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बिहार विधान परिषद चुनाव में RJD के साथ रहते हुए उसी को चुनौती क्यों दे रही कांग्रेस?

शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की आठ सीटों पर कांग्रेस ने जिस तरह चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है उससे संकेत मिलता है कि वह अपनी अलग पहचान के लिए गठबंधन की एकता को भी जोखिम में डालने को तैयार है

tejashwi yadav rahul gandhi mobile
तेजस्वी यादव और राहुल गांधी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 12 अक्टूबर , 2026

बिहार में 23 अक्टूबर को विधान परिषद की आठ सीटों पर चुनाव होने हैं. इन चुनावों से न तो विधानसभा की तस्वीर बदलेगी, न मंत्रिमंडल पर असर पड़ेगा और न ही यह तय होगा कि राज्य में किसकी सरकार बनेगी. 

ये विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र हैं जहां सीमित मतदाता ही वोट डालते हैं. इनमें पंजीकृत शिक्षक और डिग्रीधारक शामिल हैं. मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 16 नवंबर को खत्म हो रहा है. यही वजह है कि इन चुनावों में कांग्रेस के उतरने का तरीका महत्वपूर्ण है. वह अपनी अलग पहचान बनाने के लिए गठबंधन की एकता को जोखिम में डालने को तैयार दिख रही है.

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने पहले कदम उठाया. सितंबर की शुरुआत में उसने आठ में से छह सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए. दो सीटें छोड़ दी गईं. इनमें दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल था, जिसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस के मौजूदा विधान परिषद सदस्य (MLC) और पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा करते हैं. दूसरी सीट तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र थी जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के पास है. सीटों के बंटवारे को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई थी.

एक अक्टूबर को कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने RJD के इस कदम का जवाब दिया. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल की मंजूरी से जारी सूची में कांग्रेस ने पांच उम्मीदवार उतारे. मदन मोहन झा को फिर से दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दिया गया. संजय यादव को पटना शिक्षक, असदुल्लाह खान को पटना स्नातक, रजनीकांत पाठक को दरभंगा स्नातक और मनोज कुमार जायसवाल को कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया गया.

बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम का कहना है कि RJD के साथ कोई मतभेद नहीं है (फाइल फोटो)
बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम का कहना है कि RJD के साथ कोई मतभेद नहीं है (फाइल फोटो)

इनमें से तीन स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में RJD पहले ही अपने उम्मीदवार उतार चुकी थी. कांग्रेस की सूची आने के बाद RJD ने मदन मोहन झा के खिलाफ भी कुमार राय को मैदान में उतार दिया. अब आठ में से पांच सीटों पर दोनों सहयोगी दल आमने-सामने हैं.

इसके उलट, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने आठों सीटों का बंटवारा साफ तौर पर कर लिया. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (यूनाइटेड) को चार-चार सीटें मिलीं.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम का कहना है कि दोनों दलों के बीच कोई मतभेद नहीं है. असली लड़ाई NDA से है और उम्मीदवारों की सूची पार्टी कार्यकर्ताओं की भावना को दर्शाती है. RJD नेताओं का कहना है कि वामपंथी दल, कांग्रेस और उनकी पार्टी लंबे समय से स्नातक, शिक्षक और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग लड़ते रहे हैं.

दोनों बातें सही हो सकती हैं लेकिन इससे असली मुद्दा खत्म नहीं होता. विधान परिषद की किसी सीट पर सहयोगी दलों के बीच दोस्ताना मुकाबला छोटी बात है. लेकिन जब बड़ा सहयोगी दल अपनी सूची पहले ही जारी कर चुका हो तब उसके बाद उसी सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला करना और उस फैसले को दिल्ली से मंजूरी मिलना अलग बात है.

बिहार में कांग्रेस करीब दो दशक से RJD के पीछे चलती रही है. कांग्रेस का संगठन लगातार कमजोर होता गया जबकि RJD के पास मुस्लिम-यादव मतदाताओं का आधार था और विपक्ष का नेतृत्व करने का दावा भी. यह समझौता तब तक चलता रहा जब तक RJD सत्ता तक पहुंचने का एकमात्र मजबूत जरिया दिखाई देती रही. लेकिन अब स्थिति वैसी नहीं है.

नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में RJD को बड़ा झटका लगा. 2020 में 75 सीटें जीतने वाली पार्टी इस बार सिर्फ 25 सीटों पर सिमट गई. कांग्रेस की सीटें भी 19 से घटकर छह रह गईं. अब 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में महागठबंधन के पास करीब 35 सीटें हैं.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)

इस कमजोरी में पहली खुली दरार मार्च में दिखी. 16 मार्च को राज्यसभा की पांच सीटों के लिए चुनाव हुआ. पहली वरीयता के वोटों से जीतने के लिए 41 वोटों का आंकड़ा जरूरी था. विपक्ष के पास अपने 35 विधायक थे. इसके अलावा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के पांच विधायकों और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के एकमात्र विधायक का समर्थन मिलने की उम्मीद थी. इस तरह विपक्ष एक सीट जीतने की स्थिति में पहुंच सकता था. उसने RJD के मौजूदा राज्यसभा सदस्य अमरेंद्र धारी सिंह को दोबारा उम्मीदवार बनाया.

चार विधायकों ने वोट नहीं डाला. इनमें वाल्मीकिनगर से कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा, फारबिसगंज से मनोज बिस्वास और मनिहारी से मनोहर प्रसाद शामिल थे. चौथे विधायक RJD के ढाका से विधायक फैसल रहमान थे. अमरेंद्र धारी सिंह को पहली वरीयता के 37 वोट मिले. NDA ने पांचों सीटें जीत लीं. इनमें BJP के शिवेश कुमार की पांचवीं सीट भी शामिल थी.

कांग्रेस ने अनुपस्थित विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किए. इन विधायकों ने अपनी-अपनी सफाई दी. इनमें यह दलील भी शामिल थी कि RJD ने उन्हें महत्व नहीं दिया और प्रदेश अध्यक्ष का टेक्स्ट मैसेज भेजना बातचीत का विकल्प नहीं हो सकता. 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने कांग्रेस पर जीत सकने वाली सीट का वोट बर्बाद करने का आरोप लगाया. विधायकों के निजी कारण चाहे जो रहे हों, नतीजा सबके सामने था. गठबंधन अपने ही साझा उम्मीदवार के लिए अपने विधायकों के वोट सुनिश्चित नहीं कर पाया.

मौजूदा विधान परिषद चुनाव उसी खींचतान का अगला अध्याय हैं लेकिन यहां दांव कम हैं. बिहार के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस के उस सामाजिक आधार का हिस्सा हैं जिसे वह अब भी अपना मानती है. यह शहरी और शिक्षित मतदाताओं का वर्ग है, जिसे वह RJD से उधार लिया हुआ आधार नहीं मानना चाहती. 

RJD की ओर से पहले ही दावा की जा चुकी सीटों पर उम्मीदवार उतारना इसी वर्ग के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश है, न कि सरकार गिराने की. तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र औपचारिक रूप से CPI के लिए छोड़ दिया गया. हालांकि, वहां कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल किया. इससे पता चलता है कि कांग्रेस अपनी दावेदारी पेश तो कर रही है लेकिन गठबंधन के भीतर उसकी यह कोशिश सीमित है.

RJD ने इसका जवाब देते हुए उस सीट पर भी उम्मीदवार उतार दिया जहां मौजूदा सदस्य कांग्रेस का है. सिर्फ 25 विधायकों तक सिमट जाने के बावजूद RJD विधान परिषद को अब भी अपना क्षेत्र मानती दिख रही है. वहीं छह विधायकों वाली कांग्रेस ने तय किया है कि बची हुई सीटें स्वीकार करने से बेहतर है कि ऐसे चुनाव में वोट बंटने का जोखिम उठाया जाए, जिसका विधानसभा के समीकरणों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. 

दोनों दल अब भी महागठबंधन में हैं. लेकिन गठबंधन में सहयोगी दल के पीछे चलने की व्यवस्था सबसे पहले उन्हीं चुनावों में कमजोर पड़ती है जहां सत्ता का फैसला नहीं होना होता. ऐसे चुनावों में छोटे सहयोगी दल के पास यह परखने का मौका होता है कि क्या उसका अपना संगठन अब भी चुनावी ताकत रखता है.

23 अक्टूबर के बाद जो भी नतीजा आएगा उससे सत्ता पक्ष की सीटों में कोई बदलाव नहीं होगा. लेकिन दोनों दलों को एक ऐसा आंकड़ा जरूर मिलेगा जिसका इस्तेमाल वे आगे कर सकते हैं. स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या इतनी कम है कि वोटों का हिसाब आसानी से लगाया जा सकता है. साथ ही ये मतदाता मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों से आते हैं. 

कांग्रेस इन्हें अपना आधार बताना चाहती है. अगर उसके उम्मीदवार RJD प्रत्याशियों के मुकाबले अच्छा वोट हासिल करते हैं तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अगली बार सीटों के बंटवारे पर बातचीत के लिए नया तर्क मिल सकता है. यह बातचीत किसी उपचुनाव, राज्यसभा की खाली होने वाली सीट या लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची को लेकर हो सकती है.

अगर कांग्रेस उम्मीदवारों को खास समर्थन नहीं मिलता तो RJD का पुराना तर्क फिर मजबूत होगा. उसके मुताबिक बिहार में कांग्रेस के पास झंडा तो है लेकिन चुनाव लड़ने वाला मजबूत संगठन नहीं. पार्टी यह भी कह सकती है कि 16 मार्च को कांग्रेस विधायकों का वोट डालने नहीं पहुंचना कोई अपवाद नहीं बल्कि एक आदत है. 

दोनों में से कोई भी नतीजा आए, महागठबंधन कागजों पर तो बना रहेगा लेकिन व्यवहार में उसकी एकजुटता और कमजोर होगी. विधानसभा में 200 से ज्यादा सीटों के साथ NDA को सरकार चलाने के लिए वोटों के बंटवारे की जरूरत नहीं है. उसे सिर्फ इतना चाहिए कि विपक्ष यह साबित करता रहे कि जिन चुनावों का सत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता उनमें भी वह एकजुट होकर मुकाबला नहीं कर सकता.

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