
अगस्त की उमस भरी एक रात, कोलकाता के पूर्वी छोर पर आनंदपुर थाने के सामने भाजपा के ही दो गुट आपस में भिड़ गए. एक अधेड़ व्यक्ति ने चिल्लाते हुए कहा, “आमरा दाल-भात खेते पाछिना, आर ओरा खासिर मांसो खाबे? (हम दाल-भात भी नहीं खा पा रहे और वे मटन उड़ाएंगे?)”
झगड़ा महज इसलिए हुआ क्योंकि एक गुट ने दूसरे को बताए बिना पिकनिक आयोजित कर ली थी. लड़ाई में कई लोगों के सिर फूटे और महिलाओं से भी मारपीट की गई.
यह कोई अकेली घटना नहीं. जिस पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस की ‘गुंडागर्दी’ की वर्षों तक आलोचना करते हुए सत्ता हासिल की उसे भी वैसा ही बनते देखा जा रहा. तोलाबाजी, कट मनी, धमकाना, स्थानीय बाहुबलियों का दबदबा और गुटीय हिंसा जैसे आरोप लग रहे हैं. ठीक वही चीजें, जिनसे बंगाल को मुक्त कराने का उसने वादा किया था.

राज्य भाजपा इससे अनजान नहीं है. सत्ता में आने के बाद से पार्टी ने वसूली और भ्रष्टाचार के आरोप में करीब 30 कार्यकर्ताओं को निष्कासित और 250 को निलंबित किया है. हाल में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने अनुशासनहीन काडर को चेतावनी देते हुए कहा, “अगर 20-25 विधायकों को भी निष्कासित करना पड़े, तो इससे पार्टी प्रभावित नहीं होगी.”
मंत्री दिलीप घोष और अग्निमित्रा पॉल ने भी काडर को कट मनी की संस्कृति के खिलाफ चेताया है. टैक्सी-ऑटो यूनियनों पर कब्जे के साथ-साथ जमीन कब्जाने जैसी घटनाओं ने आरएसएस की पत्रिका स्वस्तिका को भी ‘तृणमूलीकरण’ पर नाराजगी जताने पर मजबूर कर दिया है.
उभरता दाग
दक्षिण 24 परगना और बर्धमान में भाजपा विधायकों पर मकान-दुकान ढहाने की धमकी देकर स्थानीय लोगों से पैसे वसूलने और पीडब्ल्यूडी ठेकेदारों से भी उगाही के आरोप लग रहे हैं. कोलकाता के एक मंडल अध्यक्ष को एक रियल एस्टेट कारोबारी से पांच लाख रुपए मांगने के आरोप में पद से हटाया गया.
अपने ही आकलन में इसे ‘तृणमूलीकरण’ कहा जा रहा. यह दरअसल तृणमूल से आए लोगों को उनकी शैली और संस्कृति के साथ हजम न कर पाने का नतीजा है. आनंदपुर की झड़प, बताते हैं, पुराने भाजपाइयों और तृणमूल से आए स्थानीय बाहुबलियों के बीच हुई.
पार्टी के एक नेता कहते हैं, “इन लोगों ने सिर्फ अपना झंडा बदला है, सियासी संस्कृति नहीं.” पर यह बदलाव धीरे-धीरे स्थानीय स्तर पर घुलने-मिलने से भी आता है. स्थानीय स्तर पर भाजपा उस सियासी संस्कृति में अच्छी तरह ढल गई है जिसके खिलाफ उसने चुनाव अभियान चलाया था.
एक आइएएस अफसर कहते हैं, “हमें लगा था कि तृणमूल शासन में भ्रष्टाचार, जबरन वसूली वगैरह चरम पर पहुंच चुके थे. मगर हैरानी होती है कि महज तीन महीने में कुछ विधायक ऐसे रंग दिखा रहे हैं.”
एक जिलाधिकारी के मुताबिक, तृणमूल के दौर में मंत्री या विधायक ही पक्षपात की मांग किया करते थे. अब तो छोटे स्तर के कार्यकर्ता भी ऐसी गुस्ताखियां करने लगे हैं.

