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पश्चिम बंगाल में महिला-मुस्लिम समीकरण कैसे बनता है सत्ता की धुरी?

महिलाओं के बीच ममता बनर्जी की पकड़ मजबूत रही है लेकिन BJP ने हालात बदलने के लिए पूरा जोर लगाया, दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाता भी एकतरफा TMC के समर्थक नहीं कहे जा सकते

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बंगाल में पहले चरण की 152 सीटों पर 91.4 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ (Photo- PTI)
अपडेटेड 24 अप्रैल , 2026

23 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में दो चरणों में होने वाले चुनाव का पहला चरण पूरा हो गया. इसके साथ ही राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान उन दो प्रमुख बातों पर केंद्रित हो गया है, जो इस चुनावी मुकाबले को आकार देंगी. इनमें महिला और मुस्लिम मतदाता प्रमुख हैं.

मुख्यमंत्री और ममता बनर्जी के लिए महिलाएं लंबे समय से चुनावी सफलता की मजबूत नींव रही हैं. पिछले एक दशक में उनकी सरकार ने महिलाओं के लिए विशेष रूप से व्यापक कल्याणकारी योजनाएं लागू की हैं, जो उन्हें सीधे तौर पर लाभ पहुंचाती हैं.

इन योजनाओं में सबसे प्रमुख लक्ष्मी भंडार योजना है, जिसमें लाभार्थियों के खाते में सीधे पैसा ट्रांसफर किया जाता है. इस योजना के तहत 2 करोड़ से अधिक महिलाओं को लाभ मिलने का अनुमान है. इसपर सरकार 26,700 करोड़ रुपए से ज्यादा सालाना खर्च करती है. 2021 में शुरू होने के बाद से अब तक इस योजना पर करीब 74,000 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं.

ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मी भंडार योजना ने लाभार्थियों और ममता बनर्जी के बीच गहरा और सीधा संबंध स्थापित किया है. इसके साथ कन्याश्री योजना भी है, जिसके तहत शिक्षा को बढ़ावा देने और बाल विवाह को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से करीब 1 करोड़ लड़कियों को वित्तीय सहायता प्रदान की गई है. अब तक इस योजना के तहत 16,554 करोड़ रुपए का वितरण हो चुका है.

रूपाश्री योजना, जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बेटियों की शादी के लिए 25,000 रुपए प्रदान किए जाते हैं. इस योजना से अब तक 22 लाख से अधिक लोगों को लाभ हुआ है और कुल खर्च 5,500 करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है. इन पहलों ने न केवल TMC सरकार के कल्याणकारी कार्यों का विस्तार किया है, बल्कि ममता को महिलाओं की जरूरतों के प्रति सजग नेता के रूप में भी पेश किया है. यह सब उनकी 'मां-माटी मानुष' शासन नीति के अनुरूप है.

TMC को इसका चुनावी फायदा भी है. हालांकि सटीक आंकड़े विवादित हैं. लेकिन, कोलकाता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती का मानना ​​है कि 2021 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में TMC को ज्यादा वोट किया. आंकड़ों पर गौर करें तो महिलाओं ने TMC को पुरुषों की तुलना में करीब 4 फीसद ज्यादा वोट दिया. यही वोट TMC के लिए मजबूत सहारा बनकर उभरता है. इससे कड़े मुकाबले वाली सीटों पर पार्टी को बढ़त मिलती है.

लोकसभा सांसद और TMC की महिला विंग की प्रमुख काकोली घोष दस्तीदार कहती हैं, “ममता बनर्जी का काम ही उनके मजबूत पकड़ की कहानी बयां करती है. उन्होंने महिलाओं के लिए जो किया है, वही उनकी पहचान है. बंगाल की महिलाओं का उनके प्रति जितना समर्थन है, किसी और को नहीं है.”

BJP ममता बनर्जी की इस ताकत को पहचानती है और इस चुनाव में अपनी रणनीति में बदलाव करने की कोशिश कर रही है. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी ने बंगाल की महिलाओं के लिए कई वादे किए. इनमें कमजोर पृष्ठभूमि की गर्भवती महिलाओं के लिए 3,000 रुपए का मासिक नकद भत्ता, 21,000 रुपए की वित्तीय सहायता और उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों के लिए 50,000 रुपए का एकमुश्त अनुदान शामिल है. पार्टी ने पुलिस समेत राज्य सरकार की सभी नौकरियों में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण का भी वादा किया है.

कल्याणकारी योजनाओं के अलावा, BJP ने महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के मुद्दे को प्रमुखता देने का प्रयास किया है. इसका एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक संकेत 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में बलात्कार और हत्या का शिकार हुई प्रशिक्षु डॉक्टर की मां की उम्मीदवारी है. वह उत्तर 24 परगना जिले की पनिहाटी सीट से चुनाव लड़ रही हैं.

कानून-व्यवस्था के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में महिलाओं के खिलाफ कथित अत्याचारों के मामलों का बार-बार हवाला दिया है. उन्होंने TMC सरकार की विफलता को सबूत के रूप में पेश किया है.

ममता बनर्जी की पार्टी ने BJP शासित राज्यों में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों का हवाला देकर पलटवार किया है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव और हाथरस में हुए बलात्कार के मामलों के साथ-साथ मणिपुर में हुई जातीय हिंसा का भी जिक्र किया गया है. इसमें महिलाएं भी पीड़ित हुईं. BJP के नैतिक रुख पर सवाल उठाते हुए, TMC नेताओं, जैसे कि महुआ मोइत्रा ने इस बात पर जोर दिया है कि उनकी पार्टी की संसद में महिला प्रतिनिधियों का अनुपात सबसे अधिक है. लोकसभा सांसदों में से TMC की 38 फीसद महिलाएं हैं.

संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण देने वाले महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन पर हुई बहस ने इस विवाद को कुछ समय के लिए और भी तेज कर दिया था. पिछले सप्ताह संसद में विधेयक के लोकसभा में पास नहीं हो पाने के बाद, BJP ने विपक्षी दलों पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया.

बंगाल में BJP के महिला मोर्चे की प्रमुख फाल्गुनी पात्रा कहती हैं, "हम महिलाओं को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि TMC कितनी महिला विरोधी है. हम महिलाओं को दी जाने वाली 3,000 रुपए की वित्तीय सहायता के लिए भी पंजीकरण करवा रहे हैं, जिसका हमने वादा किया है,"

TMC ने पलटवार करते हुए कहा है कि वे महिला आरक्षण का समर्थन करती हैं, लेकिन जनगणना और परिसीमन प्रक्रियाओं से इसके जुड़ाव का विरोध करती है. बंगाल के व्यापक चुनावी संदर्भ में, यह मुद्दा एक महत्वपूर्ण मतदाता वर्ग को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे कई तरीकों में से एक है.

अगर महिलाएं TMC के लिए स्थिरता का स्तंभ हैं, तो मुस्लिम मतदाता एक अधिक जटिल और लगातार बदलती चुनौती पेश करते हैं. ऐतिहासिक रूप से बंगाल चुनावों में मुस्लिम समुदाय की निर्णायक भूमिका रही है. 2021 में TMC ने उन 146 सीटों में से 131 पर जीत हासिल की, जहां मुस्लिम आबादी 25 से 90 फीसद तक है.

यह जीत नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर आशंकाओं के कारण संभव हुई, जिन्हें TMC ने मुसलमानों के प्रति भेदभावपूर्ण बताया है. इसके अलावा, 2021 में शीतलकुची विधानसभा क्षेत्र में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की गोलीबारी में चार मुसलमानों की मौत जैसी घटनाएं भी इस जीत का कारण बनीं.

इन कारकों ने ममता बनर्जी के समर्थन में मुसलमानों को एकजुट करने में मदद की होगी, लेकिन पांच साल बाद, यह एकजुटता कमजोर होती दिख रही है. मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं के बीच असंतोष के संकेत स्पष्ट हैं.

इसके कई कारण हैं. इनमें से एक प्रमुख कारण राज्य सरकार के जरिए 2025 में वक्फ संशोधन ढांचे का आखिरकार कार्यान्वयन है, जिसमें महीनों के विरोध के बाद 82,000 वक्फ संपत्तियों पर डेटा अपलोड करने के निर्देश शामिल थे. कुछ लोगों के लिए यह TMC के पहले के रुख से एक बड़ा बदलाव था.

OBC वर्गीकरण प्रणाली में बदलाव से जुड़ी शिकायतें भी हैं. एक कानूनी चुनौती और उसके बाद हुए सर्वेक्षण के बाद कई मुस्लिम समुदायों को पिछड़े वर्ग 'ए' से 'बी' श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे आरक्षण के लाभों तक उनकी पहुंच कम हो गई. वहीं, कुछ हिंदू समुदायों को उच्च श्रेणी में रखा गया. हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि प्रभावित मुस्लिम समुदायों की संख्या ऊंची श्रेणी में रखे गए हिंदू समुदायों की संख्या से कम है, लेकिन सीमित अवसरों को लेकर मुस्लिम असंतोष बढ़ सकती है.

इस बेचैनी से अन्य राजनीतिक दलों के लिए अवसर खुल सकते हैं. कांग्रेस अपने पारंपरिक गढ़ मालदा और मुर्शिदाबाद में फिर से मजबूत होने की कोशिश कर रही है. हाल ही में TMC से पाला बदलकर कांग्रेस में शामिल हुई. मौसम बेनजीर नूर जैसी नेता खोई हुई जमीन वापस पाने को लेकर आशावादी हैं. नवसाद सिद्दीकी के नेतृत्व वाला इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) कई सीटों पर चुनाव लड़कर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. हुमायूं कबीर के पूर्व TMC नेता की आम जनता उन्नयन पार्टी जैसे छोटे दलों ने भी इस भावना का लाभ उठाने का प्रयास किया है.

ISF के राज्य समिति सदस्य सहाबुद्दीन सिराजी कहते हैं, "ममता बनर्जी को मुसलमानों को अपना वोट बैंक मानना ​​बंद कर देना चाहिए. उन्होंने मुसलमानों के सामाजिक या आर्थिक उत्थान के लिए कुछ भी नहीं किया है."

जमीनी स्तर पर निराशा साफ दिखाई दे रही है. भांगर क्षेत्र में जहां विधानसभा चुनाव में सिद्दीकी प्रतिनिधि हैं, दीवारों पर लिखे गए संदेशों में TMC से दिल्ली जाकर वोट मांगने का आग्रह किया गया है, जो वक्फ विधेयक के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पार्टी के रुख को लेकर असंतोष को दिखाता है.

कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर अब्दुल मतीन का कहना है कि इस तरह के संदेशों में एक प्रतीकात्मक तर्क निहित होता है, जो यह संकेत देता है कि मतदाता उम्मीद करते हैं कि उनकी चिंताओं का समाधान राज्य के भीतर ही किया जाए, न कि उन्हें कहीं और भेजा जाए.

इस विभाजन के बावजूद, रणनीतिक मतदान की प्रबल प्रवृत्ति बनी हुई है. कई विश्लेषकों का मानना ​​है कि भले ही असंतोष बना रहे, BJP की जीत का डर मुसलमानों को आखिरकार TMC के समर्थन में एकजुट होने के लिए प्रेरित कर सकता है. जैसा कि मतीन ने कहा है, कई लोगों के लिए सवाल राजनीतिक अस्तित्व का है, जिसमें वोटों का विभाजन अनजाने में BJP को लाभ पहुंचा सकता है.

TMC अपने मुस्लिम जनाधार में फूट को कम करने का प्रयास कर रही है. साथ ही मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए अपनी संगठनात्मक शक्ति पर भी भरोसा कर रही है. वहीं दूसरी ओर, कबीर के उदय और उसके बाद उसे काबू में करने जैसे विवाद, मुस्लिम समुदाय में अपने समर्थकों की संख्या में और गिरावट को रोकने के लिए पार्टी के प्रयासों को दिखाते हैं.

BJP का चुनाव में कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है. BJP ने बंगाल में समान नागरिक संहिता लागू करने की भी घोषणा की है. यह एक अतिरिक्त लामबंदी का जरिया बन सकता है, जिससे ममता बनर्जी को मुस्लिम वोटों के उन वर्गों को एकजुट करने में मदद मिल सकती है जो अनिश्चित या आपस में बंटे हुए लगते हैं.

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