
जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित बारामूला-उरी रेलवे परियोजना कुछ अड़चनों में फंस गई है. विधानसभा सचिवालय ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक निजी सदस्य के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. इसमें प्रस्तावित रेलवे लाइन के एक अहम हिस्से पर फिलहाल काम रोकने की मांग की गई है.
बारामूला से नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक जावेद हसन बेग ने यह प्रस्ताव रखा है. इसमें परियोजना के मार्ग पर आगे काम बढ़ाने से पहले व्यापक और स्वतंत्र भूवैज्ञानिक, भू-तकनीकी और भूकंपीय आकलन कराने की मांग की गई है.
करीब 46 किलोमीटर लंबी यह सिंगल ब्रॉडगेज रेलवे लाइन उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक का विस्तार होगी. इसे बारामूला शहर के मौजूदा अंतिम स्टेशन से नियंत्रण रेखा (LoC) के करीब स्थित सीमावर्ती शहर उरी तक ले जाने की योजना है.
अधिकारियों ने 2025 के अंत तक सर्वे और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट पूरी कर ली थी. प्रस्तावित मार्ग शेरी, गंटमुल्ला, बोनियार, लिम्बर और अन्य इलाकों से होकर गुजरेगा. इसके लिए नए सिरे से जमीन का अधिग्रहण करने के साथ-साथ सड़क के ऊपर और नीचे से गुजरने वाले पुल बनाने होंगे.
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब स्थानीय स्तर पर विरोध लगातार बढ़ रहा है. इसकी वजह यह है कि प्रस्तावित मार्ग पुराने बसे हुए इलाकों से होकर गुजरता है, गांवों को बीच से काटता है और ऐतिहासिक बारामूला शहर से गुजरते हुए बेशकीमती बागवानी भूमि और करेवा के संवेदनशील भू-भाग को प्रभावित करता है.
स्थानीय लोगों और नागरिक संगठनों ने स्थानीय प्रशासन और रेलवे अधिकारियों के सामने दिए अपने ज्ञापनों में बार-बार कहा है कि रणनीतिक रेल संपर्क का स्वागत है लेकिन कम आबादी वाले या खाली इलाकों से होकर जाने वाले वैकल्पिक मार्गों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. साथ ही सभी संबंधित पक्षों से सार्थक बातचीत भी होनी चाहिए.

इसी पृष्ठभूमि में जम्मू-कश्मीर विधानसभा सचिवालय ने प्रस्तावित रेलवे लाइन के मार्ग में बदलाव की मांग करने वाले निजी सदस्य के प्रस्ताव को स्वीकार किया है. यह प्रस्ताव विधानसभा के मौजूदा शरद सत्र के कामकाज का हिस्सा बन गया है.
इसमें उत्तरी कश्मीर में कनिसपोरा से खानपोरा/शेरी इलाकों की ओर जाने वाले प्रस्तावित रेलवे मार्ग को व्यापक और स्वतंत्र भूवैज्ञानिक, भू-तकनीकी और भूकंपीय आकलन होने तक ‘स्थगित’ रखने की मांग की गई है.
बेग ने इंडिया टुडे से कहा, "प्रस्ताव में ढलान की स्थिरता, मिट्टी की भार वहन क्षमता, द्रवीकरण की आशंका, भूकंपीय जोखिम, जल निकासी की स्थिति और भूस्खलन की आशंका का विस्तृत आकलन करने की मांग की गई है. अंतिम मंजूरी तभी दी जानी चाहिए जब सक्षम प्राधिकरण लंबे समय तक ढांचे की उपयुक्तता और सुरक्षा को प्रमाणित कर दें."
भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र
कश्मीर हिमालय में मौजूद कई प्रमुख भूवैज्ञानिक संरचनाओं और भ्रंश प्रणालियों के बीच स्थित है. इनमें मेन बाउंड्री थ्रस्ट (पीर पंजाल थ्रस्ट), मेन सेंट्रल थ्रस्ट और जांस्कर थ्रस्ट शामिल हैं.
कश्मीर विश्वविद्यालय के पृथ्वी विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों के हालिया जीपीएस और भू-आकृतिक अध्ययन में धरती की परत में सक्रिय ऊर्ध्वाधर हलचल का पता चला है. अध्ययन में कश्मीर घाटी के दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों, जिनमें त्राल और कुलगाम शामिल हैं, में जमीन के ऊपर उठने और उत्तरी तथा उत्तर-पश्चिमी किनारों, यानी उरी और बांदीपोरा में जमीन के धंसने की बात सामने आई.
इसके निष्कर्षों से घाटी के आर-पार उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में जमीन के अंदर सक्रिय दरारों के होने के संकेत मिले हैं. ये दरारें जमीन की प्रमुख भूगर्भीय संरचनाओं को काटती हैं.
बेग ने चेतावनी दी कि अगर भूवैज्ञानिक, भू-तकनीकी और भूकंपीय आकलन के बिना परियोजना को आगे बढ़ाया गया तो यह ‘पर्यावरणीय और पारिस्थितिक आपदा’ साबित हो सकती है.

बेग के मुताबिक, "कनिसपोरा से खानपोरा के बीच का वह हिस्सा, जहां से रेलवे लाइन प्रस्तावित है, नाजुक करेवा जमीन से होकर गुजरता है और इसे जमीन के धंसने वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता है. रेलवे अधिकारियों, जिसमें रेल मंत्री भी शामिल हैं, को परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले इन तथ्यों की जांच करनी चाहिए और इसकी दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करनी चाहिए."
बेग ने कहा कि वे जम्मू-कश्मीर विधानसभा के मौजूदा सत्र के दौरान यह मुद्दा उठाएंगे. सत्र खत्म होने के बाद अक्टूबर में वे खुद रेल मंत्री के सामने भी यह मामला रखेंगे. उन्होंने दावा किया कि इस मुद्दे पर उत्तरी कश्मीर के ज्यादातर विधायकों का उन्हें समर्थन हासिल है.
बेग ने कहा, "सरकारी परियोजनाओं का उद्देश्य आम लोगों का हित होना चाहिए. रेलवे परियोजना पर आगे बढ़ने से पहले अधिकारियों को स्थानीय और वास्तविक चिंताओं पर उचित ध्यान देना चाहिए." उन्होंने कहा कि प्रस्तावित रेलवे लाइन भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र से होकर भी गुजरती है.
मौजूदा प्रस्ताव से पहले भी स्थानीय स्तर पर चिंता जताई गई थी कि रेलवे लाइन का कुछ हिस्सा ऐतिहासिक बारामूला डिग्री कॉलेज के परिसर और बारामूला शहर के आसपास के घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों से होकर गुजर सकता है.
इनमें शेरवानी कॉलोनी, जेट्टी ख्वाजाबाग और फतेहपोरा शामिल हैं. इन आशंकाओं का मुख्य केंद्र बड़े पैमाने पर विस्थापन, घरों को गिराए जाने और सामुदायिक बुनियादी ढांचे में रुकावट का खतरा है.
रणनीतिक रेलवे कॉरिडोर
व्यापार और पर्यटन के लिए संभावित आर्थिक फायदों के अलावा बारामूला-उरी कॉरिडोर का मुख्य उद्देश्य रणनीतिक सैन्य प्रतिष्ठानों के पास सैन्य रसद को मजबूत करना है. ये प्रतिष्ठान नियंत्रण रेखा पर तैनात अग्रिम सैनिकों के लिए बेस का काम करते हैं.
यह ऐसा क्षेत्र है जहां पाकिस्तान से आतंकियों की घुसपैठ की कोशिशें होती रही हैं. परियोजना पूरी होने के बाद इस रेलवे लाइन से हर मौसम में रणनीतिक संपर्क उपलब्ध होने और नियंत्रण रेखा के साथ सैनिकों और सैन्य उपकरणों की तेज आवाजाही और तैनाती संभव होने की उम्मीद है.
ऐसे ही कॉरिडोर पहले भी रोके गए
इससे पहले दक्षिण कश्मीर में भी ऐसी ही स्थिति सामने आई थी. सरकार ने दो प्रस्तावित रेलवे कॉरिडोर की योजनाएं रोक दी थीं. इनमें अनंतनाग-बिजबेहरा-पहलगाम और अवंतीपोरा (काकापोरा)-शोपियां कॉरिडोर और उससे जुड़े विस्तार शामिल थे.
रेलवे अधिकारियों ने इनके सर्वे पहले ही कर लिए थे. लेकिन अनंतनाग, शोपियां और पुलवामा के बागवानी क्षेत्र में सेब उत्पादकों और स्थानीय लोगों के कड़े विरोध के कारण परियोजनाओं पर सवाल उठे.
स्थानीय लोगों, खासकर सेब उत्पादकों, का कहना था कि इन मार्गों के लिए बड़ी संख्या में फलदार पेड़ काटने पड़ेंगे और बागवानी की उस उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण करना पड़ेगा, जो क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है.
लगातार हुए विरोध, किसानों, राजनीतिक नेताओं और जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से किए गए अनुरोधों के बाद केंद्र ने 2026 की शुरुआत में इन परियोजनाओं को रोक दिया या ‘अव्यावहारिक’ बताते हुए उन्हें छोड़ दिया. इसकी वजह बागों को होने वाले नुकसान का खतरा बताया गया.
सीमित जमीन पर बढ़ता दबाव
कश्मीर में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए लगातार जमीन का अधिग्रहण हो रहा है. ऐसे में क्षेत्र के सीमित भूमि संसाधनों पर दबाव बढ़ गया है. किसान नई सड़कों, राजमार्गों के विस्तार और रेलवे कॉरिडोर के विस्तार के लिए अपनी कीमती कृषि भूमि खो रहे हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक श्रीनगर-काजीगुंड राष्ट्रीय राजमार्ग खंड के विस्तार और उससे जुड़े कामों के लिए करीब 371.242 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया. वहीं 55 किलोमीटर लंबे श्रीनगर-बारामूला मार्ग को चार लेन का बनाने के लिए 96.15 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण का अनुमान था. इसमें 57.553 हेक्टेयर जमीन विशेष रूप से पट्टन और बारामूला बाईपास के लिए तय की गई थी.
संसद में 2025 में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक 272 किलोमीटर लंबे उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना के लिए 1,836.19 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया. इसमें 1,559.48 हेक्टेयर निजी जमीन और 276.71 हेक्टेयर सरकारी जमीन थी.
इस पृष्ठभूमि में विधानसभा का प्रस्ताव और दक्षिण कश्मीर के रेलवे कॉरिडोर को पहले रोका जाना, पूरे कश्मीर में स्थानीय स्तर पर उठ रही एक समान मांग को दिखाता है. मांग यह है कि विकास परियोजनाओं में जमीन की कमी, बागवानी पर आधारित आजीविका, रिहायशी स्थिरता और नाजुक हिमालयी क्षेत्र की भूवैज्ञानिक वास्तविकताओं का ध्यान रखा जाए.
इस मामले में मुख्य दलील यही है कि रणनीतिक संपर्क तभी स्वीकार्य है जब रेलवे मार्ग का चयन और उसकी सुरक्षा पूरी वैज्ञानिक जांच और स्थानीय समुदायों से उचित परामर्श के बाद सुनिश्चित किया जाए.

