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अयोध्या : हार-जीत से ज्यादा नाक का सवाल

प्रदेश में जल्द होने जा रहे विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट पर होगी सबकी पैनी नजर. इसे जीतने के लिए सत्तारुढ़ भाजपा और विपक्षी सपा ने जोरदार रणनीति तैयार करने में पूरी ताकत झोंकी

श्रीमदभागवत कथा में स्वामी राघवाचार्य जी महाराज से आशीर्वाद लेते सपा प्रमुख अखिलेश यादव. साथ में विधानसभा की अयोध्या सीट से सपा के स्थानीय उम्मीदवार पवन पांडेय
अपडेटेड 3 नवंबर , 2026

समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव आठ अक्तूबर को रामनगरी अयोध्या पहुंचे. वे आए तो थे कृष्णापुर स्थित पार्टी के वरिष्ठ नेता तेजनारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय के आवास पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में शामिल होने, पर जल्द ही यह धार्मिक मंच भी सियासी अखाड़े में तब्दील होता नजर आया. अखिलेश के हाथ में गदा और त्रिशूल थे और उनके चारों तरफ साधु-संतों का जमावड़ा.

उनके निशाने पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनावी तैयारी थी. अखिलेश ने तंज कसा, “पवन पांडेय को जब से अयोध्या का प्रत्याशी घोषित किया गया तब से भाजपा सर्वे ही सर्वे करा रही है और कोई प्रत्याशी नहीं मिल रहा.” इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधे चुनौती देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री अयोध्या के विकास को लेकर इतने ही आश्वस्त हैं तो उन्हें स्वयं यहां से चुनाव लड़कर लोकप्रियता साबित करनी चाहिए.

दो दिन बाद 10 अक्टूबर को बलरामपुर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस चुनौती का जवाब देने में देर न की. उन्होंने कहा, “मैं अयोध्या से चुनाव लड़ने को तैयार हूं. अखिलेश यादव, आइए आप भी नामांकन कीजिए. आमने-सामने मुकाबला हो जाए और तय हो जाए कि किसमें कितना दम है.” हालांकि, योगी ने यह भी स्पष्ट किया कि अयोध्या उनके लिए आस्था का स्थान है और दौरों का उद्देश्य इसका समग्र विकास सुनिश्चित करना है न कि चुनाव लड़ना.

कुछ ही देर बाद अखिलेश ने सोशल मीडिया पर पलटवार करते हुए लिखा, “पवन का झोंका आएगा, अहंकार सब उड़ जाएगा. अयोध्या में चढ़ावा-चंदा-दान चोरों को हराने के लिए हमारा युवा पीडीए प्रहरी ही काफी है.” इस जबानी जंग ने राम मंदिर निर्माण के बाद पहली बार होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले अयोध्या की सियासी जंग को नया आयाम दे दिया.

योगी फिलहाल गोरखपुर शहर से विधायक हैं जबकि अखिलेश 2022 में मैनपुरी की करहल सीट से विधायक चुने गए थे. 2024 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज से सांसद बनने के बाद उन्होंने करहल सीट छोड़ दी थी. ऐसे में दोनों नेताओं की जुबानी जंग को फिलहाल चुनावी शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है. अयोध्या की सीट पर पूरे देश की नजरें होंगी.

अयोध्या की लड़ाई भाजपा और सपा के लिए महज एक सीट जीतने का मामला नहीं. इसमें राम मंदिर, विकास, जातिगत समीकरण और धार्मिक प्रतीकों के जरिए मतदाताओं के बीच राजनीतिक जमीन मजबूत करने की चुनौती भी शामिल है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या को समाहित करने वाली फैजाबाद सीट पर सपा के हाथों मिली हार भाजपा को अब तक कांटे की तरह चुभती आ रही है.

राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बावजूद भाजपा यहां लोकसभा सीट नहीं बचा सकी थी. सपा इस जीत को महज चुनावी संयोग मानने से इनकार करते हुए विधानसभा चुनाव में भी प्रदर्शन दोहराना चाहती है. यही वजह है कि अखिलेश ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा के पहले उम्मीदवार के रूप में पवन पांडेय का नाम अयोध्या सीट से घोषित किया.

पांच अगस्त को लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने पांडेय की उम्मीदवारी का ऐलान किया था. स्थानीय राजनीति में पहचान रखने वाले पांडेय को मैदान में उतारकर सपा ने भाजपा को सीधे चुनौती देने की रणनीति बनाई है.

अयोध्या सीट का चुनावी इतिहास भी इस मुकाबले को दिलचस्प बनाता है. पिछले आठ विधानसभा चुनावों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2012 तक यह सीट भाजपा का मजबूत गढ़ थी. उस साल बसपा सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी माहौल के बीच सपा ने पवन पांडेय को उम्मीदवार बनाया.

उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता लल्लू सिंह को 5,404 वोटों से हराकर अयोध्या पर सपा का परचम लहराया. उस चुनाव में भाजपा को करीब 26 फीसद ‌वोट मिले थे. इसके बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस सीट पर कब्जा ‌किया लेकिन पांडेय का वोट आधार बना रहा. 2017 में भाजपा के वेद प्रकाश गुप्ता ने पांडेय को 50,440 वोटों से हराया था.

2022 में भी गुप्ता ने जीत दर्ज की, लेकिन जीत का अंतर घटकर 19,990 वोट रह गया. इन नतीजों ने सपा को उम्मीद दी कि अयोध्या में भाजपा को चुनौती दी जा सकती है. भाजपा के लिए यह अपनी पकड़ बनाए रखने का सवाल बन गया है. पांडेय की उम्मीदवारी के पीछे उनकी स्थानीय पहचान के साथ भाजपा और राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े मुद्दों को उठाने की उनकी पुरानी भूमिका भी अहम है.

पांडेय ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की जमीन खरीद में कथित गड़बड़ियों और मंदिर के लिए मिले दान में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए थे. आरोपों और चंदे से जुड़ी शिकायतों ने मंदिर निर्माण के दौरान पारदर्शिता की बहस तेज की थी. सपा इन मुद्दों को भाजपा के धार्मिक राजनीति के दावों के सामने जवाबदेही के सवाल के रूप में उठाना चाहती है.

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने फैजाबाद सीट पर दलित नेता अवधेश प्रसाद को प्रत्याशी बनाकर दांव चला था. पार्टी की पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक रणनीति को यहां सफलता मिली और अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को हरा दिया. हालांकि, लोकसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम और अयोध्या विधानसभा क्षेत्र के प्रदर्शन में अंतर भी महत्वपूर्ण है.

भाजपा फैजाबाद लोकसभा सीट हारने के बावजूद अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में 4,667 वोटों से आगे रही थी. दूसरी ओर सपा ने दरियाबाद, रुदौली, मिल्कीपुर और बीकापुर विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई. इससे स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार को पूरे अयोध्या क्षेत्र में उसके जनाधार के निर्णायक पतन के रूप में नहीं देखा जा सकता. फैजाबाद लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा में अयोध्या विधानसभा सीट पर उम्मीदवार बदलने की अटकलें भी तेज हो गई हैं.

पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी के एक सदस्य नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि 2024 में लोकसभा सीट गंवाने की वजहों में लगातार दो बार से सांसद रहे लल्लू सिंह को उम्मीदवार बनाए रखना भी शामिल था. विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी उन विधायकों के प्रदर्शन की समीक्षा कर रही है जो लगातार दो या तीन बार से जीत रहे हैं. अयोध्या के मौजूदा विधायक वेद प्रकाश गुप्ता 2017 से इस सीट पर काबिज हैं.

उनकी उम्र 78 वर्ष है. 2017 में 50,440 वोटों से जीतने वाले गुप्ता का जीत का अंतर 2022 में घटकर 19,990 रह गया था. उनकी उम्र और घटते जीत के अंतर के कारण उनके टिकट को लेकर अटकलें लग रही हैं. 

राम की शरणः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या के राम मंदिर में पूजा करते हुए
अयोध्या से भाजपा विधायक वेद प्रकाश गुप्ता (माला पहने हुए) पार्टी नेता के साथ

गुप्ता की जगह संभावित उम्मीदवारों में गोसाईंगंज के विधायक अभय सिंह का नाम चर्चा में है. अभय सिंह सपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे, लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग करने के बाद सत्तारूढ़ दल के करीब आए और अक्तूबर 2026 में भाजपा में शामिल हो गए. दूसरे दावेदार गोसाईंगंज से भाजपा के पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी हैं, जो अपनी पत्नी आरती तिवारी के लिए टिकट मांग रहे हैं.

खब्बू तिवारी को 2021 में फर्जी मार्कशीट मामले में दोषी ठहराया गया था, जिसके चलते वे खुद चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं. उनकी पत्नी 2022 के विधानसभा चुनाव में गोसाईंगंज से अभय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ी थीं, लेकिन हार गई थीं. हालांकि अयोध्या विधानसभा सीट पर भाजपा की तरफ से किसी ब्राह्मण या बाहुबली उम्मीदवार को कभी जीत हासिल नहीं हुई है.

भाजपा को उम्मीदवार चुनते समय जातिगत समीकरण, स्थानीय स्वीकार्यता और संगठनात्मक संतुलन साधने की चुनौती होगी. पार्टी किसी पिछड़े वर्ग के नेता को मौका देकर आसपास के जिलों में सामाजिक समीकरण दुरुस्त करने पर भी विचार कर सकती है. भाजपा ने सपा की पीडीए रणनीति का जवाब देने के लिए संगठन में भी बदलाव किए हैं.

पार्टी ने पहली बार दलित नेता राधेश्याम त्यागी को अयोध्या का जिलाध्यक्ष बनाया है. त्यागी सांसद अवधेश प्रसाद के इनायतनगर स्थित आवास से सटे कुचेरा बाजार के रहने वाले हैं. उनकी पहचान हिंदूवादी और जमीनी नेता के तौर पर बताई जाती है.

इसके अलावा वरिष्ठ भाजपा नेता अनूप गुप्ता को अयोध्या जिला और प्रदेश मंत्री शिवभूषण सिंह को अयोध्या महानगर का प्रभारी बनाया गया है. इन नियुक्तियों को चुनाव से पहले संगठन में नई ऊर्जा भरने और सपा के सामाजिक समीकरणों की काट तैयार करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

अयोध्या की चुनावी लड़ाई में राम मंदिर के साथ नागरिक सुविधाओं का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है. योगी आदित्यनाथ ने 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने के बाद अयोध्या को सरकार की प्राथमिकताओं में रखा. फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या किया गया और दीपोत्सव को व्यापक स्वरूप दिया गया. राम मंदिर निर्माण के साथ सड़क, परिवहन, पर्यटन और अन्य बुनियादी ढांचे से जुड़ी बड़ी परियोजनाएं शुरू हुईं.

मुख्यमंत्री 50 से ज्यादा बार अयोध्या पहुंचकर रामलला के दर्शन कर चुके हैं और सरकार इन परियोजनाओं को शहर के विकास तथा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास के रूप में पेश करती रही है. लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद रुके हुए ड्रेनेज कार्य, सड़कों की स्थिति और अधूरी परियोजनाओं को लेकर सवाल फिर उठने लगे हैं.

पवन पांडेय इन मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरते हुए कहते हैं, “लोकसभा चुनाव में अयोध्या में भाजपा की बढ़त बहुत कम थी. जनता भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार, बुनियादी सुविधाओं की कमी और भाजपा नेताओं के वीआईपी कल्चर से नाराज है. अधिकारी और प्रॉपर्टी डीलर जनता को लूट रहे हैं. राम मंदिर निर्माण का अयोध्या की जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है.”

ये सपा प्रत्याशी के आरोप हैं, जिनकी चुनावी अहमियत इससे तय होगी कि मतदाता विकास कार्यों और अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को किस तरह देखते हैं.

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