
इस बात की संभावना काफी कम है कि बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाले चुनाव से राज्य में सत्ता का गणित बदलेगा लेकिन इसके राजनीतिक नतीजे उच्च सदन से कहीं आगे तक जा सकते हैं. यह मुकाबला उन चार नेताओं के लिए शुरुआती परीक्षा बन गया है जिनकी महत्वाकांक्षाएं और राजनीतिक हैसियत बिहार की बदलती राजनीतिक व्यवस्था में एक-दूसरे से तेजी से जुड़ रही हैं.
नीतीश कुमार का सक्रिय चुनाव प्रचार से दूर रहना जनता दल (यूनाइटेड) यानी JDU पर उनकी पकड़ को लेकर सवाल खड़े करता है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को साबित करना होगा कि वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अलग-अलग घटक दलों को एकजुट रख सकते हैं.
नीतीश के बेटे निशांत कुमार के सामने अपनी ही पार्टी में राजनीतिक विश्वसनीयता स्थापित करने की शुरुआती चुनौती है. वहीं प्रशांत किशोर की जन सुराज सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर असंतोष को चुनावी लाभ में बदलने की कोशिश कर रही है.
JDU विधायक अनंत सिंह ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का खुलकर समर्थन किया है. ऐसे में 23 अक्टूबर का चुनाव विधान परिषद की सीटों का मुकाबला भर नहीं रह गया है. यह इस बात की परीक्षा है कि किस नेता की पकड़ अपने समर्थकों पर है, कौन पार्टी में अनुशासन कायम रख सकता है और बिहार की नई राजनीतिक व्यवस्था में उभरी दरारों का फायदा कौन उठा सकता है.
23 अक्टूबर को होने वाली वोटिंग की मतगणना 27 अक्टूबर को होगी. यह चुनाव NDA के लिए ऐसे समय हो रहा है जब गठबंधन पहले से ही दबाव में है. अगस्त में बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में BJP को अप्रत्याशित झटका लगा था. जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने यह सीट 19,324 वोटों से जीत ली थी.

अब पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मोकामा के JDU विधायक अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं. इससे सत्तारूढ़ गठबंधन के सामने एक अलग तरह की चुनौती खड़ी हो गई है. उसे सिर्फ बाहरी विरोध नहीं झेलना पड़ रहा बल्कि भीतर से भी असहमति का सामना करना पड़ रहा है.
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में यह विवाद पार्टी अनुशासन के साथ-साथ व्यक्तिगत वफादारी और स्थानीय राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से भी जुड़ा है. अनंत सिंह ने अपनी स्थिति छिपाने की कोशिश नहीं की है. उन्होंने कहा है कि वे अनुज सिंह का समर्थन जारी रखेंगे.
इसके लिए उन्होंने आरोप लगाया कि नीरज ने पहले उन्हें झूठे मामले में फंसाने की कोशिश की थी. सिंह का दावा है कि नीरज ने पिछले विधानसभा चुनावों में बार-बार उनकी हार सुनिश्चित करने की कोशिश की. अब उनके मुताबिक, हिसाब बराबर करने का समय आ गया है.
अनंत सिंह की बगावत ने JDU नेतृत्व को असहज स्थिति में डाल दिया है. अगर पार्टी इस बगावत पर कोई कार्रवाई नहीं करती तो इससे उसके आधिकारिक उम्मीदवार की स्थिति और नेतृत्व का अधिकार कमजोर पड़ सकता है. वहीं अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर यह जाहिर हो सकता है कि स्वतंत्र राजनीतिक जनाधार रखने वाले विधायक पर पार्टी का नियंत्रण कितना सीमित है. इस घटनाक्रम ने जन सुराज को भी सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर के असंतोष से फायदा उठाने और खुद को उसका विकल्प बताने का मौका दिया है.
इस मुकाबले का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि नीतीश कुमार, जिन्होंने इस साल की शुरुआत में राज्यसभा जाने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया था, JDU के उम्मीदवार के लिए सक्रिय प्रचार करते नजर नहीं आए. जिस पार्टी का संगठन और चुनावी अपील लंबे समय से नीतीश के व्यक्तिगत प्रभाव से जुड़ी रही है, उसके लिए उनकी यह गैरमौजूदगी और उसका असर साफ दिखाई देता है.
ये हालात एक विधान परिषद सीट के भविष्य से बड़ा सवाल उठाते हैं: क्या JDU सामूहिक अनुशासन कायम रख सकता है, जबकि उसका सबसे प्रभावशाली नेता अब सरकार का नेतृत्व नहीं कर रहा और स्थानीय चुनाव में भी खुलकर दखल देता नहीं दिख रहा? नीतीश का मुख्यमंत्री पद छोड़ना भले ही व्यवस्थित तरीके से हुआ हो लेकिन इससे पार्टी के राजनीतिक नेटवर्क पर उनका अधिकार किसी एक उत्तराधिकारी को अपने आप नहीं मिल गया है.
यहीं निशांत कुमार की भूमिका अहम हो जाती है. JDU की मुख्यधारा की राजनीति में आने और मंत्री पद संभालने के बाद उनके सामने यह साबित करने की चुनौती है कि उनकी मौजूदगी संगठन पर प्रभाव में भी बदल सकती है. विधान परिषद का यह चुनाव सीधे तौर पर उनके नेतृत्व पर जनमत संग्रह नहीं है.

इसका नतीजा पंजीकृत स्नातकों और शिक्षकों के सीमित मतदाता वर्ग के समीकरणों पर निर्भर करेगा. फिर भी, जिस निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी का मौजूदा विधायक विपक्षी उम्मीदवार के लिए प्रचार कर रहा है, वहां JDU अपने उम्मीदवार के पीछे कितनी मजबूती से खड़ा होता है, इससे निशांत की उभरती राजनीतिक हैसियत को लेकर धारणा जरूर बनेगी.
परीक्षा सिर्फ यह नहीं है कि वे किसी उम्मीदवार के लिए प्रचार कर सकते हैं या उसे जीत दिला सकते हैं. असली सवाल यह है कि क्या JDU ऐसा नेतृत्व ढांचा विकसित कर सकता है जो हर विवाद सुलझाने के लिए नीतीश पर निर्भर हुए बिना प्रभावी ढंग से काम करे.
पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का खराब प्रदर्शन अपने आप यह साबित नहीं करेगा कि निशांत का पार्टी पर प्रभाव नहीं है. लेकिन इससे यह सवाल और गहरा सकता है कि पीढ़ीगत बदलाव के दौर से गुजर रही JDU में अब किसकी चलती है और पार्टी पर किसका कितना नियंत्रण है.
दूसरी ओर चौधरी के सामने भी ऐसी ही चुनौती है. बिहार के पहले BJP मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें साबित करना होगा कि वे ऐसे गठबंधन को संभाल सकते हैं, जिसमें JDU की अपनी राजनीतिक पहचान है, छोटे सहयोगी दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं और स्थानीय नेता कभी-कभी आधिकारिक रुख के खिलाफ भी कदम उठा सकते हैं. इसलिए पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला सिर्फ JDU का अंदरूनी मामला नहीं है. यह गठबंधन की राजनीति के तौर-तरीकों को लागू कराने की मुख्यमंत्री की क्षमता की भी परीक्षा है.
दिक्कत यह है कि गठबंधन की एकजुटता को लेकर सार्वजनिक घोषणाओं से उसके भीतर के मतभेद जरूरी नहीं कि दूर हो गए हों. चौधरी बैठकें बुला सकते हैं, अनुशासन बनाए रखने की अपील कर सकते हैं और आधिकारिक उम्मीदवारों का समर्थन कर सकते हैं. लेकिन उनके अधिकार का असली आकलन इस बात से होगा कि स्थानीय वफादारी और राजनीतिक हितों के टकराने पर गठबंधन के नेता और विधायक इन अपीलों के मुताबिक काम करते हैं या नहीं.
विधान परिषद की इन आठ सीटों में चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की हैं. इन सीटों पर खास मतदाता वर्गों के लोग ही मतदान करते हैं. ऐसे चुनावों में अक्सर व्यक्तिगत संपर्क, पेशेवर नेटवर्क और प्रतिस्पर्धी दलों का संगठनात्मक तंत्र अहम भूमिका निभाते हैं. इसलिए किसी मौजूदा विधायक की बगावत या किसी असंतुष्ट उम्मीदवार का मैदान में बने रहना नतीजे पर उसके संख्यात्मक असर से कहीं ज्यादा मायने रख सकता है.
इससे पार्टी के भीतर के मतभेद सामने आते हैं, कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होता है और विपक्ष को यह दावा करने का मौका मिलता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन दिखने में जितना एकजुट है, वास्तव में उतना नहीं है.
खास तौर पर जन सुराज के पास अनंत सिंह की बगावत से पैदा हुए असंतोष को राजनीतिक मुद्दा बनाने का मौका है. बांकीपुर में उसकी जीत ने दिखाया था कि वह लंबे समय से BJP का गढ़ माने जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में भी उसे हरा सकती है. हालांकि विधान परिषद चुनाव में उसी नतीजे को दोहराया जाना तय नहीं है. यहां मतदाता वर्ग अलग है, उम्मीदवार अलग हैं और राजनीतिक समीकरण ज्यादा स्थानीय हैं. फिर भी, सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर के मतभेद उसके चुनाव प्रचार को कमजोर करते हैं तो जन सुराज को इसका लाभ मिल सकता है.
इसलिए इस चुनाव का महत्व सरकार के गठन से ज्यादा बिहार के राजनीतिक तंत्र के भीतर सत्ता और अधिकार के बंटवारे से जुड़ा है. नीतीश के लिए यह परीक्षा होगी कि प्रचार से दूर रहने के बावजूद उनका प्रभाव कितना निर्णायक बना हुआ है. निशांत के लिए यह शुरुआती संकेत होगा कि JDU नई पीढ़ी के नेतृत्व में किस हद तक काम करना शुरू कर सकता है. वहीं चौधरी के लिए यह चुनाव बताएगा कि मुख्यमंत्री के तौर पर उनका अधिकार सरकार की औपचारिक व्यवस्था से आगे बढ़कर गठबंधन के अलग-अलग राजनीतिक नेटवर्क तक पहुंचता है या नहीं.
अगर NDA के आधिकारिक उम्मीदवार जीतते हैं, तो गठबंधन इसे अपने भीतर उभरे शुरुआती मतभेदों पर काबू पाने के संकेत के तौर पर पेश कर सकता है. लेकिन अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, खासकर उस सीट पर जहां JDU का मौजूदा विधायक खुले तौर पर विरोधी उम्मीदवार का समर्थन कर रहा है, तो यह धारणा मजबूत हो सकती है कि नीतीश कुमार के बाद गठबंधन में नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव का नया संतुलन अब तक तय नहीं हो पाया है.
27 अक्टूबर को आने वाले नतीजे सरकार के बने रहने या गिरने का फैसला नहीं करेंगे. हालांकि वे शुरुआती संकेत दे सकते हैं कि किसकी बात मानी जाती है, कौन पार्टी के आधिकारिक रुख को चुनौती दे सकता है और किसके पास गठबंधन को एकजुट रखने का अधिकार है.
बिहार में यही फैसला शायद कहीं ज्यादा मायने रखता है.

