
कभी इस गांव में गुलाब उगते थे. अहमदाबाद की मंडियों में पौ फटने से पहले ही जिले की धोलका तालुके के भेतावाड़ा से ट्रक किसी शुभ संदेश के वाहक की तरह नियम से रवाना हो जाते थे. ओस से भीगे फूलों से लदे ये ट्रक खुशबू की तरह चारों ओर फैलते और शादियों तथा मंदिरों तक जाने वाली सड़कों को फूलों की मालाओं से पाट देते थे.
पंद्रह साल बाद वह शुभ संकेत मनहूस शक्ल ले चुका है. रंग और खुशबू भेतावाड़ा को छोड़ चुके हैं. उसके गुलाब मुरझा गए, खेत बर्बाद हो गए और गांव अब कैंसर के मरीजों की गिनती करता है. अब यहां केवल एक ही तरह की मालाएं दिखाई देती हैं—अंतिम संस्कार की. और वे भी कुछ ज्यादा ही बार नजर आती हैं.
अपनी तमाम परेशानियों के बदले भेतावाड़ा को मिला जहरीला कीचड़. एक दशक से भी ज्यादा समय से भेतावाड़ा और आसपास के त्रसाद, नेसड़ा, पालड़ी और अंबारेली गांवों में धोलका कस्बे का बिना साफ किया सीवेज छोड़ा जा रहा है. करीब 1.8 करोड़ लीटर सीवेज रोज खुली नालियों से इन गांवों में पहुंचता है.
ये नालियां गांवों को इस तरह काटती हुई गुजरती हैं, मानो कोई जीवनदायी प्रसाद बांट रही हों. गांववालों का आरोप है कि आसपास की दवा फैक्ट्रियां भी बिना साफ किया रासायनिक कचरा सीवेज में मिला देती हैं, ताकि उसकी पहचान छिप जाए. स्थानीय नेताओं, राज्य के मंत्रियों, कलेक्टरों, नगरपालिका अफसरों और प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों से बार-बार की गई फरियाद बेअसर रही. आखिरकार इसी ने विरोध के बीज बो दिए.
एक माह से ज्यादा वक्त से सैकड़ों ग्रामीण मर्द, औरतें और बच्चे रोज उस जगह पर जमा हो रहे हैं, जो रासायनिक कचरा छोड़ने की आरोपी कंपनियों में से एक से महज कुछ मीटर की दूरी पर है. एकजुट होने के बाद उनका गुस्सा सुना जा रहा है. अब वे निर्णायक हल के बगैर मानने को तैयार नहीं.
सबूत के तौर पर वे अपनी टेढ़ी-मेढ़ी हो चुकी उंगलियां और ऐसे चकत्ते दिखाते हैं जो कभी ठीक नहीं होते. बीस-पच्चीस साल की कई औरतें सिर पर पड़ चुके गंजे धब्बे दिखाती हैं. भेतावाड़ा की महिला सरपंच पन्ना वाघेला कहती हैं कि हाल के वर्षों में गांव के 50 से ज्यादा लोगों की कैंसर से मौत हुई और 20 से ज्यादा का इलाज हो रहा.
वे कहती हैं, “दूषित पानी जमीन के नीचे के पानी में मिल चुका है. हम इसी पानी से नहाने को मजबूर हैं. पेयजल के लिए हमने आरओ लगवाने के पैसे दिए हैं.”
भेतावाड़ा में चलते हुए सबसे पहले दुर्गंध का हमला होता है. रसायनों की गंध बाहर से आए लोगों को नाक ढकने पर मजबूर कर देती है. पन्ना कहती हैं, “हम यहीं रहते हैं. हमारे पास कोई दूसरी जगह नहीं है.”
घर उन नहरों से महज कुछ फुट दूर खड़े हैं, जिनमें झागदार जहरीला कीचड़ लगभग लगातार बहता रहता है. अगस्त के अंत में अफसरों ने प्रदर्शनकारियों को समझाकर आंदोलन खत्म कराने की कोशिश की मगर नाकाम रहे.
विडंबना देखिए कि गांवों के बीच फैला नालियों का जाल असल में वे नहरें हैं, जिन्हें राज्य सरकार ने 2015 में खुद खुदवाया था. इनका मकसद सिंचाई के लिए नर्मदा का पानी पहुंचाना था. ग्रामीणों के मुताबिक, वह पानी कभी नहीं आया.
उसकी जगह जहर की नदी आ गई. यह जहरीला पानी गुलाब के उन खेतों तक भी पहुंच गया, जो गांव की पहचान और कमाई का मुख्य जरिया थे. नर्मदा का पानी न मिलने पर गांव सिंचाई के लिए भूजल प्रयोग करता रहा. पन्ना कहती हैं कि बीते तीन साल से फसल पूरी तरह बर्बाद हो रही है.


जहर का जिम्मेदार कौन?
गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी की पड़ताल दोष की सुई धोलका की ओर मोड़ती है. वे कहते हैं, “हम हर पखवाड़े अचानक नमूने लेते हैं. उनमें लगातार बड़ी मात्रा में फीकल कोलीफॉर्म मिलता है. उसकी तुलना में रासायनिक कचरा न के बराबर है.”
अधिकारी व्यवस्था की एक बड़ी खामी की ओर इशारा करते हैं. धोलका से रोज दो करोड़ लीटर सीवेज निकलता है मगर उसके सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता रोजाना 1.35 करोड़ लीटर है. वे कहते हैं, “वह भी पूरी तरह काम नहीं कर रहा. 10 फीसद से भी कम सीवेज साफ हो पाता है.”
शहर के पुराने हिस्से भी कभी मुकम्मल सीवेज नेटवर्क से नहीं जुड़ पाए. अब अनियोजित शहरीकरण ने मुश्किल बढ़ा दी है. शहर अब रोजाना दो करोड़ लीटर क्षमता वाला एसटीपी बनाने की तैयारी कर रहा है.
उसका पहला एसटीपी बनने में छह साल लगे थे मगर अब अचानक तेजी दिख रही है. गुजरात हाइकोर्ट भी मामले की निगरानी में शामिल हो गया है और उसने 2018 की एक जनहित याचिका को खुद संज्ञान वाले मामले में बदल दिया है.
21 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति वैभवी नानावटी ने धोलका नगरपालिका को उसकी “पूरी निष्क्रियता” और “घोर अनदेखी” के लिए कड़ी फटकार लगाई और विशेषज्ञों से जांच कराने का आदेश दिया. ग्रामीणों का कहना है कि जहरीले पानी का बहना बंद होगा, तभी आंदोलन खत्म होगा.

