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बिहार में 30 से ज्यादा चीनी मिलें खोलने की तैयारी लेकिन गन्ना कहां से आएगा!

बिहार सरकार अगले पांच साल में 34 चीनी मिलें शुरू करने की तैयारी कर रही है, लेकिन इसके लिए राज्य में गन्ना उत्पादन चार से पांच गुना बढ़ाने की चुनौती

चीनी मिल में ब्लास्ट
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 24 फ़रवरी , 2026

फरवरी की 23 तारीख को बिहार की दो बंद पड़ी चीनी मिलों को खोलने का प्रस्ताव तैयार करने के लिए बिहार सरकार ने राष्ट्रीय सहकारी शक्कर कारखाना संघ लिमिटेड (NFCSF) के साथ MoU साइन किया है. पिछली सदी के आखिरी दशक में बंद हुई इन दोनों चीनी मिलों का DPR और फिजिबिलिटी रिपोर्ट NFCSF तैयार करेगी.

दरभंगा जिले के रैयाम और मधुबनी जिले के सकरी में बंद पड़ी इन चीनी मिलों का परिचालन आने वाले दिनों में बिहार सरकार का सहकारिता विभाग करेगा. इन दोनों के अलावा गोपालगंज के सासामुसा में बंद पड़ी चीनी मिल की भी जल्द शुरुआत होने वाली है. खबर है कि सासामुसा की चीनी मिल को चलाने में एक निजी कंपनी रुचि ले रही है.

इस तरह इन तीनों बंद पड़ी चीनी मिलों की जल्द शुरुआत होने जा रही है और इसके साथ बिहार की एनडीए सरकार ने अपने उस चुनावी वादे को पूरा करने की दिशा में कदम उठा दिया है, जिसके तहत सरकार राज्य की नौ बंद पड़ी चीनी मिलों को फिर से चालू कराएगी, साथ ही 25 नई चीनी मिलें भी खोलेगी. बिहार सरकार ने इन 34 चीनी मिलों को खोलने के लिए अगले पांच सालों का लक्ष्य रखा है. इसके लिए गन्ना उद्योग विभाग के मंत्री संजय कुमार ने राज्य के 25 जिलों के डीएम को पत्र लिखकर नई चीनी मिलों के लिए जमीन तलाशने को कहा है.

जाहिर है, 34 चीनी मिलों के खुलने से राज्य में चीनी मिलों की संख्या 44 हो जाएगी. अभी राज्य में दस चीनी मिलें संचालित हो रही हैं. यह संख्या बिहार में चीनी मिलों के इतिहास में सर्वाधिक होगी. अब तक राज्य में चीनी मिलों की सर्वाधिक संख्या 33 रही है, जो आजादी से पहले थी. तब बिहार देश के कुल चीनी उत्पादन का 40 फीसदी हिस्सा उत्पादित करता था. मगर इसके साथ सवाल यह भी है कि क्या बिहार के किसान इन 44 चीनी मिलों के लिए पर्याप्त मात्रा में गन्ना उपलब्ध करा पाएंगे? अगर हां, तो कैसे?

फिलहाल जैसे ही रैयाम और सकरी की बंद पड़ी चीनी मिलों के खुलने की घोषणा हुई, गन्ना उद्योग विभाग ने दरभंगा और मधुबनी जिले के 2401 गांवों को इन मिलों को गन्ना उपलब्ध कराने के लिए आरक्षित करा लिया है. मतलब यह कि यही गांव इन दोनों मिलों को गन्ना उपलब्ध कराएंगे. मगर बड़ा सवाल यह है कि इन दोनों जिलों में गन्ने की खेती काफी पहले बंद हो चुकी है, क्योंकि दोनों चीनी मिल लगभग 30 साल से बंद थीं. सवाल है कि अब नए सिरे से किसान गन्ने की खेती शुरू कैसे करेंगे?

फिलहाल बिहार में 1.92 लाख हेक्टेयर जमीन पर ही गन्ने की खेती होती है, जो राज्य की कुल कृषि योग्य भूमि का सिर्फ 2.6 फीसदी है. इसमें लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. 2020-21 के दौरान बिहार में गन्ने की खेती 2.21 लाख हेक्टेयर में होती थी. 2010-11 में राज्य में 2.78 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती थी. इस वक्त राज्य में दस चीनी मिलें गन्ने की पेराई करती हैं और आने वाले समय में यह संख्या 44 होने जा रही है, इस लिहाज से बिहार में गन्ने का उत्पादन चार से पांच गुना अधिक बढ़ाने की जरूरत है. यह बिहार सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है.

हालांकि गन्ना उद्योग विभाग के अधिकारी बताते हैं कि इसी मकसद से राज्य के चतुर्थ कृषि रोड मैप (2023-28) में राज्य में 405 नई गुड़ उत्पादन इकाइयां लगाने का लक्ष्य रखा गया था, ताकि चीनी मिल से बाहर के इलाके में भी गन्ने की खेती को प्रोत्साहन मिले. गन्ना उद्योग विभाग ने इसके तहत ऐसे 15 जिलों में कुल 2050 एकड़ जमीन पर गन्ने की खेती को प्रोत्साहन देने का लक्ष्य रखा है. इनमें नौ जिले ऐसे हैं, जहां चीनी मिलें नहीं हैं. इन जिलों में बीज का अनुदान दिया जा रहा है और किसानों को दूसरी सहायता दी जा रही है.

मगर जिस तरह का लक्ष्य है, उसके लिहाज से यह प्रयास काफी छोटा है क्योंकि 44 चीनी मिलों के हिसाब से अगले पांच सालों में गन्ने की खेती का रकबा बढ़ाकर कम से कम 9 से 10 लाख हेक्टेयर करने की जरूरत है.

इस बीच गन्ना उद्योग विभाग ने पंचायतों के स्तर पर 'गन्ना ग्राम पंचायतों' के आयोजन की भी तैयारी की है. विभाग के मुख्य सचिव ने जिला स्तर के अधिकारियों को पंचायत स्तर पर किसानों को गन्ना की खेती के लिए जागरूक करने का निर्देश दिया है. वे गांव के किसानों को बताएंगे कि गन्ने की खेती करने में फायदा है. इसके लिए मुजफ्फरपुर में क्षेत्रीय कार्यालय और प्रशिक्षण केंद्र भी खोला जा रहा है.

सरकार अपनी तरफ से इस कोशिश में जुटी है कि चीनी मिलें खुलने से पहले राज्य में गन्ने की खेती को उस स्तर तक पहुंचाए ताकि हर चीनी मिल के इलाके में 30 से 40 हजार हेक्टेयर जमीन पर गन्ने की खेती हो सके. मगर सरकार इसमें कितना सफल होती है, यह देखने की बात होगी.

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