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अहमदाबाद की रिहायशी बस्तियों तक क्यों पहुंचने लगे तेंदुए?

गुजरात में तेंदुओं के हमलों से लगातार लोगों की जान जा रही है. 20 जुलाई को एक तेंदुआ शहर की रिहायशी बस्ती के भीतर तक कैसे पहुंच गया और इसकी वजह क्या थी?

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 24 जुलाई , 2026

20 जुलाई की तड़के अहमदाबाद के घुम्मा-शेला-बोपाल इलाके की एक रिहायशी सोसायटी में एक तेंदुआ घुस आया. इसके बाद वन विभाग ने उसे खोजने के लिए अभियान चलाया, जिससे पूरे इलाके के लोगों में डर फैल गया.

तेंदुए को सबसे पहले रात करीब 2 बजे एक महिला ने देखा, जो शहर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित घुम्मा-शेला रोड पर शरणदीप सोसायटी के पास से कार से गुजर रही थीं. उन्होंने तेंदुए को सोसायटी की दीवार फांदते हुए देखा.

सीसीटीवी कैमरों में भी तेंदुआ दीवार पार कर एक बंगले में घुसता हुआ कैद हुआ. हालांकि, इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ. इसमें कोई दो राय नहीं कि कुछ लोग अनजाने में तेंदुए के सामने से जरूर गुजरे होंगे. सुबह होते ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.

इसके बाद वन विभाग, अहमदाबाद के कांकरिया चिड़ियाघर और एशियाई शेरों को संभालने में प्रशिक्षित गिर वन्यजीव अभयारण्य की विशेषज्ञ टीम मौके पर पहुंची. उनके पास थर्मल कैमरे, चारे वाले तीन पिंजरे और एक ड्रोन था.

दो दिन बाद शहर से करीब 26 किलोमीटर उत्तर में जूंदाल इलाके में भी तेंदुआ दिखने की अपुष्ट सूचना मिली. इसके बाद वन विभाग यह पता लगाने में जुटा कि एसपी रिंग रोड के आसपास एक ही तेंदुआ घूम रहा है या दो.

उप वन संरक्षक मीनल जानी ने कहा कि तेंदुआ आवारा कुत्तों का शिकार करते हुए शहर में आ गया था और अब वह अपने प्राकृतिक आवास में लौट गया है यानी शहर से बाहर चला गया है. हालांकि, अगले एक सप्ताह तक निगरानी जारी रहेगी.

सवाल यह है कि तेंदुआ रिहायशी इलाके के इतने भीतर तक क्यों पहुंचा? क्या यह असामान्य है? इसका सीधा जवाब है- आवारा कुत्ते.

तेंदुए सबसे ज्यादा परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने वाले बड़े वन्यजीवों में शामिल हैं. गुजरात के शहरों के बाहरी इलाकों में आवारा कुत्ते उनके लिए आसानी से मिलने वाला शिकार हैं. आमतौर पर झाड़ियां, खेत और गन्ने के खेत उन्हें छिपने की जगह देते हैं लेकिन शहर लगातार इन इलाकों तक फैलते जा रहे हैं.

ATREE (अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट) के सेंटर फॉर पॉलिसी डिजाइन के निदेशक, पशु पारिस्थितिकीविद और संरक्षण जीवविज्ञानी अबी तमीम वनक कहते हैं, "लकड़बग्घे, भेड़िए और तेंदुए जैसे जानवर इंसानों के कचरे की ओर आकर्षित होते हैं. उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. वे इंसानों की मौजूदगी के साथ खुद को ढाल सकते हैं और ऐसा उन्होंने किया भी है. तेंदुए बेहद अनुकूलनशील और समझदार होते हैं. हमें इस नई हकीकत को समझना होगा."

यही वजह है कि शेला की घटना सिर्फ एक वायरल वीडियो भर नहीं है. पूरे गुजरात में तेंदुओं के हमले लगातार लोगों की जान ले रहे हैं. वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 में तेंदुओं के हमलों में 12 लोगों की मौत हुई, जबकि 2021 में यह संख्या 15 थी.

2022 में 84 लोग घायल भी हुए। जूनागढ़ के संघर्ष वाले इलाकों में स्थिति और गंभीर है. वहां अप्रैल से नवंबर के बीच एक साल में आठ लोगों की मौत हुई और वन विभाग ने सिर्फ दो हफ्तों में 10 तेंदुओं को पकड़कर पिंजरों में बंद किया.

छोटे बच्चों को घर के दरवाजे से उठा ले जाने और खेतों में काम कर रहे मजदूरों पर हमले की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं. लोगों पर हमला करने वाले तेंदुओं को आमतौर पर जूनागढ़ चिड़ियाघर भेज दिया जाता है.

अहमदाबाद के लिए तेंदुआ कोई नई बात नहीं है, हालांकि शहर के पश्चिमी उपनगरों में उसका दिखना नया है. नवंबर 2018 में एक तेंदुआ गांधीनगर स्थित गुजरात सचिवालय में घुस गया था. वह 12 घंटे तक 200 से ज्यादा वनकर्मियों को चकमा देता रहा. बाद में उसे बेहोश कर इंद्रोड़ा नेचर पार्क भेजा गया. उस समय अधिकारियों ने बताया था कि अहमदाबाद के आसपास 40-50 वर्ग किलोमीटर के इलाके में तेंदुओं का बसेरा है. एक बार सुरेंद्रनगर के चोटीला की अदालत में भी एक तेंदुआ पहुंच गया था.

शहरों का विस्तार लगातार जंगलों की जमीन पर हो रहा है और जंगली शिकार की जगह अब आवारा कुत्ते तेंदुओं का भोजन बन रहे हैं. ऐसे में परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने वाले इस शिकारी की संख्या भी बढ़ रही है.

गुजरात की 2023 की गणना में राज्य में 2,274 तेंदुए दर्ज किए गए, जो 2016 के 1,395 तेंदुओं की तुलना में 63 फीसद अधिक हैं. पहली बार इस गणना में अहमदाबाद में भी एक तेंदुए की मौजूदगी दर्ज की गई. अब राज्य के एक-तिहाई से ज्यादा तेंदुए इंसानी बस्तियों के पास रहते हैं.

चिंता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि अहमदाबाद-गांधीनगर का फैलता शहरी इलाका अब वन्यजीवों के क्षेत्र से टकरा रहा है. इसी इलाके को भारत के खेल केंद्र के रूप में भी विकसित किया जा रहा है.

साणंद-घुमा रोड पर गोधावी में स्थित संस्कारधाम स्पोर्ट्स अकादमी में जूडो, कुश्ती, शूटिंग और फुटबॉल जैसे खेलों का प्रशिक्षण दिया जाता है. मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इसे राज्य की 2036 ओलंपिक मेजबानी की तैयारी का हिस्सा बनाया है.

इसी दक्षिण-पश्चिमी इलाके के मणिपुर और गोधावी में सरकार 500 से 1,000 एकड़ में स्पोर्ट्स सिटी और प्रस्तावित ओलंपिक विलेज बनाने की योजना पर काम कर रही है.

यहां नई मेट्रो लाइन भी प्रस्तावित है। इसके लिए सरकार कुछ वर्षों में जमीन अधिग्रहित कर निर्माण करना चाहती है. इससे शहर का विस्तार उन झाड़ियों तक पहुंच जाएगा, जहां तेंदुए शिकार करते हैं.

मोटेरा में 1.10 लाख दर्शकों की क्षमता वाले नरेंद्र मोदी स्टेडियम के आसपास विकसित किया जा रहा सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव, 2036 ओलंपिक और 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की भारत की दावेदारी का मुख्य केंद्र है.

लगभग 10 खेल स्थलों वाले इस परिसर पर 6,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. नरनपुरा में पहले से ही देश का सबसे बड़ा इंडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स है.

अहमदाबाद अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी की 20 साल की मास्टर प्लान में अहमदाबाद और गांधीनगर में कई खेल परिसरों का प्रस्ताव है. हर नया स्टेडियम, खिलाड़ी गांव और सड़क शहर की सीमा को और आगे बढ़ा रहा है, उसी इलाके में जिसे तेंदुआ अपना घर मानता है.

एशियाई शेर अब तक शहर से दूर रहे हैं, हालांकि जिले से पूरी तरह नहीं. फरवरी 2022 में गिर का रेडियो कॉलर लगा एक शेर अहमदाबाद जिले की दक्षिणी सीमा पर स्थित बलियारी वन क्षेत्र में देखा गया था.

यह शहर से करीब 140 किलोमीटर और भावनगर सीमा पर स्थित वेलावदर ब्लैकबक अभयारण्य से लगभग 5 किलोमीटर दूर है. मई 2025 की शेर गणना में गुजरात में 11 सौराष्ट्र जिलों में कुल 891 शेर दर्ज किए गए लेकिन अहमदाबाद में किसी स्थायी शेर की मौजूदगी दर्ज नहीं हुई.

फिलहाल अहमदाबाद की नई रिहायशी सोसायटियों में घूमने वाला जानवर तेंदुआ है और मौजूदा हालात को देखते हुए लगता है कि शेला जैसी घटना आखिरी नहीं होगी.

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