
चलो बल्लारी. 1 सितंबर की सुबह लिंगसुगुर में BJP के दिग्गज नेता बी.एस. येदियुरप्पा ने इसका बिगुल बजाया. उनके बेटे और पार्टी के कर्नाटक अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने पदयात्रा की.
दस दिन और करीब 175 किलोमीटर बाद जब बल्लारी के म्युनिसिपल कॉलेज मैदान में ‘'बल्लारी चलो'’ पदयात्रा खत्म हुई तो वहां मौजूद भीड़ में किसी को भी इस राजनीतिक रणनीति को समझाने की जरूरत नहीं थी.
विजयेंद्र के नेतृत्व में यह मार्च रायचूर, कोप्पल और बल्लारी की नौ विधानसभा सीटों से होकर गुजरा. BJP का कहना है कि अंतिम कार्यक्रम में एक लाख से ज्यादा लोग पहुंचे. इसकी स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि नहीं की जा सकती, लेकिन यह जरूर गिना जा सकता है कि कौन-कौन पहुंचा.
पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और बसवराज बोम्मई, वरिष्ठ नेता जगदीश शेट्टार, केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी और वी. सोमन्ना, राज्य के नेता आर. अशोक और बल्लारी के जी. जनार्दन रेड्डी और बी. श्रीरामुलु मंच पर मौजूद थे.
'बल्लारी चलो' को लेकर सबसे अजीब बात यह है कि इसे शुरू में होना ही नहीं था. इसकी घोषणा कर्नाटक के मंत्री बी. नागेंद्र के इस्तीफे की मांग को उठाते हुए की गई थी. वाल्मीकि निगम में 187 करोड़ रुपए की कथित अनियमितताओं को लेकर यह मांग की गई थी.
लेकिन पदयात्रा शुरू होने से पहले ही नागेंद्र ने इस्तीफा दे दिया. इसके बावजूद BJP ने मार्च जारी रखा और विजयेंद्र ने इसका दायरा बढ़ाकर उन ‘कम से कम 10 मुद्दों’ तक कर दिया, जिनमें राज्य में सूखे से लेकर करीब 2.5 लाख खाली सरकारी पद तक शामिल थे.

सत्तारूढ़ कांग्रेस ने इस पर तंज कसा. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद ने पूछा कि BJP उस मुद्दे को लेकर मार्च क्यों कर रही है जो पहले ही खत्म हो चुका है. मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का रुख थोड़ा हल्का था. उन्होंने BJP से आगे बढ़ने को कहा और वादा किया कि उसके बाद वे भी अपनी यात्रा निकालेंगे.
विजयेंद्र के लिए इससे ज्यादा असहज स्थिति तब बनी, जब जनता दल (सेक्युलर) के नेता एच.डी. कुमारस्वामी ने भी यही बात कही कि मंत्री के इस्तीफे के बाद इस मार्च की कोई जरूरत नहीं थी. यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब कुछ दिन पहले बिदादी टाउनशिप के खिलाफ JD(S) की पदयात्रा में BJP के कार्यकर्ता कहीं नजर नहीं आए थे. सहयोगी दल ने इस अनदेखी पर ध्यान दिया था.
पदयात्रा के दौरान BJP ने किसानों को अपना मुख्य मुद्दा बनाया. विजयेंद्र ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने सिर्फ 101 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया, जबकि संकट कहीं ज्यादा व्यापक था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासन के तीन वर्षों में 3,655 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें से 937 अकेले कल्याण कर्नाटक में हुईं.
विजयेंद्र ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के उप-योजना के पैसे को सरकार की गारंटी योजनाओं में लगाए जाने पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की. कांग्रेस का कहना है कि उप-योजना के पैसे का दोबारा आवंटन वित्तीय प्रबंधन का हिस्सा था. दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर कायम हैं.
विजयेंद्र के लिए बार-बार उनके पिता ही तुलना का पैमाना रहे. उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि येदियुरप्पा के शासन में बाढ़ प्रभावित लोगों को घर दोबारा बनाने के लिए 3.5 लाख रुपए मिले थे. दूध उत्पादकों को उनका प्रोत्साहन भुगतान किया गया था. ये तुलना न तो बहुत छिपी हुई थी और न ही उसका ऐसा कोई इरादा था.
विधानसभा में विपक्ष के नेता रहते हुए येदियुरप्पा ने सरकारी जमीन पर बिना अनुमति खेती करने वाले किसानों को जमीन का मालिकाना हक देने की मांग को लेकर शिकारीपुर से बेंगलुरु तक पैदल मार्च किया था. उस मार्च और 1980 और 1990 के दशक में अनंत कुमार के साथ हुए एक दशक के किसान आंदोलनों ने ग्रामीण लिंगायत आधार तैयार किया.
इसी आधार ने BJP को कर्नाटक में दो विधायकों की पार्टी से सत्ता तक पहुंचाया. इसने पार्टी को राज्य में येदियुरप्पा को नेतृत्व सौंपने के लिए भी मजबूर किया.
लेकिन दोनों के बीच यह समानता एक सीमा तक ही है. येदियुरप्पा ने अपना आधार, जो उस समय उनके पास नहीं था, को बनाने के लिए पैदल मार्च किया था. उनके बेटे ने विरासत में मिले अपने उस आधार को बनाए रखने के लिए मार्च किया. पिता के मार्च के पीछे एक स्पष्ट मांग थी. बेटे की पदयात्रा शुरू होने से पहले ही उसकी मूल मांग खत्म हो गई थी.
इस दौरान विजयेंद्र का कुरुबा चरवाहों के तंबुओं में जाना भी कुछ विडंबना पैदा करता है. 2021 में कुरुबा मठों के प्रमुख ही अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग को लेकर पदयात्राओं का नेतृत्व कर रहे थे. उस समय यह आंदोलन तत्कालीन मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के लिए परेशानी का एक मुद्दा माना गया था. येदियुरप्पा उस समय अपने बेटे को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे.
उत्तराधिकार की यह कहानी आसान नहीं रही है. विजयेंद्र ने नवंबर 2023 में BJP की राज्य इकाई की कमान संभाली थी और आज वे पार्टी के ऐसे अकेले राज्य अध्यक्ष हैं, जिन्हें नया संगठनात्मक जनादेश नहीं मिला है. कर्नाटक में संगठनात्मक चुनाव कभी पूरे नहीं हुए. उनका कार्यकाल बस आगे बढ़ता रहा. बेंगलुरु या दिल्ली में कोई यह बताने का दावा नहीं करता कि ऐसा क्यों हुआ.
राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष के करीबी राज्य इकाई के एक धड़े ने विजयेंद्र के अध्यक्ष बनाए जाने के दिन से ही उनका विरोध किया है. पिछले एक साल में पार्टी के कई दिग्गज दिल्ली में डेरा डालकर नेतृत्व तक यह संदेश पहुंचाते रहे हैं कि विजयेंद्र को छोड़कर किसी को भी अध्यक्ष बनाया जाए.
लेकिन पार्टी नेतृत्व अपने फैसले से पीछे नहीं हटा. असंतुष्ट नेताओं को साफ तौर पर उसका आकलन बताया गया कि 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के मुख्य आधार को एकजुट करने और संगठन को व्यवस्थित करने की क्षमता येदियुरप्पा-विजयेंद्र की जोड़ी के अलावा किसी और में नहीं है.
हालांकि इसके साथ एक शर्त भी थी कि विजयेंद्र को जमीन पर खुद को साबित करना होगा. इस लिहाज से 'बल्लारी चलो' एक परीक्षा थी. समापन कार्यक्रम में बोम्मई, शेट्टार, अशोक और रेड्डी बंधुओं का मंच साझा करना ठीक वही नतीजा था जो BJP नेतृत्व चाहता था.
इसलिए पिछले तीन वर्षों का हिसाब कुछ इस तरह दिखता है. विजयेंद्र ने दो मार्च का नेतृत्व किया है. 2024 में मैसूरु चलो BJP-JD(S) का साझा अभियान था. 'बल्लारी चलो' BJP का अपना कार्यक्रम था और इसका अंत पार्टी के पुराने नेताओं, जिनमें असंतुष्ट नेता भी शामिल थे, के उनके पीछे आखिरी हिस्से में पैदल चलने के साथ हुआ.
विजयेंद्र ने इसे कांग्रेस सरकार के बाकी कार्यकाल तक चलने वाले आंदोलन का पहला चरण बताया है और पार्टी कार्यकर्ताओं को 2028 की तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया है.
'बल्लारी चलो' का संदेश साफ है. विजयेंद्र की कर्नाटक BJP और उसके राजनीतिक नैरेटिव, दोनों पर पकड़ है. सूखे, किसानों की परेशानी और दलितों के लिए तय फंड से लेकर राज्य के उत्तरी क्षेत्र की ‘उपेक्षा’ तक BJP का एजेंडा अब विधानसभा के पटल के बजाय उनकी पदयात्रा से तय हो रहा है.
मतदाता इसे स्वीकार करेंगे या नहीं, इसका सवाल 2028 में सामने आएगा. लेकिन राज्य BJP में विजयेंद्र के नेतृत्व को लेकर जो सवाल थे, वे कम से कम पदयात्रा के अंत तक सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए.

