
मॉनसून की बारिश से बुनियादी ढांचे को चौतरफा तहस-नहस करने वाले सितंबर के आने से ठीक पहले हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को एक अप्रत्याशित-सा बयान देते सुना गया. उनकी सरकार ने केंद्र को चिट्ठी लिखकर कहा कि वह राज्य के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) काडर के लिए स्वीकृत 153 पदों को घटाकर 130 करना चाहती है. और अगर इस सेवा के भीतर वालों ने ही विरोध न किया होता तो वे इन्हें शायद 110 पर ले आते.
इन अधिकारियों की दलील थी कि सुक्खू गलत गुणा-भाग करके खोखली लफ्फाजी कर रहे हैं क्योंकि वे उन्हीं पदों को खत्म कर रहे हैं जो वैसे भी खाली पड़े हैं. मगर मुख्यमंत्री कैंची में उंगलियां डाले तस्वीर क्यों खिंचवा रहे थे?
राज्य आमतौर पर आइएएस अफसरों की संख्या बढ़ाने की मांग करते हैं. वे ज्यादा अफसर चाहते हैं और इतने हैं नहीं. भारत के आइएएस पूल में फिलहाल 5,577 अफसर हैं जबकि स्वीकृत पद हैं 6,877, यानी करीब 19 फीसद कम. आइपीएस अफसर 505 कम हैं.
भारतीय वन सेवा की और भी दुर्गति है, जहां 3,193 स्वीकृत पदों के मुकाबले 2,151 अफसर हैं. उत्तर प्रदेश के आइएएस अफसरों की गिनती 652 से बढ़कर 2026 में 683 पर पहुंच गई. हरियाणा अपने 226 स्वीकृत पदों में से 44 खाली पद भरने की मांग कर रहा है. हिमाचल में भी वीरभद्र सिंह की सरकार ने ज्यादा अफसरों की मांग की थी.
आय की असमानता?
फिर सुक्खू ऐसा क्यों कर रहे हैं? पैसा. उनके हिसाब से हर साल अफसरों की गिनती कम करके राज्य 100 करोड़ रुपए से लेकर दोगुने तक बचा सकता है. किफायतसारी की तरफ इस झुकाव के पीछे आमतौर पर होने वाला ‘वित्तीय संकट’ नहीं है.
हिमाचल गरीब राज्य नहीं है. वित्त वर्ष 2025-26 के लिए इसकी प्रति व्यक्ति आय 2.83 लाख रुपए आंकी गई जो 2,19,575 रुपए के राष्ट्रीय औसत से खासी ज्यादा है. इसकी अर्थव्यवस्था वास्तविक रूप में भारत की 7.4 फीसद के मुकाबले करीब 8.3 फीसद की दर से बढ़ी. कर राजस्व भी ज्यादा पीछे नहीं है, जो राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 5.5 फीसद है.

तो भी 2026-27 का बजट राज्य के इतिहास का पहला ऐसा बजट था जो पिछले बजट से छोटा था. यह 58,514 करोड़ रुपए से घटकर 54,828 करोड़ रुपए पर आ गया. राज्य को 35,641 करोड़ रुपए तो तनख्वाहों, पेंशन और ब्याज चुकाने में ही खर्चने पड़ते हैं, जो अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का भारी-भरकम 88 फीसद है और दो वित्त वर्ष पहले के 80 फीसद से बढ़ गया है. भारत के राज्यों के बजट में यह औसतन 50-55 फीसद होता है.
आइएएस काडर को किया जाने वाला भुगतान राज्य के वेतन बिल का महज एक फीसद से कुछ ही ज्यादा होगा. सुक्खू के इस कदम को दक्षता के बजाए घबराहट का संकेत मानना चाहिए. इसकी वजह पहली फरवरी को ही स्पष्ट हो गई थी, जब 16वें वित्त आयोग ने सिफारिश की थी कि किसी भी राज्य को राजस्व घाटा अनुदान नहीं दिया जाएगा क्योंकि इससे प्रतिकूल प्रोत्साहन लाभ मिलता है.
ये अनुदान अंतर पाटने की व्यवस्था के तहत दिए जाते थे ताकि वित्तीय रूप से संकटग्रस्त राज्य कर्ज के भंवर में पड़े बिना अनिवार्य सेवाएं मुहैया कर सकें. ऐतिहासिक रूप से इसका फायदा हिमाचल, पंजाब, केरल और उत्तरपूर्वी राज्यों को मिलता रहा है.
पिछले आयोग के तहत हिमाचल को पांच सालों में 37,199 करोड़ रुपए मिले जो धीरे-धीरे घटकर 2021-22 में 10,249 करोड़ रुपए से 2025-26 में 3,257 करोड़ रुपए पर आ गए. यह स्रोत भी खत्म हो रहा है. सुक्खू सालाना नुक्सान 8,105 करोड़ रुपए का आंकते हैं. राज्य कानूनी विकल्पों की पड़ताल कर रहा है.
उनकी शिकायत दरअसल पीछे दूर तक जाती है. सुक्खू का कहना है कि जीएसटी की बंद कर दी गई भरपाई करीब 2,600-3,000 करोड़ रुपए होती है; 2023 के मॉनसून के लिए आपदा राहत के तहत 9,042 करोड़ रुपए अब भी बाकी हैं; पेंशन में कटौतियों के 9,200 करोड़ रुपए केंद्र ने रोक रखे हैं; और राज्य ने पुरानी पेंशन योजना बहाल करने के बदले उधारी की सीमा में 2,000 करोड़ रुपए की कटौती का जुर्माना सहा.
ये दलीलें मनाली राजमार्ग पर ट्रैफिक जाम की तरह हैं. सुक्खू विपक्षी राज्य होने के नाते केंद्र की तरफ से पक्षपात का आरोप लगाते हैं. आलोचक नाकारापन की बात करते हैं. वे उगाहे नहीं गए विशाल भूराजस्व का जिक्र करते हैं और पूंजीगत खर्च में पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 22 फीसद की कमी की ओर भी इशारा करते हैं. शिमला में सीएम, उनके मंत्रियों, विधायकों और बड़े अफसरों के वेतन छह महीने के लिए टाल दिए गए हैं. संकट गहरा है.

