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PDA रथयात्रा की शुरुआत के लिए अखिलेश ने रायबरेली को ही क्यों चुना?

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव 24 सितंबर को रायबरेली में PDA रथयात्रा शुरू करेंगे. सपा नेता का इस रणनीति में अपने कार्यकर्ताओं के साथ BJP और कांग्रेस पर भी ध्यान है

Akhilesh Yadav's PDA bus arrives in Lucknow as SP gears up for 2027 UP polls.
अखिलेश यादव और उनका PDA 'रथ'
अपडेटेड 23 सितंबर , 2026

समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव 24 सितंबर को रायबरेली से PDA रथ यात्रा शुरू करने जा रहे हैं. इसी के साथ वे एक तरह से विधानसभा चुनाव अभियान की दिशा तय करेंगे. 

सपा नेता का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब 17 सितंबर को फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज में समाजवादी छात्र सभा और ABVP कार्यकर्ताओं के बीच विवाद के बाद जिले की राजनीति गरमाई हुई है. 

छात्र संगठनों के बीच कहासुनी के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और सपा नेताओं ने पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए. पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की बात कही है. 

अखिलेश यादव ने इसे PDA पर हमले से जोड़ा है. पार्टी के हरचंदपुर विधायक राहुल लोधी ने भी पुलिस पर कार्रवाई में ज्यादती और जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए हैं हालांकि पुलिस ने इन आरोपों को खारिज किया है. ऐसे में अखिलेश का सबसे पहले राहुल लोधी के घर जाना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.

रथ यात्रा का कार्यक्रम बछरावां से शुरू होकर हरचंदपुर विधायक के आवास और फिर रायबरेली शहर तक जाने का है. पार्टी ने कार्यकर्ताओं की बड़ी मौजूदगी की तैयारी की है. स्थानीय सपा संगठन के मुताबिक करीब 1,200 कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के कार्यक्रम में शामिल होने की सूचना प्रशासन को दी गई है और अखिलेश करीब पांच घंटे रायबरेली में रहेंगे. 

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि किसी स्थानीय विवाद पर पार्टी अध्यक्ष की सीधी मौजूदगी कार्यकर्ताओं को संदेश देती है कि नेतृत्व स्थानीय संगठन और उसके नेताओं के साथ खड़ा है. यहां यह संदेश और मजबूत हो जाता है क्योंकि विवाद में सपा के छात्र संगठन के साथ उसके विधायक भी सक्रिय रूप से सामने आए थे. 

इस लिहाज से राहुल लोधी के घर चाय पीने का कार्यक्रम केवल व्यक्तिगत मुलाकात नहीं बल्कि स्थानीय संगठन को राजनीतिक रूप से सक्रिय करने की कवायद के तौर पर भी देखा जा सकता है. साथ ही अखिलेश के लिए यह PDA की उस राजनीति को स्थानीय घटना से जोड़ने का अवसर है, जिसे पार्टी 2027 के चुनाव की केंद्रीय रणनीति बना रही है. 

PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक. सपा द्वारा तैयार किए गए विशेष रथ पर डॉ. भीमराव आंबेडकर और समाज सुधारकों की तस्वीरों के साथ सामाजिक न्याय से जुड़े नारे लिखे गए हैं. 

सामाजिक जमीन तलाशने की कवायद

रायबरेली को चुनने का दूसरा पहलू सामाजिक समीकरण है. जिले की छह विधानसभा सीटों में 2022 में सपा ने चार सीटें जीती थीं. बछरावां से श्याम सुंदर भारती, हरचंदपुर से राहुल लोधी, सरेनी से देवेंद्र प्रताप सिंह और ऊंचाहार से मनोज कुमार पांडेय विजयी हुए थे. 

रायबरेली सदर और सलोन सीट BJP के खाते में गई थी. इन चार सीटों में से अब सपा के पास तीन विधायक हैं. ऊंचाहार के विधायक मनोज पांडेय 2024 में BJP में शामिल हो गए थे. इससे रायबरेली में सपा की विधानसभा संख्या चार से घटकर तीन हो गई. पांडेय ने 2024 के राज्यसभा चुनाव में BJP उम्मीदवारों के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी और बाद में BJP में शामिल हुए. 

यहीं से अखिलेश की रायबरेली यात्रा का तीसरा संदेश निकलता है. जिस जिले में पार्टी के पास अभी भी तीन विधायक हैं, वहां शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी के जरिए सपा की यह दिखाने की कोशिश है कि 2022 का आधार खत्म नहीं हुआ है. बल्कि पार्टी उसे नए सामाजिक समूहों तक विस्तार देने की तैयारी कर रही है. 

ऊंचाहार से सपा की सीट पर जीते मनोज पांडेय 2024 में BJP में शामिल हो गए थे (फाइल फोटो)
ऊंचाहार से सपा की सीट पर जीते मनोज पांडेय 2024 में BJP में शामिल हो गए थे (फाइल फोटो)

रथ यात्रा के शुरुआती रास्ते में बछरावां और हरचंदपुर का आना भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है. बछरावां से सपा विधायक श्याम सुंदर भारती दलित, विशेषकर पासी सामाजिक आधार से आते हैं, जबकि हरचंदपुर से राहुल लोधी लोधी पिछड़े समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं. यानी रायबरेली से PDA रथ निकालना केवल यादव-मुस्लिम समीकरण को दोहराने का कार्यक्रम नहीं है. 

इसमें गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलित समूहों को जोड़ने का संदेश भी है. 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा ने 80 में से 37 सीटें जीती थीं और पार्टी ने PDA को इस प्रदर्शन की अपनी प्रमुख राजनीतिक व्याख्याओं में रखा है. 

राजनीतिक विश्लेषक और केकेसी कॉलेज लखनऊ में राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र कहते हैं, “रायबरेली जैसे जिले में यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां कांग्रेस की ऐतिहासिक मौजूदगी और सपा की विधानसभा स्तर की ताकत साथ-साथ मौजूद है. अखिलेश की कोशिश यह दिखाने की हो सकती है कि PDA केवल एक चुनावी नारा नहीं बल्कि विधानसभा स्तर पर संगठन और सामाजिक प्रतिनिधित्व की रणनीति है.”

कांग्रेस को भी संदेश

अखिलेश की रायबरेली यात्रा का सबसे चर्चित पहलू कांग्रेस से जुड़ा है. रायबरेली लोकसभा सीट से 2024 में राहुल गांधी निर्वाचित हुए थे. ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेता के संसदीय क्षेत्र से सपा अध्यक्ष द्वारा अपने चुनावी अभियान के लिए PDA रथ निकालना स्वाभाविक रूप से दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे की संभावित बातचीत को चर्चा में लाता है.

रायबरेली लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली पांच विधानसभा सीटों में से तीन पर सपा के विधायक हैं जबकि रायबरेली और ऊंचाहार में BJP के विधायक हैं. यहां एक तथ्यात्मक पेच भी है. पूरे रायबरेली जिले में छह विधानसभा सीटें हैं, जबकि रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं. 

सपा का दावा जिले की मौजूदा विधानसभा मौजूदगी और 2022 के प्रदर्शन पर आधारित हो सकता है जबकि कांग्रेस के लिए रायबरेली का महत्व राहुल गांधी की लोकसभा सीट होने के कारण अलग है. यही संभावित सीट-शेयरिंग का आधार बन सकता है. 

सपा के पास तीन मौजूदा विधायक हैं और 2022 में उसने जिले की छह में से चार विधानसभा सीटें जीती थीं. कांग्रेस के पास फिलहाल जिले में कोई मौजूदा विधानसभा विधायक नहीं है. दूसरी तरफ कांग्रेस के पास रायबरेली लोकसभा सीट की राजनीतिक अहमियत है. इसलिए दोनों दलों के लिए रायबरेली में राजनीतिक दावे का आधार अलग-अलग है. 

ब्रजेश मिश्र मानते हैं कि अखिलेश का रायबरेली से PDA रथ निकालना कांग्रेस के खिलाफ सीधा कार्यक्रम घोषित करना नहीं है लेकिन यह अपने संगठन और चुनावी आधार का सार्वजनिक प्रदर्शन जरूर है. 

सीट बंटवारे की बातचीत में राजनीतिक दल सामान्य तौर पर अपने संगठनात्मक प्रभाव, पिछले चुनाव परिणाम और मौजूदा जनप्रतिनिधियों को आधार बनाते हैं. रायबरेली में सपा के पास इन तीनों में से कम से कम दो आधार मौजूद हैं. 

यही वजह है कि अखिलेश का कार्यक्रम कांग्रेस के लिए भी एक राजनीतिक संकेत के तौर पर पढ़ा जा रहा है. सपा यह बताना चाहती है कि गठबंधन की राजनीति के बावजूद वह अपने संगठन और सामाजिक आधार को स्वतंत्र रूप से सक्रिय रखेगी.
खाली हुई जगह को भरने की कोशिश

रायबरेली में अखिलेश की रणनीति का चौथा निशाना ऊंचाहार और मनोज पांडेय के BJP में जाने से बदला समीकरण है. 2022 में पांडेय ने ऊंचाहार सीट सपा के टिकट पर जीती थी. उन्हें 82,514 वोट मिले और BJP के अमरपाल मौर्य को 75,893 वोट मिले थे. जीत का अंतर 6,621 वोट था. 

फरवरी 2024 में राज्यसभा चुनाव के दौरान पांडेय का BJP उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करना सपा से उनके राजनीतिक अलगाव का बड़ा संकेत बना. 17 मई 2024 को उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में BJP की सदस्यता ग्रहण की थी.

इस बदलाव का महत्व केवल एक विधायक के पाला बदलने तक सीमित नहीं है. पांडेय रायबरेली की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और ब्राह्मण नेतृत्व के प्रमुख चेहरों में गिने जाते रहे हैं. ऐसे में उनके BJP में जाने के बाद सपा को ऊंचाहार में संगठन और नेतृत्व दोनों स्तरों पर नई रणनीति की जरूरत है.

अखिलेश का रायबरेली दौरा इसलिए पार्टी के तीन मौजूदा विधायकों को एक साथ राजनीतिक रूप से सक्रिय करने का अवसर भी है. हरचंदपुर के राहुल लोधी, बछरावां के श्याम सुंदर भारती और सरेनी के देवेंद्र प्रताप सिंह के जरिए सपा अलग-अलग सामाजिक समूहों और विधानसभा क्षेत्रों में अपने नेटवर्क को सामने ला सकती है. 

इसके साथ पार्टी बूथ स्तर पर संगठन विस्तार की तैयारी कर रही है. 'मिशन-50' के तहत हर बूथ पर नए सदस्य जोड़ने और संगठन को विधानसभा स्तर तक सक्रिय करने की रणनीति बताई गई है. PDA रथ इसी संगठनात्मक कवायद को सार्वजनिक राजनीतिक अभियान का रूप देने का माध्यम बन सकता है.

राहुल लोधी के घर से शुरुआत, बछरावां और हरचंदपुर का चयन तथा राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र का चुनाव, इन सबको साथ रखकर देखें तो यह 2027 के लिए सपा की बहुस्तरीय राजनीतिक तैयारी का पहला सार्वजनिक संकेत बनता है. 

पार्टी के लिए चुनौती अब इस संदेश को रायबरेली से बाहर अवध और फिर पूरे उत्तर प्रदेश में संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी गठबंधन की रणनीति में बदलने की है. 

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