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मुख्यमंत्री और दो डिप्टी के भरोसे तीन हफ्ते के लिए बिहार! कैसे चलेगा काम?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ-साथ सिर्फ दो मंत्रियों ने शपथ ली है. अभी बिहार सरकार के सभी 47 विभागों को संभालने की जिम्मेदारी इन्हीं तीन लोगों पर है

bihar cm samrat chaudhary deputy cm vijendra yadav and vijay chaudhry
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, उप मुख्यमंत्री - बिजेंद्र यादव (बाएं) और विजय चौधरी (दाएं)
अपडेटेड 18 अप्रैल , 2026

15 अप्रैल, 2026 को बिहार में नई सरकार ने आकार ले लिया है. मगर इस नई सरकार के साथ दिक्कत यह है कि इसमें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ-साथ सिर्फ दो मंत्रियों ने शपथ ली है. अभी बिहार सरकार के सभी 47 विभागों को संभालने की जिम्मेदारी इन्हीं तीन लोगों पर है. 16 अप्रैल को जब सरकार ने इन सभी विभागों का बंटवारा किया तो मुख्यमंत्री के पास 29 विभाग आए हैं.

पहले उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी के जिम्मे 10 और दूसरे उप मुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव के जिम्मे आठ विभाग हैं. इसका अर्थ यह है कि जब तक बिहार में मंत्रिपरिषद का विस्तार नहीं होता, यही तीन लोग मिलकर 47 विभागों को चलाएंगे. इसके साथ ही सूत्रों से मिली खबर यह भी है कि मंत्रिमंडल का विस्तार अब छह मई को होने वाला है. अगर यह सही है तो अगले तीन हफ्ते तक बिहार सरकार के 47 विभागों की जिम्मेदारी इन्हीं तीन मंत्रियों पर होगी.

अभी नीतीश कुमार की सरकार ने जब इस्तीफा दिया तो उस वक्त उनकी सरकार में कुल 26 मंत्री थे और बिहार सरकार में अधिकतम 36 मंत्रियों की गुंजाइश होती है. पिछले साल नवंबर में बनी सरकार के बाद मंत्रिमंडल विस्तार का मौका भी नहीं मिला, ऐसे में दस जगहें खाली रह गई थीं. इसके बावजूद सरकार का कामकाज चल रहा था. मगर महज तीन मंत्री 47 विभागों की जिम्मेदारी संभालेंगे, यह बात हैरत में डालने वाली लगती है.

एनडीए के सूत्र बताते हैं कि चूंकि अभी BJP का केंद्रीय नेतृत्व महिला आरक्षण के अभियान और बंगाल चुनाव में व्यस्त है, इसलिए मंत्रियों की सूची फाइनल नहीं हो पा रही है. इसी वजह से विस्तार अटका हुआ है. शपथ-ग्रहण वाले दिन जब इस बारे में इंडिया टुडे ने पूर्व मंत्री दिलीप कुमार जायसवाल और लेसी सिंह से सवाल पूछे तो उन दोनों ने कहा कि विस्तार जल्द हो जाएगा और बमुश्किल 10-15 दिनों की बात है और इसमें कोई संकट नहीं आने वाला है.

अगर इन दोनों मंत्रियों की बात को समझा जाए तो ऐसा लगता है कि यह विस्तार अप्रैल महीने के आखिर या मई की शुरुआत में होगा. मगर अनौपचारिक बातचीत में सरकार से जुड़े सूत्र बताते हैं कि अगला विस्तार छह मई को होना तय हुआ है. तब तक बंगाल के नतीजे भी आ जाएंगे.

हालांकि मंत्रालय विस्तार में हुई देरी को लेकर अलग-अलग तरह की बातें कही जा रही हैं. कुछ जानकार इसे सामान्य प्रक्रिया के रूप में देख रहे हैं, वहीं कुछ जानकार मानते हैं कि BJP के अंदर सम्राट का नाम फाइनल होने की वजह से जो अंतर्विरोध है, उसी की वजह से फिलहाल मंत्रिमंडल छोटा रखा गया है और विस्तार का काम टाल दिया गया है.

'आज तक' संवाददाता शशि भूषण कहते हैं, “दरअसल इसकी दो वजहें हैं. पहली वजह तो यह है कि निशांत के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने की वजह से JDU अपनी सूची फाइनल नहीं कर पा रहा. दूसरा, सम्राट चौधरी के विधान मंडल दल के नेता चुने जाने के बाद BJP नेता विजय कुमार सिन्हा ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, उससे पार्टी नेतृत्व कोई फैसला ले नहीं पा रहा. दरअसल विजय कुमार सिन्हा ने एक तरह से नेतृत्व के फैसले पर ही सवाल उठा दिया है.”

वहीं लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह का कहना है, “JDU की सूची लगभग फाइनल थी, दिक्कत BJP की वजह से है और मुझे लगता है कि बंगाल चुनाव की वजह से विस्तार अटका हुआ है.”

अब यह फैसला जिस भी वजह से लिया गया हो, इसकी वजह से अगले तीन हफ्ते तक बिहार सरकार के कामकाज में सुस्ती आना स्वाभाविक है. हालांकि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पहले ही दिन से कामकाज संभाल लिया है और वे अधिकारियों को दिशा-निर्देश दे रहे हैं. उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी कामकाज शुरू कर दिया है. मगर दूसरे उप मुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव अभी ठीक से काम शुरू नहीं कर पाए हैं.

इधर नई सरकार बनने के बाद कई सीनियर ब्यूरोक्रेट केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की तैयारी कर रहे हैं. इनमें अनुपम कुमार, वंदना प्रेयसी, राकेश राठी, प्रतिमा वर्मा जैसे अधिकारी हैं. मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव दीपक कुमार के भी नीति आयोग जाने की चर्चा है. ऐसे में ब्यूरोक्रेसी और सचिवालय में भी कामकाज का माहौल बहुत बेहतर नहीं है.

ऐसा क्यों हुआ और क्या इसकी वजह से कामकाज नहीं अटकेगा? यह पूछने पर एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर कहते हैं, “दरअसल सरकार में शामिल लोग जानते हैं कि अभी कोई कामकाज होना नहीं है. राज्य का खजाना खाली है, सरकार ने वेतन और पेंशन को छोड़कर हर तरह के भुगतान पर एक तरह से रोक लगा दी है. केंद्र का अनुदान भी मई से पहले आना नहीं है. ऐसे में जब काम होगा नहीं तो मंत्रिमंडल विस्तार का क्या फायदा. इसलिए कोई इस बात को लेकर परेशान नहीं है.”

वहीं, टाटा सामाजिक संस्थान के निदेशक पुष्पेंद्र कहते हैं, “भले नए काम के लिए पैसे न हों, मगर जो काम लगातार चल रहे हैं, वे तो प्रभावित होंगे ही. जैसे भूमि सुधार विभाग एक अभियान चला रहा था, वह ठप पड़ जाएगा. सारे फैसले अफसर करेंगे और चूंकि मंत्रियों की संख्या सिर्फ तीन है, ऐसे में आम जनता के हित के फैसले अभी नहीं होंगे. यह कोई अच्छी स्थिति नहीं होगी.”

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