
समाजवादी पार्टी (सपा) ने राज्यसभा के लिए रिलायंस समूह से जुड़े धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाकर कारोबारी जगत तक अपनी पहुंच बढ़ाने का संदेश दिया था. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर के 25 साल पूरे होने पर नाथवानी की तारीफ ने पार्टी को नए सवालों के बीच खड़ा कर दिया है.
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA गठजोड़ को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बना रही सपा के लिए यह विवाद इसलिए अहम है क्योंकि उसके उम्मीदवार ने उसी प्रधानमंत्री की प्रशंसा की है, जिनकी BJP को अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा यूपी में चुनौती दे रहे हैं.
सपा ने 30 सितंबर को राज्यसभा के लिए वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव और धनराज नाथवानी को उम्मीदवार घोषित किया था. नाथवानी रिलायंस समूह के वरिष्ठ अधिकारी और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं. उनके पिता परिमल नाथवानी झारखंड से राज्यसभा सदस्य हैं. अखिलेश यादव ने नाथवानी की उम्मीदवारी को कारोबारी जगत से संवाद बढ़ाने की रणनीति के तौर पर पेश किया.
पार्टी का तर्क रहा कि उद्योग, निवेश और रोजगार से जुड़े सवालों पर प्रभावी भूमिका निभाने के लिए कॉरपोरेट क्षेत्र से रिश्ते जरूरी हैं. लेकिन 7 अक्टूबर को नाथवानी ने X पर प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक सफर की तारीफ करते हुए लिखा, "नेतृत्व के 25 साल. समर्पण के 25 साल. सेवा के संकल्प के 25 साल." उन्होंने 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से लेकर प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व करने तक के सफर को राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण और दृढ़ता से जोड़ा.

यह पोस्ट ऐसे समय आई, जब सपा BJP के खिलाफ अपनी राजनीतिक लड़ाई तेज कर रही है. नाथवानी ने 6 अक्टूबर को अखिलेश यादव के समर्थन में भी पोस्ट किया था. दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया ब्लॉक के विरोध-प्रदर्शन के दौरान अखिलेश और अन्य नेताओं को हिरासत में लिए जाने पर उन्होंने चिंता जताई थी.
उन्होंने शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक संवाद को लोकतंत्र का अहम हिस्सा बताया था. उनके इन दो संदेशों ने राजनीतिक बहस को जन्म दिया है. हालांकि मोदी की तारीफ अपने आप में सपा और BJP के बीच किसी समझौते का प्रमाण नहीं है.
PDA की राजनीति पर मायावती का हमला
नाथवानी की उम्मीदवारी पर सवाल उनकी पोस्ट से पहले ही उठने लगे थे. बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने सपा पर आरोप लगाया कि वह PDA के नाम पर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों का समर्थन मांगती है लेकिन राज्यसभा उम्मीदवार चुनते समय परिवार और कारोबारी वर्ग को प्राथमिकता देती है.
सपा नेताओं ने इस आलोचना का बचाव करते हुए कहा कि कारोबारी जगत से जुड़े व्यक्ति को राज्यसभा भेजना समाजवादी विचारधारा के खिलाफ नहीं है. पार्टी नेताओं ने राममनोहर लोहिया के विचारों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सामाजिक समानता और आर्थिक समृद्धि साथ-साथ चल सकती हैं. उनके मुताबिक, उद्योग और कारोबारी समुदाय से संवाद बढ़ाना सपा की राजनीतिक पहुंच का विस्तार है, न कि PDA की राजनीति से पीछे हटना.
हालांकि पार्टी के भीतर भी इस फैसले को लेकर असहजता की खबरें सामने आईं. एक वरिष्ठ सपा नेता ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा कि मोदी और BJP का विरोध करने वाली पार्टी के उम्मीदवार की ओर से प्रधानमंत्री की तारीफ किए जाने पर उसका बचाव करना मुश्किल हो गया है. हालांकि यह एक नेता की प्रतिक्रिया है, पार्टी का आधिकारिक बयान नहीं.
AIMIM के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने भी नाथवानी की पोस्ट पर तंज कसते हुए लिखा, "मोदी जी से दोस्ती, समाजवादी पार्टी का प्यार, इस रिश्ते को क्या नाम दें, यह तो हर आम आदमी समझ सकता है." इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने सपा की BJP विरोधी राजनीति पर सवाल उठाया. पार्टी नेतृत्व की ओर से इस विवाद पर कोई विस्तृत सार्वजनिक सफाई सामने नहीं आई.
BJP को मिला हमला करने का मौका
BJP ने भी नाथवानी की टिप्पणी को लेकर सपा पर निशाना साधा. उत्तर प्रदेश BJP के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि नाथवानी ने दिमाग से नहीं, दिल से बात की है. उन्होंने मोदी के नेतृत्व में गरीबों के जीवन में बदलाव का दावा करते हुए अखिलेश यादव पर भी तंज कसा.
इस मामले में सपा के लिए चुनौती इसलिए बढ़ी है क्योंकि वह 2027 के विधानसभा चुनाव में PDA गठजोड़ को अपनी प्रमुख ताकत के रूप में पेश कर रही है. राज्यसभा की दो सीटों में से एक पर कारोबारी जगत से जुड़े व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने के बाद पार्टी को यह बताना पड़ रहा है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और कॉरपोरेट जगत से संवाद के बीच संतुलन कैसे बनेगा.
राज्यसभा चुनाव के दौरान PDA समुदाय से तीसरा उम्मीदवार उतारने की चर्चा भी हुई थी लेकिन सपा ने आखिरकार तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारा. अखिलेश यादव ने इसके बाद कहा, "अब हमारी नजर तीन पर नहीं, 403 सीटों पर है." उनका संकेत साफ था कि पार्टी का ध्यान अब विधानसभा चुनाव पर है.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नाथवानी की उम्मीदवारी को लेकर उठे सवालों से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि सपा के PDA गठजोड़ पर चुनावी असर पड़ेगा. लेकिन BJP और बीएसपी को अखिलेश यादव के राजनीतिक संदेश पर सवाल उठाने का मौका जरूर मिला है.

