30 जुलाई को होने वाले बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के मतदान से चार दिन पहले यानी 26 जुलाई को जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने एक नया मुद्दा उठाया. उन्होंने अपने प्रचार के दौरान बीजेपी उम्मीदवार नीरज सिन्हा, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला नहीं बोला. इसके बजाय प्रशांत किशोर ने स्वयं सहायता समूह 'जीविका' को निशाने पर लिया.
'जीविका' महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों का बड़ा नेटवर्क है जिसे बिहार सरकार सुशासन की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती हैं. पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ बीजेपी बांकीपुर में वोटरों को प्रभावित करने के लिए जीविका दीदियों (जीविका योजना की लाभार्थी महिलाओं) का इस्तेमाल कर रही है.
उन्होंने चुनाव आयोग से जीविका या किसी भी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था से जुड़े लोगों को चुनाव प्रचार में शामिल होने से रोकने की मांग भी की थी. इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, इसका फैसला चुनाव आयोग करेगा लेकिन राजनीतिक रूप से इससे ज्यादा अहम बात कुछ और है.
यह समझने वाली बात है कि जो नेता अपनी हार तय मानता है, वह चुनाव प्रचार के आखिरी हफ्ते में इस तरह का दांव नहीं चलता. ऐसा नेता आमतौर पर परिणाम आने से पहले ही सारा खेल समझ जाता है. वह परिणाम आते ही हार के लिए परिस्थितियों को दोष देता है और पहले से तैयार हार की वजहों को लोगों के सामने रखता है. प्रशांत किशोर ने इसके ठीक उलटा किया है.
उन्होंने बांकीपुर चुनाव को एक सामान्य उपचुनाव की जगह सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह के तौर पर पेश करने की कोशिश की है. उनका यह आत्मविश्वास ध्यान देने योग्य है. एक साल पहले ही बिहार ने विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की राजनीतिक शुरुआत को नाकामी माना था. हजारों किलोमीटर की पदयात्रा के बाद बनाई गई उनकी पार्टी 'जन सुराज' एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत सकी थी. पार्टी के 238 उम्मीदवारों में सिर्फ दो ही अपनी जमानत बचा पाए थे.
आलोचकों ने कहा है कि भारत के सबसे चर्चित राजनीतिक रणनीतिकार को अब समझ आ गया होगा कि दूसरों को चुनाव जिताने और खुद चुनाव जीतने में फर्क होता है. सच्चाई यह भी है कि उनकी पार्टी को पहले ही चुनाव में 16.7 लाख वोट मिले थे.
दुनिया के कई लोकतंत्रों में 16 लाख वोट किसी पार्टी को एक बड़ी राजनीतिक ताकत बना सकते हैं लेकिन भारत की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली में इतने वोट मिलने के बावजूद जन सुराज को एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. पार्टी को विधानसभा में प्रतिनिधित्व या राजनीतिक महत्व नहीं मिला.
हालांकि, राजनीति हमेशा इतनी सीधी नहीं होती. दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर जन सुराज को जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले. पार्टी खुद तो नहीं जीती लेकिन उसने चुनाव को प्रभावित जरूर किया. एक तरह से उसने तय किया कि चुनाव कौन जीतेगा. राजनीतिक विज्ञान की भाषा में इसे 'स्पॉइलर' यानी मुकाबले का समीकरण बिगाड़ने वाली पार्टी कहा जाता है.
हालांकि, ऐसी नई पार्टियां अक्सर कुछ समय बाद खत्म हो जाती हैं लेकिन जन सुराज ने मानो एक नया वोट बैंक तैयार करना शुरू कर दिया. ऐसे मतदाता जो बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और आरजेडी के नेतृत्व वाले विपक्ष दोनों से असंतुष्ट हैं, उन्हें प्रशांत किशोर ने प्रभावित करना शुरू कर दिया है.
देखा गया है कि बिहार में नई राजनीतिक पार्टियां पहले चुनाव जिताने वाली नहीं बल्कि समीकरण बदलने वाली ताकत बनती हैं. वे राजनीतिक गणित बदलती हैं, सामाजिक गठबंधनों को तोड़ती हैं. बांकीपुर में भी इस बार कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है.
कागजों पर देखें तो बांकीपुर करीब तीन दशक से बीजेपी का सबसे सुरक्षित शहरी गढ़ रहा है.
नवीन किशोर सिन्हा ने 1990 के दशक में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. उनके बाद नितिन नवीन ने लगातार पांच बार जीतकर इसे बीजेपी का मजबूत किला बना दिया. यह उपचुनाव इसलिए हो रहा है क्योंकि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और बाद में राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद नितिन नवीन ने यह सीट खाली कर दी थी.
प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर पहला मौका है जब वे खुद को साबित कर सकते हैं. वहीं, बीजेपी के लिए दांव थोड़ा अलग है लेकिन कम महत्वपूर्ण नहीं. अगर बांकीपुर में हार होती है तो यह संदेश जाएगा कि बिहार का शहरी मध्यवर्ग अब पूरी तरह बीजेपी के साथ नहीं है. इससे भी बड़ी बात यह होगी कि प्रशांत किशोर बीजेपी को उसके अपने गढ़ में हराने का दावा कर सकेंगे.
आधिकारिक तौर पर बीजेपी के नेता 'पीके फैक्टर' को खारिज करते हैं और कहते हैं कि सवाल सिर्फ जीत के अंतर का है. हालांकि, कोई भी पार्टी ऐसे प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ इतना बड़ा संगठनात्मक अभियान नहीं चलाती जिसे वह महत्वहीन मानती हो.
बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद और राम कृपाल यादव जैसे वरिष्ठ नेता लगातार प्रचार कर रहे हैं. नितिन नवीन भी पूरे क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं. बूथ स्तर की तैयारियां किसी करीबी विधानसभा चुनाव जैसी दिखाई दे रही हैं. लगभग हर मोहल्ले में बीजेपी का असाधारण रूप से सक्रिय प्रचार नजर आया जो यह संकेत देता है कि पार्टी भी भीतर ही भीतर मान रही है कि इस चुनाव को हल्के में नहीं लिया जा सकता.
प्रशांत किशोर ने जानबूझकर बिहार की राजनीति को पारंपरिक मुद्दों पर नहीं लड़ा. जहां आरजेडी की राजनीति अब भी सामाजिक समीकरणों पर टिकी है और बीजेपी की राजनीति कल्याणकारी योजनाओं तथा हिंदुत्व के मेल पर आधारित है, वहीं जन सुराज ने अपना अभियान सुशासन के मुद्दों पर केंद्रित किया है, जैसे पेपर लीक, युवाओं में बेरोजगारी, पलायन, सरकारी स्कूल, भर्ती परीक्षाएं और प्रशासनिक जवाबदेही.
जीविका विवाद भी इसी रणनीति का हिस्सा है. इससे प्रशांत किशोर यह तर्क देने की कोशिश कर रहे हैं कि मुकाबला सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं बल्कि एक मजबूत सरकारी व्यवस्था और ऐसे चुनौती देने वाले के बीच है जिसके पास संस्थागत ताकत नहीं है. मतदाता इस तर्क को कितना स्वीकार करेंगे, यह अभी साफ नहीं है. हालांकि आलोचक भी मानते हैं कि प्रशांत किशोर ने चुनावी बहस का केंद्र बदल दिया है.
कुछ समय पहले तक बिहार में चर्चा इस बात की थी कि क्या जन सुराज टिक पाएगी या नहीं. आज चर्चा इस बात की है कि क्या वह बांकीपुर जीत सकती है? यह अपने आप में बड़ा बदलाव है.
बांकीपुर का नतीजा बिहार का भविष्य तय नहीं करेगा. इससे यह भी तय नहीं होगा कि राज्य में सरकार किसकी बनेगी लेकिन यह इस अहम सवाल का जवाब जरूर दे सकता है कि क्या प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार से एक वास्तविक राजनीतिक दावेदार बन गए हैं?
30 जुलाई का मतदान इस चुनाव का जवाब देगा. इससे यह भी तय हो जाएगा कि क्या बिहार को ऐसा तीसरा राजनीतिक विकल्प मिल गया है जो पुराने राजनीतिक ढांचे को चुनौती दे सके. फिलहाल इस बात में कोई दो राय नहीं है कि जिस व्यक्ति की पार्टी 2025 में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी, उसने बांकीपुर उपचुनाव में विरोधियों को पूरी ताकत लगाने पर मजबूर कर दिया है.

