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डार्क मोड

2047, राजधानी की कायापलट

नए मास्टर प्लान में शहरी आबादी के सारे घनत्व को नए भूगोल यानी पश्चिम में यूईआर-II नाम की आउटर, आउटर रिंग रोड पर ले जाने की परिकल्पना

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दिल्ली के कायापलट की तैयारी
अपडेटेड 13 सितंबर , 2026

द‌िल्ली 2047 में कैसी दिखाई देगी? बाहरी छोरों से शुरू करते हैं. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बेतरतीब फैलाव को छोड़ भी दें, तो फिलहाल मन-मस्तिष्क में एक ऐसे शहरी केंद्र की छवि उभरती है जो खेतों और गांवों के अर्धशहरी लैंडस्केप में छितराता जाता है. दिल्ली का 2047 का मास्टर प्लान इसे उलट देता है. वह दिल्ली को केंद्र से दूर ले जाएगा.

इसका बाहरी घेरा रत्न जड़े हार की तरह विकसित होगा: चारों तरफ 75 किलोमीटर का एक्सप्रेसवे और उसके दोनों तरफ गगनचुंबी इमारतों का गोलाकार झुंड. यह एक्सप्रेसवे दरअसल दिल्ली की तीसरी ‌‌रिंग रोड होगा. छह लेन की यह अर्बन एक्सटेंशन रोड-II समय के साथ शह‌रीपन के असर में पूरी तरह डूबकर घरों, दफ्तरों, बाजारों, गोदामों और सरकारी इमारतों की ऐसी दीवार में बदल जाएगी जो भविष्य की सारी जरूरतें पूरी करेगी.

यूईआर-II पश्चिम की तरफ आधे चंद्रमा सरीखी मेहराब होगी, जो उत्तर में अलीपुर को बवाना, रोहिणी, मुंडका, नरेला, नजफगढ़ और द्वारका होते हुए दक्षिण में महिपालपुर से जोड़ेगी. इसके दोनों ओर 250 मीटर की पट्टी घना बसा गलियारा बन जाएगी, जहां भूखंडों का फ्लोर-एरिया अनुपात (एफएआर) 400 होगा.

इससे जो उभरकर आएगा, वह मिले-जुले इस्तेमाल की जगहों वाला नया बाहरी शहर होगा, यानी जिसमें घरों की बगल में बाजार, क्लिनिक, स्कूल वगैरह होंगे. हर चीज हाइवे के इर्द-गिर्द बनाने के पीछे इरादा यह है कि सफर छोटा हो, ज्यादा लोग अपनी नौकरियों या काम-धंधों के नजदीक रहें और इस तरह कम कारें भीड़भाड़ भरे शहर की सड़कों पर निकलने के लिए मजबूर हों.

एक ही यातायात प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव है, ताकि मेट्रो, बसें और आखिरी छोर तक पहुंचाने वाले साधन एकल व्यवस्था की तरह काम कर सकें. कुछ जगहों पर इमारतें ऊंची और महंगी होंगी, तो कुछ दूसरी जगहों पर सस्ती, क्योंकि 20 फीसद इलाका 60 वर्ग मीटर से छोटे घरों के लिए रखा गया है.

आगे की आबादी का घनत्व

दिल्ली में 2047 तक 3.2 करोड़ लोगों के बसने की उम्मीद है. उसे रोज 160 करोड़ गैलन पीने के पानी, व्यस्ततम समय में 25,500 मेगावॉट बिजली, और रोज मौजूदा भार से दोगुने 25,764 टन कचरे से निबटने की जरूरत होगी.

समाधान है गंदे पानी का शोधन, विकेंद्रीकृत जलशोधन, मोहल्लों के स्तर पर गीले कचरे की प्रोसेसिंग, और बड़ी छतों पर सौर पैनल. पुरानी कॉलोनियों का डेढ़ गुना तक पुनर्निमाण किया जा सकता है. मगर जमीनों को साझा स्वामित्व के छाते तले लाकर, नालों में सुधार करके, पार्किंग का इंतजाम करके और गहमागहमी भरे केंद्रों पर भीड़भाड़ शुल्क लगाकर ही ऐसा किया जा सकता है.

यमुना के बाढ़ प्रभावित निचले इलाकों को निर्माण मुक्त रखा जाएगा. सभी 22 बड़े नालों को नदी में मिलने से पहले रोका जाएगा. अन्य जगहों पर नालों को उनके मूल रूप में फिर से लाया जाएगा. यानी बरसाती बगीचे, छोटे-छोटे जंगल, साइक्लिंग ट्रैक, जलशोषक फुटपाथ और पेड़-पौधों से ढकी उथली नहरें बनाकर उनका जीर्णोद्धार किया जाएगा.

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