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बिहार में पैसों के लिए नहीं, बदला लेने के लिए हो रहा साइबर क्राइम!

बिहार में साइबर अपराध के ज्यादा मामले पैसों के लिए नहीं बल्कि बदला लेने, अपमानित करने और निजी दुश्मनी निकालने से जुड़े हैं. निजी झगड़े अब डिजिटल दुनिया तक पहुंच रहे हैं

बिहार में साइबर क्राइम के 63% मामले निजी बदले से जुड़े हैं (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 28 अक्टूबर , 2026

बिहार में साइबर अपराध की सबसे बड़ी वजह अब भी धोखाधड़ी है. 2024 में राज्य में धोखाधड़ी से जुड़े 3,771 मामले दर्ज किए गए. वहीं बदले की भावना से जुड़े 1,167 और गुस्से जैसी भावनाओं से प्रेरित 842 मामले सामने आए. लेकिन राष्ट्रीय आंकड़ों से तुलना करने पर एक चौंकाने वाली असमानता सामने आती है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की भारत में अपराध 2024 रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में ‘निजी बदले’ की श्रेणी में दर्ज साइबर अपराध के 1,850 मामलों में से 1,167 बिहार में दर्ज हुए. यह कुल मामलों का 63 फीसदी से ज्यादा है. 

इसी तरह, गुस्से जैसी भावनाओं से प्रेरित देशभर के 1,336 मामलों में से 842 बिहार में दर्ज किए गए. इसके उलट देशभर में धोखाधड़ी से जुड़े 73,987 साइबर अपराधों में बिहार के 3,771 मामले थे. यह कुल मामलों का करीब 5 फीसदी है.

ये आंकड़े एक अलग तरह के पैटर्न की ओर इशारा करते हैं. कुल मामलों की संख्या के लिहाज से वित्तीय धोखाधड़ी सबसे बड़ी श्रेणी बनी हुई है. लेकिन निजी बदले या गुस्से को मुख्य वजह मानकर दर्ज किए गए साइबर अपराधों में बिहार की हिस्सेदारी देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले असाधारण रूप से ज्यादा है.

ये आंकड़े इस अंतर की वजह नहीं बताते. लेकिन एक अहम सवाल जरूर उठाते हैं. आखिर बिहार में रुपए-पैसे के बजाय निजी रंजिश से जुड़े साइबर अपराधों का अनुपात इतना ज्यादा क्यों है?

हाल की घटनाओं से पता चलता है कि ऐसे विवाद किस तरह सामने आ रहे हैं. शादी में विवाद के बाद निजी तस्वीरें वायरल करने से लेकर किसी महिला की प्रतिष्ठा खराब करने के लिए AI से अश्लील सामग्री तैयार करने तक, डिजिटल मंच बदला लेने के साधन बनते जा रहे हैं. चुनौती यह समझने की है कि निजी विवादों और साइबर अपराध के संबंध के बारे में ये आंकड़े क्या बताते हैं और किन सवालों का जवाब नहीं देते.

बिहार में साइबर क्राइम के कई ऐसे मामले सामने आए जब निजी तस्वीरें वायरल की गईं (सांकेतिक तस्वीर)
बिहार में साइबर क्राइम के कई ऐसे मामले सामने आए जब निजी तस्वीरें वायरल की गईं (सांकेतिक तस्वीर)

बिहार में 2024 के दौरान साइबर अपराध के 6,380 मामले दर्ज किए गए. यह पिछले साल दर्ज 4,450 मामलों के मुकाबले करीब 43 फीसदी की बढ़ोतरी थी. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इस बढ़ोतरी की एक वजह शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था में सुधार और शिकायतों को FIR में बदलने की प्रक्रिया भी है. हालांकि राज्य में बदले की भावना से जुड़े साइबर अपराधों की असामान्य रूप से ज्यादा हिस्सेदारी के पीछे भी यही वजह है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.

यह सिलसिला 2026 में भी जारी रहा. जून में कटिहार की साइबर पुलिस ने दयानंद कुमार को गिरफ्तार किया. उस पर अपनी पत्नी की निजी और आपत्तिजनक तस्वीरें व वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करने का आरोप था. जांचकर्ताओं के मुताबिक उसे शक था कि उसकी पत्नी का किसी दूसरे व्यक्ति से विवाहेतर संबंध है. इसी गुस्से में उसने यह कदम उठाया. पत्नी की शिकायत के बाद उसे गिरफ्तार किया गया. बाद में उसने कथित तौर पर अपनी हरकत को गलती बताया.

पुलिस के रिकॉर्ड बताते हैं कि समस्या कुछ अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं है. अगस्त से अक्टूबर की शुरुआत के बीच बिहार पुलिस को 100 से ज्यादा शिकायतें मिलीं. इनमें निजी तस्वीरें सर्कुलेट करने या उनमें AI की मदद से बदलाव कर बनाई गई तस्वीरें वायरल करने की धमकियां शामिल थीं. 

अधिकारियों ने बताया कि करीब 80 फीसदी शिकायतें ऐसे लोगों से जुड़ी थीं जो पहले एक-दूसरे के साथ करीबी रिश्ते में रह चुके थे. रिश्ता टूटने के बाद कुछ लोगों ने कथित तौर पर AI और डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर सामान्य तस्वीरों को अश्लील तस्वीरों में बदला और उन्हें ऑनलाइन करने की धमकी दी.

मुजफ्फरपुर में अक्टूबर में पुलिस ने एक मामला दर्ज किया. आरोप था कि AI की मदद से एक युवती का आपत्तिजनक वीडियो बनाया गया और सर्कुलेट किया गया. शिकायत के मुताबिक, यह वीडियो उसके होने वाले ससुराल वालों तक पहुंच गया जिसके बाद उसकी सगाई टूट गई. इस मामले में चार भाई-बहनों को आरोपी बनाया गया. जांचकर्ताओं ने कहा कि युवती की प्रतिष्ठा खराब करने के लिए यह सामग्री तैयार की गई और साझा की गई थी.

ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि डिजिटल उत्पीड़न किस तरह निजी रंजिश को सार्वजनिक अपमान में बदल सकता है. कोई रिश्ता टूटता है, पारिवारिक विवाद बढ़ता है या किसी बात से आहत होकर मन में नाराजगी पैदा होती है. इसके बाद सोशल मीडिया बदला लेने का तुरंत उपलब्ध साधन बन जाता है.

इसके नतीजे मूल विवाद से कहीं आगे तक जा सकते हैं. AI टूल्स आने से यह खतरा और बढ़ गया है. अब बदली हुई या फर्जी तस्वीरें बनाने के लिए तकनीकी रूप से बहुत दक्ष होना जरूरी नहीं है.

अब AI के इस्तेमाल से फर्जी तस्वीरें बनाकर वायरल करना आसान हो गया है (सांकेतिक तस्वीर)
अब AI के इस्तेमाल से फर्जी तस्वीरें बनाकर वायरल करना आसान हो गया है (सांकेतिक तस्वीर)

ऐसे अपराध केवल डीपफेक तक सीमित नहीं हैं. फर्जी प्रोफाइल, तस्वीरों से छेड़छाड़, साइबर-स्टॉकिंग, ऑनलाइन धमकियां देना और डिजिटल मीडियम से छवि खराब करना भी किसी को डराने, परेशान करने या बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. 

2026 की पहली छमाही में बिहार की साइबर अपराध एवं सुरक्षा इकाई ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में 475 FIR दर्ज कीं और 103 लोगों को गिरफ्तार किया. अधिकारियों के मुताबिक इनमें से कई मामले रिश्ते टूटने या निजी विवादों के बाद महिलाओं को परेशान करने से जुड़े थे.

वित्तीय धोखाधड़ी के आंकड़ों से तुलना करने पर यह अंतर और स्पष्ट होता है. देशभर में 2024 में वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े साइबर अपराध के 73,987 मामले दर्ज किए गए. यह अन्य श्रेणियों के मुकाबले सबसे बड़ी संख्या थी. इनमें बिहार की हिस्सेदारी करीब 5 फीसदी थी. इसके उलट, निजी बदले और गुस्से की श्रेणियों में देशभर में दर्ज कुल मामलों में बिहार की हिस्सेदारी करीब 63 फीसदी थी.

हालांकि इन आंकड़ों को सावधानी से समझने की जरूरत है. ये दर्ज मामलों का बंटवारा बताते हैं, यह नहीं कि किसी राज्य के लोगों में साइबर अपराध करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति ज्यादा है. शिकायत दर्ज कराने के तरीकों, पुलिस की ओर से मामलों दर्ज करने और अपराध के पीछे की मंशा को वर्गीकृत करने के तरीकों में अंतर का असर इन आंकड़ों पर पड़ सकता है. 

यह भी स्पष्ट नहीं है कि निजी बदले और गुस्से जैसी भावनाओं से जुड़े मामले पूरी तरह अलग-अलग श्रेणियां हैं या नहीं. यह इस बात पर निर्भर करता है कि NCRB अपराधों का वर्गीकरण कैसे करता है.

इन सावधानियों के बावजूद, आंकड़ों में यह अंतर नजरअंदाज करना मुश्किल है. निजी बदले और गुस्से से जुड़े देशभर के दर्ज साइबर अपराधों में बिहार की हिस्सेदारी इतनी ज्यादा क्यों है? क्या राज्य में ऐसे विवादों की शिकायत किए जाने और उन्हें साइबर अपराध के रूप में दर्ज किए जाने की संभावना ज्यादा है? या फिर निजी हिसाब चुकता करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है?

मौजूदा आंकड़े इन सवालों के जवाब नहीं देते. लेकिन वे यह जरूर दिखाते हैं कि निजी विवाद कितनी आसानी से ऑनलाइन पहुंच सकते हैं. किसी की निजी तस्वीर सार्वजनिक करने की धमकी उसे दबाव में लाने का साधन बन सकती है. 

किसी की मॉर्फ्ड इमेज का इस्तेमाल उसके परिवार या समुदाय में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है. कोई रिश्ता टूटने के बाद यह उत्पीड़न का रूप ले सकता है. विवाद खत्म होने के लंबे समय बाद भी डिजिटल दुनिया में उसके नतीजे बने रह सकते हैं.

देश के बाकी हिस्सों की तरह ही बिहार में भी साइबर अपराध की सबसे बड़ी वजह रुपए-पैसे के लिए की जाने वाली धोखाधड़ी है, जैसा कि देश के बाकी हिस्सों में है. लेकिन बदले और गुस्से से जुड़े मामलों में राज्य की असाधारण रूप से ज्यादा हिस्सेदारी समस्या के एक अलग और बढ़ते पहलू को उजागर करती है. 

इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल अपराधी के परिचित लोगों को सजा देने, शर्मिंदा करने और उनसे बदला लेने के लिए किया जा रहा है. आंकड़े अभी यह नहीं बताते कि बिहार इस मामले में बाकी राज्यों से इतना अलग क्यों है. लेकिन वे इस बात की पड़ताल करने की मजबूत वजह जरूर देते हैं कि निजी रंजिश किस तरह तेजी से सार्वजनिक डिजिटल अपराधों में बदल रही है.

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