मेडिकल के एंट्रेंस टेस्ट में गड़बड़ियों की खबरें सब जगह छाई हुई हैं. लेकिन एक धांधली ऐसी भी है जिसकी तरफ कम ही ध्यान दिया गया है. ऐसा लगता है कि विदेश के संस्थानों से मेडिकल ग्रेजुएट बनने वाले डॉक्टर फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (एफएमजीई) परीक्षा पास किए बिना ही बाकायदा स्थानीय स्तर पर रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं और नकली सर्टिफिकेट के जरिए कथित प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं.
हाल ही कजाखस्तान से एमबीबीएस करने वाले 27 साल के एक डॉक्टर की गिरफ्तारी हुई है. इससे उस बड़े नेटवर्क की एक और कड़ी पकड़ में आई है, जो एफएमजीई के नकली सर्टिफिकेट मुहैया कराता है.
स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप (एसओजी) के अतिरिक्त महानिदेशक विशाल बंसल के मुताबिक, जिस ग्रेजुएट नितिन कुमार की बात हो रही है, वह स्क्रीनिंग एग्जाम में बार-बार फेल होता रहा, उसने नकली एफएमजीई सर्टिफिकेट के लिए कथित तौर पर 10 लाख रुपए दिए. उस सर्टिफिकेट के जरिए उसने राजस्थान मेडिकल काउंसिल (आरएमसी) से कथित तौर पर इंटर्नशिप और प्रॉविजनल रजिस्ट्रेशन जुटा लिया.
जांच के बाद 29 लोगों की गिरफ्तारी हुई है, जिनमें काउंसिल के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. राजेश शर्मा, दलाल और विदेश में पढ़े 24 ग्रेजुएट शामिल हैं. जांच करने वालों का कहना है कि उन्होंने 100 से ज्यादा ऐसे विदेशी ग्रेजुएट की पहचान की है, जिन्होंने कथित तौर पर नकली एफएमजीई सर्टिफिकेट हासिल किए और राजस्थान में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए उनका इस्तेमाल किया.
एफएमजीई की परीक्षा साल में दो बार होती है और भारत की चिकित्सा प्रणाली में इसकी खास अहमियत है. कुछ गिने-चुने देशों को छोड़ दें तो विदेश से एमबीबीएस की डिग्री लेने वाले भारत के किसी भी नागरिक या ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (ओसीआई) के लिए यह परीक्षा पास करनी जरूरी होती है. इसके बाद ही उसका रजिस्ट्रेशन हो सकता है.
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज यह परीक्षा कराता है. इसे भारत की सबसे कठिन प्रोफेशनल क्वालिफाइंग परीक्षाओं में से एक माना जाता है. 28 जून को हुई एफएमजीई की परीक्षा में 37,448 उम्मीदवार बैठे जिनमें से सिर्फ 13.5 फीसद ही पास हो पाए. जून 2023 के बाद से सबसे ज्यादा पास प्रतिशत 29.62 रहा है तो सबसे कम 10.20 फीसद.
धोखाधड़ी का पूरा जाल
मुश्किल परीक्षा की बात समझ आती है. लेकिन पास होने की कम दर ने बिचौलियों के लिए मुनाफे का बाजार बना दिया. आरोप है कि ये बिचौलिए नकली सर्टिफिकेट बनवाने और रजिस्ट्रेशन कराने के लिए 20-30 लाख रुपए लेते हैं. सवाल यह है कि ये नकली कागजात स्टेट मेडिकल काउंसिल (एसएमसी) की आधिकारिक जांच में बार-बार कैसे क्लियर हो जाते हैं? एसओजी ने साफ तौर पर इशारा किया है: मिलीभगत.
राजस्थान ही अकेला ऐसा राज्य नहीं जो इस समस्या से जूझ रहा है. दिसंबर 2022 से सीबीआइ ने 2011-2022 के बीच कम काबिलियत वाले विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट को इजाजत देने वाले पूरे सिस्टम की जांच की थी. जांच 14 राज्यों में की गई और इसका मकसद राष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे की अहम कमजोरियों को पकड़ना था.
फिर भी इस बारे में लोगों को बहुत कम पता है कि इसके बाद सिस्टम में कोई सुधार हुआ या नहीं. क्या सर्टिफिकेट की पुष्टि के लिए कोई डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम बनाया गया? खामियां अब नहीं रहीं, यह पक्का करने के लिए कोई जांच की गई?
बार-बार समस्या सामने आती है जिससे लगता है कि इसका इलाज एक ऐसी बीमारी में बदल गया है जो आम हो गई है और लगातार बनी हुई है: ढिलाई, या उससे भी बदतर. बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ ने मार्च में 3,000 रजिस्ट्रेशनों के सत्यापन के लिए अंदरूनी जांच शुरू की. प्रवेश परीक्षाओं में धांधलियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा जायज है. जालसाजी वाले डॉक्टरों के खिलाफ भी ऐसा ही गुस्सा होना चाहिए.

