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बिहार में CM के निर्देश अब फाइलों में गुम नहीं होंगे! नया डिजिटल सिस्टम क्या बदलेगा?

बिहार सरकार ने एक डिजिटल डैशबोर्ड बनाया है ताकि मुख्यमंत्री के निर्देश भुलाए न जाएं. केंद्र सरकार के साथ तालमेल पर नजर रखने के लिए एक पोर्टल भी शुरू किया गया है

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 16 अक्टूबर , 2026

बिहार की सरकारी व्यवस्था अब एक दिलचस्प बदलाव से गुजर रही है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कोई निर्देश देकर आगे बढ़ सकते हैं. कम से कम सैद्धांतिक तौर पर अब सरकारी तंत्र उस निर्देश को नहीं भूलेगा.

13 अक्टूबर को बिहार के मुख्यमंत्री ने संकल्प डैशबोर्ड और समन्वय पोर्टल की शुरुआत की. इसके जरिए राज्य के सभी 48 सरकारी विभागों के कामकाज को एक साझा डिजिटल मंच पर लाया गया है. साथ ही, मुख्यमंत्री के निर्देशों, कैबिनेट के फैसलों और महत्वपूर्ण सरकारी पत्राचार के बाद हुई कार्रवाई पर नजर रखने की व्यवस्था की गई है. 

इसका मकसद सीधा है. समीक्षा बैठक में दिया गया कोई निर्देश फाइलों में दबकर या अफसरशाही की याददाश्त से निकलकर गुम नहीं होना चाहिए. संबंधित विभाग ने उस पर क्या कार्रवाई की, यह जानकारी डैशबोर्ड पर तब तक दर्ज रहनी चाहिए जब तक कि विभाग कार्रवाई का ब्योरा न दे दे.

मुख्य सचिवालय के संवाद सभागार में शुरू किए गए संकल्प डैशबोर्ड पर सभी 48 विभागों के प्रमुख कार्यों और बड़ी परियोजनाओं से जुड़ी जानकारी उपलब्ध होगी. इसमें छह प्रमुख मॉड्यूल हैं: मुख्यमंत्री स्तर पर निगरानी, परियोजनाएं और निवेश, विभागीय प्रजेंटेशन, प्रदर्शन और रैंकिंग, समन्वय और मामला आगे बढ़ाने की व्यवस्था, तथा क्षेत्रीय स्तर पर कामकाज और जनता से संपर्क. 20 से अधिक सब-मॉड्यूल के जरिए सरकारी योजनाओं, परियोजनाओं और विभागीय कामकाज से जुड़ी जानकारी पर नजर रखी जाएगी.

'संकल्प' पोर्टल से सरकारी परियोजनाओं की निगरानी आसान होगी (सांकेतिक फोटो)
'संकल्प' पोर्टल से सरकारी परियोजनाओं की निगरानी आसान होगी (सांकेतिक फोटो)

डैशबोर्ड पर समीक्षा बैठकों में मुख्यमंत्री की ओर से दिए गए निर्देशों, सरकारी घोषणाओं, मंत्रिपरिषद के फैसलों और महत्वपूर्ण आधिकारिक पत्राचार पर हुई कार्रवाई का ब्योरा भी दर्ज होगा. विभागों की प्रस्तुतियां और ब्रीफिंग से जुड़ी सामग्री भी इस मंच पर उपलब्ध रहेगी.

इसके साथ शुरू किए गए समन्वय पोर्टल का उद्देश्य अलग लेकिन इससे जुड़ा हुआ है. यह बिहार सरकार और केंद्र के बीच तालमेल पर नजर रखेगा. इसके जरिए केंद्र प्रायोजित योजनाओं, केंद्र सरकार से मिले धन के इस्तेमाल, राष्ट्रीय रैंकिंग और दोनों सरकारों के बीच समन्वय की जरूरत वाले महत्वपूर्ण मामलों की निगरानी की जाएगी. दिल्ली में बिहार के रेजिडेंट कमिश्नर इस समन्वय व्यवस्था की निगरानी करेंगे.

चौधरी ने कहा कि इन दोनों डिजिटल मंचों से सरकारी कामकाज की "एकीकृत, समयबद्ध और नतीजों पर केंद्रित निगरानी" सुनिश्चित होगी. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि केंद्र से मिलने वाली राशि का समय पर इस्तेमाल हो और केंद्र प्रायोजित योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए.

इसकी अहमियत क्या है?

मुख्यमंत्री और शीर्ष प्रशासनिक नेतृत्व के सामने शासन चलाने की एक पुरानी समस्या यह है कि फैसले लेने में ही नहीं बल्कि उन्हें लागू कराने में भी दिक्कत आती है. सरकार किसी योजना की घोषणा कर सकती है, किसी परियोजना को मंजूरी दे सकती है या समीक्षा बैठक में निर्देश जारी कर सकती है. लेकिन इसके बाद उसे लागू करने की जिम्मेदारी अफसरशाही की कई परतों से होकर गुजरती है. 

फाइलें विभागों के बीच घूमती हैं, मंजूरियां लेनी पड़ती हैं, धन जारी करना होता है, टेंडर निकाले जाते हैं, अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल बैठाना पड़ता है और जमीनी स्तर के अधिकारियों को काम में लगाना होता है. हर चरण में काम की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. शीर्ष स्तर पर जो फैसला तत्काल लागू किया जाना जरूरी लगता है, वह धीरे-धीरे प्रशासनिक कामकाज की लंबी कतार में एक और मामला बन सकता है.

यहीं निगरानी व्यवस्था की अहमियत सामने आती है. मुख्यमंत्री 48 विभागों के सैकड़ों फैसलों पर खुद लगातार नजर नहीं रख सकते. मुख्य सचिव और वरिष्ठ अधिकारी भी केवल बैठकों के भरोसे यह नहीं जान सकते कि दो समीक्षा बैठकों के बीच क्या हुआ. 

ऐसा डैशबोर्ड, जिसमें मूल निर्देश दर्ज हो, जिम्मेदार अधिकारी या विभाग तय हो और उसके बाद हुई कार्रवाई का ब्योरा मिलता रहे, प्रशासनिक कामकाज का एक सिलसिलेवार रिकॉर्ड बना सकता है. इससे यह पहचानने में भी मदद मिल सकती है कि कोई परियोजना कहां अटकी है- धन की कमी, विभागों के बीच विवाद, प्रक्रिया में देरी या जमीनी स्तर पर काम न होने के कारण.

इसलिए इसका महत्व सिर्फ जानकारी को डिजिटल रूप देने में नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने में है जिसमें हर फैसले की जिम्मेदारी तय हो, समयसीमा निर्धारित हो और उसकी प्रगति साफ दिखाई दे.

लेकिन यही वजह है कि संकल्प डैशबोर्ड की निगरानी भी जरूरी होगी. अगर विभाग केवल जानकारी अपडेट करते रहें और सामने आई समस्याओं को दूर न करें तो यह डैशबोर्ड भी आंकड़े जमा करने का एक और ठिकाना बनकर रह सकता है. 

इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जानकारी कितनी नियमित रूप से अपडेट होती है, देरी होने पर मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचता है या नहीं, वरिष्ठ अधिकारी अलर्ट मिलने पर कार्रवाई करते हैं या नहीं और मुख्यमंत्री कार्यालय अधूरे कामों की समीक्षा के लिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल करता है या नहीं.

दूसरे शब्दों में नई व्यवस्था की कसौटी यह नहीं होगी कि डैशबोर्ड पर कितनी जानकारी दिखाई जा सकती है, बल्कि यह होगी कि सरकार के फैसले और जमीन पर उनके असर के बीच की दूरी कितनी कम होती है.

मुख्यमंत्री ने इस मंच की शुरुआत के मौके पर पंचायती राज और नगर विकास एवं आवास विभागों को एक खास निर्देश भी दिया. उन्होंने कहा कि तय लक्ष्यों के मुताबिक सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उन्हें एकीकृत निगरानी व्यवस्था से जोड़ा जाए. 

चौधरी के मुताबिक, पटना में पहले से 2,500 सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और उनकी निगरानी को भी पोर्टल के जरिए एकीकृत किया जाएगा. उन्होंने कहा कि शहर में और कैमरे लगाने की जरूरत है.

यह उदाहरण बताता है कि सरकार इस नई व्यवस्था के जरिए क्या हासिल करना चाहती है. योजनाओं और फैसलों की अलग-अलग विभागों में निगरानी करने के बजाय मुख्यमंत्री कार्यालय एक ही जगह से देख सकेगा कि क्या निर्देश दिया गया, उस पर कितना काम हुआ और कहां समन्वय या उच्च स्तर पर दखल की जरूरत है.

हालांकि असली परीक्षा डैशबोर्ड की नहीं, बल्कि उस पर किसी समस्या का संकेत मिलने के बाद होने वाली कार्रवाई की होगी. डिजिटल रिकॉर्ड यह सुनिश्चित कर सकता है कि कोई निर्देश भुलाया न जाए, लेकिन वह अपने आप किसी अधिकारी से उस पर कार्रवाई नहीं करा सकता.

इस लिहाज से चौधरी सरकार के लिए संकल्प और समन्वय महज नए सरकारी पोर्टल नहीं हैं. इनके जरिए शासन-प्रशासन में संस्थागत याददाश्त विकसित करने और फैसले से उनके क्रियान्वयन तक की पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है. 

आखिरकार इनकी सफलता इसी बात से तय होगी कि क्या इनसे काम तेजी से होता है, केंद्र के साथ तालमेल बेहतर होता है और नागरिकों की समस्याओं का समाधान जल्दी हो पाता है.

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