य है.
सड़कें केवल टोल से अपनी लागत निकालने के लिए नहीं बनाई जातीं. पार्क इसलिए नहीं बनाए जाते कि वे मुनाफा कमाएं. संग्रहालयों का मूल्यांकन भी केवल लाभ के आधार पर नहीं किया जाता है. इन्हें सार्वजनिक हित में किया गया निवेश माना जाता है. बिहार सरकार भी इस विमानन परियोजना को इसी नजरिए से देख रही है.
अगर बेहतर संपर्क के कारण अधिक पर्यटक आएं, होटल में ठहरें, टैक्सी किराए पर लें, स्थानीय रेस्तरां में खाना खाएं, हस्तशिल्प खरीदें और अपनी यात्रा लंबी करें, तो इसका फायदा पूरी अर्थव्यवस्था को मिलेगा. भले ही हेलिकॉप्टर सेवा को सरकारी सहायता की जरूरत पड़े.
इस योजना की अहमियत की एक और वजह है. लंबे समय से बिहार की पहचान राजनीति, पलायन और आर्थिक पिछड़ेपन तक सीमित करके देखी जाती रही है. जबकि हर साल हजारों देशी और विदेशी श्रद्धालु बोधगया, राजगीर, नालंदा और पटना साहिब आते हैं.
वन्यजीव प्रेमी वाल्मीकिनगर जाते हैं. पुरातत्वविद लगातार बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों की नई खोज कर रहे हैं. समस्या पर्यटन स्थलों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें आपस में जोड़ने की रही है. नई योजना इसी समस्या का समाधान करने की कोशिश है.
योजना के संचालन की जिम्मेदारियां भी अलग-अलग विभागों में बांटी गई हैं. बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम बुकिंग, पर्यटन पैकेज, रिफंड और ग्राहक सेवाओं की जिम्मेदारी संभालेगा. नागरिक उड्डयन निदेशालय उड़ानों का संचालन देखेगा, जबकि जिला प्रशासन सुरक्षा, हेलिपैड प्रबंधन और आपातकालीन तैयारियों की जिम्मेदारी निभाएगा. विकास आयुक्त की अध्यक्षता में एक राज्य स्तरीय समिति पूरी योजना की निगरानी करेगी और पायलट परियोजना की समीक्षा करेगी.
यह प्रयोग कितना सफल होगा, इसका पता आने वाले महीनों में चलेगा. मौसम, यात्रियों की संख्या, टिकट की कीमत और सीटों की उपलब्धता तय करेगी कि जनवरी 2027 के बाद इस सेवा का विस्तार होगा या नहीं. अगर पायलट परियोजना सफल रही तो इसमें और पर्यटन स्थलों को भी जोड़ा जा सकता है.
हर बड़ा बदलाव एक प्रयोग से शुरू होता है. कुछ साल पहले तक शायद ही किसी ने सोचा होगा कि बिहार में हवाई पर्यटन, बौद्ध सर्किट, टाइगर रिजर्व और सप्ताहांत हेलिकॉप्टर सवारी पर एक साथ चर्चा होगी. अब यह चर्चा हो रही है. केवल हेलिकॉप्टर बिहार के पर्यटन को पूरी तरह नहीं बदल सकते.
वे सड़क, होटल, स्वच्छता और धरोहर संरक्षण में होने वाले निवेश की जगह नहीं ले सकते लेकिन वे एक महत्वपूर्ण काम जरूर कर सकते हैं. वे महत्वाकांक्षा का संदेश देते हैं. 15 जुलाई को जब पहले हेलिकॉप्टर पटना से उड़ान भरेंगे और श्रद्धालुओं, पर्यटकों और स्थानीय लोगों को राजगीर, कैमूर और वाल्मीकिनगर लेकर जाएंगे, तब वे बिहार की एक नई सोच को भी साथ लेकर उड़ेंगे.
एक ऐसा बिहार जो पुरानी धारणाओं से ऊपर उठना चाहता है और अपनी समृद्ध विरासत को अपनाना चाहता है. इतना ही नहीं लोगों को राज्य को एक नई ऊंचाई से देखने का निमंत्रण देता है.

