
राजस्थान में ओबीसी सर्वे की रिपोर्ट ने नई राजनैतिक संभावनाएं खोल दी हैं. इसके आंकड़े राज्य में दबदबा रखने वाली जाट राजनीति की सौदेबाजी की ताकत कम कर सकते हैं और नया राजनैतिक परिदृश्य गढ़ सकते हैं. उन्नीस अगस्त को राज्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह ने 309 स्थानीय नगर निकायों के लिए दो चरण—9 और 11 सितंबर—में चुनाव का ऐलान किया. वोटों की गिनती 14 सितंबर को होगी.
ये चुनाव भजनलाल शर्मा सरकार की लोकप्रियता की पहली बड़ी परीक्षा होंगे. फिर भी, एक दिलचस्प कदम उठाते हुए सरकार ने शहरी निकाय चुनावों को पंचायती राज चुनावों से अलग कर दिया है. इनको 17-18 सितंबर तक टाल दिया गया है.
नगरपालिका चुनावों के उलट पंचायत चुनाव बगैर पार्टी चुनाव चिह्न लड़े जाते हैं लेकिन उनके नतीजों से राजनैतिक दलों और सामाजिक समूहों की ताकत का पता चलता है. लिहाजा, सरकार ज्यादा राजनैतिक महत्व वाले ग्रामीण चुनावों में उतरने से पहले शहरी राजस्थान में अपनी ताकत का अंदाजा लगा सकती है.
इस बीच ओबीसी सर्वे रिपोर्ट ने आने वाले चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है. सर्वे के मुताबिक, राजस्थान में ओबीसी आबादी 3.63 करोड़ से ज्यादा है और इसमें 92 समुदाय शामिल हैं.
सात समुदायों की हिस्सेदारी कुल ओबीसी आबादी का 55.14 फीसद है. पिछड़ों की आबादी के अंदर 20.14 फीसद के साथ जाट और जट सिख सबसे बड़े समूह हैं. इसके बाद गुर्जर (9.11%), कुम्हार-कुमावत (8.36%), माली-सैनी-बागवान (7.80%), जांगिड़-सुथार (3.49 %), यादव-अहीर (3.22%) और मेव (3.02%) आते हैं.
सालों से जाटों के कुछ वर्गों का दावा रहा है कि राजस्थान की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी 12 फीसद या उससे ज्यादा है. लेकिन सर्वे के मुताबिक, जाट और जट सिखों के लिए यह आंकड़ा करीब 9.2 फीसद है. इसी तरह गुर्जर समुदाय, जो अपनी आबादी आठ फीसद तक होने का दावा करता है, की संख्या अब 4.2 फीसद होने का अनुमान है. हालांकि ज्यादा वंचित जातियों की तुलना में सरकारी नौकरियों में इनकी हिस्सेदारी कहीं बेहतर है.

राजस्थान सरकार में लगभग 3.92 लाख ओबीसी कर्मचारी हैं. इनमें से चार समुदायों—जाट, गुर्जर, सैनी और यादव—की हिस्सेदारी करीब 78 फीसद है. अकेले जाट लगभग 1.82 लाख सरकारी कर्मचारी हैं, जो ओबीसी सरकारी कर्मचारियों की कुल संख्या का करीब 46 फीसद है. हो सकता है कि कई कर्मचारी अलग-अलग श्रेणियों या तरीकों से नौकरी पाए हों. लेकिन आंकड़ों से राजनैतिक नैरेटिव तो गढ़ा ही जा सकता है.
भाजपा के लिए यह सर्वे सोशल इंजीनियरिंग का जरिया बन सकता है. हरियाणा में पार्टी इसे आजमा चुकी है. 2014 में पार्टी ने राज्य की जमी-जमाई जाट राजनीति की धुरी को तोड़ा और गैर-जाट वोटरों को एकजुट किया था.
हालांकि राजस्थान का मामला अलग है. यहां जाटों की आबादी संख्या के लिहाज से हरियाणा जितनी नहीं है और वे एकतरफा किसी पार्टी के साथ नहीं रहे. फिर भी, ओबीसी सर्वे से यह सवाल उठाने की नई दलील मिलती है कि क्या वाकई इस कैटेगरी का सबसे ज्यादा फायदा उन्हें ही हुआ है और क्या उन्हें चुनावों में बड़ी संख्या में टिकट मिलने चाहिए? इससे ओबीसी के भीतर और ज्यादा वर्गीकरण की मांग मजबूत होती है.
अब भाजपा के पास एक दिलचस्प राजनैतिक मौका है. उसे जाटों और गुर्जरों से सीधे भिड़ने की जरूरत नहीं. इसके बजाए, वह छोटी ओबीसी जातियों को बता सकती है कि पिछड़े वर्ग की पुरानी व्यवस्था का फायदा कुछ ही असरदार जातियों को मिला है. ठीक इसी तरह हरियाणा में जाति के गणित को राजनैतिक रणनीति में बदला गया था.
हालांकि, अंतिम परीक्षा तो पंचायतों में होगी. सितंबर के शहरी नतीजे दिखाएंगे कि क्या भाजपा अपनी सोशल इंजीनियरिंग को वोटों में बदल सकती है. वहीं बाद में होने वाले पंचायत चुनावों से पता चलेगा कि यह संदेश राजस्थान के गांवों तक पहुंचा या नहीं, जहां जाटों का अच्छा-खासा दबदबा है.

