
इन दिनों पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से पूरी दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही है. लोग इंडक्शन चूल्हा और इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीदने की होड़ में हैं. वहीं पश्चिमी चंपारण के बर्निहार गांव के विवेक प्रियदर्शी का परिवार पूरी तरह निश्चिंत है. इस बारे में खुलासा करते हुए वे कहते हैं, “चाहे सिलेंडर मिले न मिले, पेट्रोल की कीमत कितनी भी बढ़ जाए या खेती के लिए यूरिया न मिले, हमें फर्क नहीं पड़ता. हम अपनी ऊर्जा की जरूरतें गांव के दायरे में ही पूरी कर लेते हैं.”
विवेक के दावे में सच्चाई है. 40 सदस्यों वाले और चार यूनिट में बंट चुके उनके परिवार ने कभी एलपीजी कनेक्शन नहीं लिया. उन्होंने बिजली कनेक्शन तो लिया है, मगर वे पावरग्रिड कॉरपोरेशन की बिजली इस्तेमाल नहीं करते. उनका परिवार लगभग दो सौ एकड़ जमीन पर खेती करता है, मगर वे खेतों में न तो उर्वरक डालते हैं और न ही कीटनाशक. यहां तक कि उनके दो फोर-व्हीलर और दो ट्रैक्टर चलाने के लिए भी पेट्रोल या डीजल की जरूरत नहीं पड़ती.
इस पूरे परिवार के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत गोबर है. विवेक बताते हैं, “यह सिलसिला आज से नहीं बल्कि 1968 से चल रहा है. सबसे पहले मेरे दादा स्वर्गीय राजाराम पांडेय ने गोबर गैस का इस्तेमाल शुरू किया था. तब से आज तक हमारे घर के चूल्हे उसी से जलते हैं. पहले इससे फिलामेंट वाले बल्ब भी जलते थे, लेकिन अब हम सोलर पर शिफ्ट हो गए हैं. 2012-13 से हम ट्रैक्टर और गाड़ियां भी इसी गोबर गैस से चला रहे हैं.”

नरकटियागंज प्रखंड के बर्निहार गांव में पहले राजाराम पांडेय का एक ही परिवार होता था, जो बाद में चार हिस्सों में बंट गया. हालांकि उन्होंने जिस परंपरा की शुरुआत की थी, वह आज भी जारी है. उनके किसी भी घर में आज तक एलपीजी कनेक्शन नहीं लिया गया है.
विवेक बताते हैं, “हमारे परिवार की तीन पीढ़ियों ने अलग-अलग चरणों में इस परंपरा को आगे बढ़ाया. नब्बे के दशक में मेरे पिता विजय कुमार पांडेय ने बायोगैस-जेनसेट तैयार किया, जिससे बिजली की जरूरत पूरी होने लगी. आज भी हमारे खेतों की सिंचाई दिन में सोलर मोटर से और रात में बायोगैस जेनसेट से होती है. घर में बिजली की आपूर्ति भी रात के वक्त बायोगैस जेनसेट से ही की जाती है. उनके बाद मैंने 2012-13 में बायोगैस से गाड़ियां चलाने की तकनीक अपने घर में शुरू की.” मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले विवेक ने आईआईटी दिल्ली से अप्रेंटिसशिप की थी. वहां उन्होंने विशेष रूप से बायोगैस बॉटलिंग का प्रशिक्षण लिया और फिर उसे अपने गांव में लागू किया. वे इसे बायो-सीएनजी कहते हैं.

विवेक के अनुसार, “यह ईंधन काफी सस्ता पड़ता है. सभी खर्च जोड़ने के बाद भी बायो-सीएनजी 12 रुपये किलो पड़ती है और मैं एक किलो में 15 किमी का सफर तय करता हूं. जबकि डीजल की कीमत यहां 95 रुपए लीटर के आसपास है और उससे माइलेज भी 12 किमी प्रति लीटर ही मिलता है. यानी मेरा खर्च लगभग सात गुना कम हो गया है. खेती में भी इसी तरह हमारी लागत कम हुई है.”
हालांकि गोबर गैस से इतने बड़े परिवार की जरूरतें, खेती और गाड़ियां संभालना आसान नहीं है. इसके लिए भारी मात्रा में गोबर की आवश्यकता होती है. इसकी पूर्ति परिवार की गोशाला से होती है, जिसमें करीब सौ गायें हैं. विवेक बताते हैं, “ये सभी जंगली गायें हैं और इनके गोबर से बायोगैस प्लांट चल रहा है.” जरूरत पड़ने पर विवेक गांव वालों से गोबर खरीदते भी हैं.
विवेक ने अपने इस प्रयोग को घर से बाहर भी विस्तार दिया है. उनके गांव के पास ही वाल्मीकि नगर का जंगल शुरू हो जाता है, जहां के ग्रामीण ईंधन के लिए लकड़ी पर निर्भर हैं. इससे उन पर जंगली जानवरों के हमले का खतरा बना रहता है और वन विभाग से भी टकराव होता है. ऐसे में विवेक ने वाल्मीकि नगर टाइगर रिजर्व फाउंडेशन को सुझाव दिया कि इन गांवों में बायोगैस का इस्तेमाल किया जा सकता है.
विवेक ने वहां के 22 परिवारों को बायोगैस की तकनीक समझाई और प्लांट शुरू करवाए. अब उन घरों में भी बायोगैस के चूल्हे जल रहे हैं.

