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'आधी आबादी' को साधने के लिए क्या रणनीति बना रहे अखिलेश?

महिला सम्मान समारोह, पोस्टकार्ड अभियान और बूथ स्तर नेटवर्क के जरिए सपा सुप्रीमो 2027 चुनाव से पहले महिला मतदाताओं को साधने की रणनीति पर तेज़ी से काम कर रहे हैं

सपा कार्यलय में महिलाओं को सम्मानित करते अखिलेश और डिंपल यादव
सपा कार्यलय में महिलाओं को सम्मानित करते अखिलेश और डिंपल यादव
अपडेटेड 23 मार्च , 2026

वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखि‍लेश यादव ने अपनी राजनीतिक रणनीति में एक बार फिर ‘आधी आबादी’ को केंद्र में ला दिया है. लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग स्थ‍ित पार्टी मुख्यालय में 22 मार्च को आयोजित ‘मूर्ति देवी–मालती देवी महिला सम्मान समारोह’ केवल एक सांस्कृतिक या स्मरण कार्यक्रम नहीं था, बल्कि इसके जरिए समाजवादी पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आगामी चुनाव में महिला मतदाता उसके अभियान का अहम स्तंभ होंगी.

इस समारोह में डिंपल यादव की मौजूदगी और विभिन्न क्षेत्रों में 26 महिलाओं को सम्मानित करना एक प्रतीकात्मक कदम जरूर था, लेकिन इसके पीछे की राजनीतिक सोच कहीं ज्यादा व्यापक है. खेल, शिक्षा, चिकित्सा, साहित्य, दलित विमर्श और जनआंदोलन जैसे विविध क्षेत्रों से महिलाओं को सम्मानित कर पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह समाज के हर वर्ग की महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का दावा करती है.

भावनात्मक जुड़ाव की कोशिश

कार्यक्रम को सपा संस्थापक और अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव की मां मूर्ति देवी और अखिलेश की माता मालती देवी के नाम पर आयोजित करना भी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. मूर्ति देवी, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने मुलायम सिंह यादव को सामाजिक न्याय की राजनीति का संस्कार दिया, और मालती देवी, जिन्होंने परिवार और राजनीति के बीच संतुलन बनाते हुए मुलायम सिंह को मजबूत आधार दिया- इन दोनों के नाम का उपयोग कर पार्टी ने परंपरा, त्याग और महिला योगदान को एक साथ जोड़ने की कोशिश की है.

राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम कहते हैं, “यह सिर्फ एक सम्मान समारोह नहीं है. समाजवादी पार्टी महिला मतदाताओं के साथ भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव बनाने की कोशिश कर रही है. परिवार की महिलाओं के नाम को आगे रखकर वह भरोसे का नैरेटिव तैयार कर रही है.”

जमीनी फीडबैक का नया मॉडल

समाजवादी पार्टी की महिला सभा ने जिस ‘पोस्टकार्ड अभियान’ की शुरुआत की है, वह इस रणनीति का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. डिजिटल दौर में पोस्टकार्ड जैसे पारंपरिक माध्यम को फिर से जीवित करना अपने आप में अलग तरह का राजनीतिक प्रयोग है. इस अभियान के तहत महिलाओं को पोस्टकार्ड दिए जा रहे हैं, जिन पर वे अपनी समस्याएं सीधे अखिलेश यादव को लिख सकती हैं. अब तक करीब 20,000 पोस्टकार्ड वितरित किए जा चुके हैं, जिनमें से लगभग 8000 वापस भी आ चुके हैं.

इन कार्ड्स में महिलाओं ने सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है. SP महिला सभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष जूही सिंह के मुताबिक, “यह अभियान हमें सीधे जमीनी फीडबैक दे रहा है. इससे न केवल महिलाओं की वास्तविक समस्याएं समझने में मदद मिल रही है, बल्कि पार्टी और मतदाताओं के बीच एक सीधा संवाद भी स्थापित हो रहा है.” आशुतोष गौतम इसे इसे “डेटा-ड्रिवन राजनीति का लोकल वर्जन” बताते हैं. उनके अनुसार, “जहां बाकी पार्टियां सर्वे और डिजिटल एनालिटिक्स पर निर्भर हैं, वहीं SP ने भावनात्मक और व्यक्तिगत जुड़ाव का रास्ता चुना है. यह खासकर ग्रामीण महिलाओं के बीच असर डाल सकता है.”

बूथ से पंचायत तक महिला नेटवर्क का विस्तार

समाजवादी पार्टी महिला सभा ने केवल अभियान चलाने तक खुद को सीमित नहीं रखा है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे को भी मजबूत करने पर जोर दिया है. राज्य में 2000 से अधिक ‘महिला-केवल’ बैठकों का आयोजन किया जा चुका है. इन बैठकों का उद्देश्य महिलाओं को राजनीतिक रूप से सक्रिय करना और उन्हें सीधे पार्टी से जोड़ना है.

जानकारी के अनुसार, पार्टी अब हर बूथ पर महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही है. पंचायत स्तर तक नेटवर्क तैयार किया जा रहा है ताकि 2026 के पंचायत चुनावों से पहले ही मजबूत जमीनी पकड़ बनाई जा सके. राजनीतिक विश्लेषक अभि‍नव सिंह कहते हैं, “यह स्पष्ट है कि SP 2027 के चुनाव को सिर्फ विधानसभा स्तर पर नहीं देख रही, बल्कि पंचायत से लेकर बूथ तक एक मजबूत महिला कैडर तैयार कर रही है. यह रणनीति लंबी दौड़ की है.”

BJP के नैरेटिव को चुनौती

महिला मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की समाजवादी पार्टी की यह कोशिश सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उस नैरेटिव को चुनौती देने की भी कोशिश है, जिसमें उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन और कानून-व्यवस्था को महिला समर्थन का आधार बताया जाता रहा है. BJP का दावा रहा है कि महिला सुरक्षा और कल्याण योजनाओं के कारण महिला मतदाता उसके साथ मजबूती से जुड़ी हैं. वहीं समाजवादी पार्टी अब कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और स्थानीय मुद्दों को उठाकर इस धारणा को तोड़ने की कोशिश कर रही है.

22 मार्च को महिला सम्मान समारोह के दौरान अखिलेश यादव ने कहा, “अगर स्त्रियों की स्थिति का सही आकलन हो जाए, तो पूरे समाज की स्थिति समझ में आ जाती है.” यह बयान उनके राजनीतिक फोकस को भी साफ करता है.

महिला वोटरों तक पहुंचने की इस रणनीति में मैनपुरी से सांसद और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव की भूमिका भी अहम हो गई है. मैनपुरी और आसपास के क्षेत्रों में उन्होंने 100 से अधिक महिला बैठकों में हिस्सा लिया है. इन बैठकों में स्थानीय मुद्दों पर चर्चा और सीधे संवाद पर जोर दिया जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डिंपल यादव की ‘सॉफ्ट इमेज’ और संवाद शैली महिला मतदाताओं के बीच प्रभावी हो सकती है. लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध कालेज की वरिष्ठ शिक्षक अर्चना सिंह कहती हैं, “डिंपल यादव की छवि आक्रामक राजनीति से अलग है. वह संवाद और संवेदनशीलता के जरिए जुड़ती हैं, जो महिला वोटरों के बीच असरदार हो सकता है.”

महिला वोटर : चुनाव का निर्णायक फैक्टर

2024 के लोकसभा चुनावों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि महिला मतदाता अब चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं. उत्तर प्रदेश में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा. ऐसे में कोई भी पार्टी इस वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकती. राजनीतिक विश्लेषक अर्चना सिंह कहती हैं, “महिला मतदाता अब ‘साइलेंट वोटर’ नहीं रहीं. वे योजनाओं, सुरक्षा और स्थानीय मुद्दों के आधार पर निर्णय ले रही हैं. जो पार्टी उन्हें बेहतर तरीके से समझेगी, वही चुनाव में बढ़त बनाएगी.”

लखनऊ में हुआ महिला सम्मान समारोह इस पूरी रणनीति का एक दृश्य और प्रतीकात्मक हिस्सा भर है. इसके जरिए पार्टी ने एक तरफ अपने समाजवादी मूल्यों को रेखांकित किया, वहीं दूसरी तरफ भविष्य की राजनीतिक दिशा भी स्पष्ट की. फूलन देवी, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले, बेगम हजरत महल जैसे नामों पर दिए गए सम्मानों के जरिए पार्टी ने ऐतिहासिक और सामाजिक प्रतीकों को भी अपने नैरेटिव में शामिल किया. यह कोशिश दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं तक एक साथ पहुंचने की है.

यह सवाल अभी खुला है कि क्या समाजवादी पार्टी की यह ‘महिला-केंद्रित’ रणनीति 2027 में उसे राजनीतिक लाभ दिला पाएगी. लेकिन इतना साफ है कि पार्टी ने महिला मतदाताओं को लेकर अपनी रणनीति को बहुस्तरीय बना दिया है- भावनात्मक जुड़ाव, संगठनात्मक विस्तार, जमीनी फीडबैक और राजनीतिक संदेश, सभी स्तरों पर काम हो रहा है. आखिरकार, 2027 का चुनाव केवल वादों का नहीं, बल्कि भरोसे और जुड़ाव का चुनाव होगा. और इस बार, अखि‍लेश यादव ने यह तय कर लिया है कि उस भरोसे की कुंजी महिलाओं के हाथ में है.

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