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बंद कारखानों की जमीनों से निकलेगा उद्योगीकरण का रास्ता!

भाजपा की शुभेंदु सरकार बंद कारखानों में फंसी शहरी औद्योगिक जमीनों को हासिल और निवेश आकर्षित करके बंगाल को फिर से बनाना चाह रही एक औद्योगिक राज्य

बंगाल के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्त 22 जून को बजट पेश करते हुए
अपडेटेड 14 जुलाई , 2026

बंगाल की औद्योगिक तकदीर संवारने की तमन्ना पुरानी है. फिर भी तमाम इनवेस्टर्स समिट में चमकाए गए 'बंगाल का मतलब बिजनेस' सरीखे नारे किसी मजबूत जमीन पर टिक नहीं सके थे. दशकों पुरानी अनदेखी को दुरुस्त करने के पक्के इरादे से पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार अब राज्य की सबसे अहम जमीन नीतियों में से एक के तहत व्यापक उलटफेर की तैयारी कर रही है. वह बेकार पड़ी औद्योगिक भूमि को नियमों की बेड़ियों से मुक्त करके खुद को निवेश समर्थक प्रशासन के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है.

अपना पहला बजट 22 जून को पेश करने वाले वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्त ने इंडिया टुडे को बताया कि सरकार तालाबंद कारखानों के कब्जे में पड़ी जमीनों को कानूनी पचड़ों या फायदेमंद गैर-व्यावसायिक रीयल एस्टेट में बदलने देने के बजाए उन्हें छुड़ाने और नए निवेश के लिए खोलने की नीति का मसौदा तैयार कर रही है. वे कहते हैं, ''पूरे बंगाल में दर्जनों प्लॉट बेकार पड़े हैं.

दमदम की जेसप फैक्ट्री या उत्तरपाड़ा में हिंद मोटर्स के परिसर को ही लें. हम इन जगहों की सूची तैयार कर रहे हैं. कानूनी या शासकीय कार्रवाई के जरिए उन्हें निवेशकों को उपलब्ध करवाया जाएगा.'' दासगुप्त ने ऐसी भूमि का औद्योगिक चरित्र बनाए रखने पर जोर दिया: ''अगर इस नीति के तहत भूमि को वापस हासिल किया जाता है, तो उनके साथ यह कानूनी बाध्यता जुड़ी होगी कि उनका इस्तेमाल केवल औद्योगिक उद्देश्यों के लिए ही किया जाए. इसका मकसद नौकरियों का सृजन करना और मैन्युफैक्चरिंग तथा आर्थिक गतिविधियां बढ़ाना है.''

वर्ष 2011 से 2025 के बीच पश्चिम बंगाल का राज्य सकल घरेलू उत्पाद (एसजीडीपी) औसतन 11 लाख करोड़ रु. सालाना के आसपास था. इसमें औसतन तीन लाख करोड़ रु. सालाना के साथ उद्योग का हिस्सा 27-28 फीसदी था. शीर्ष औद्योगिक राज्यों की सालाना औद्योगिक वैल्यू 10 लाख करोड़ रु. से ऊपर है. भाजपा सरकार ने हालांकि गिनती में कोई लक्ष्य तय किया है पर इसने इस तरह के भूमि सुधारों के जरिए मैन्युफैक्चरिंग में जान डालने, इन्फ्रास्ट्रक्चर में विस्तार और निवेश प्रोत्साहनों का वादा किया है.

अपने कार्यकाल के दौरान तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिकीकरण में निवेश के सबसे बड़े पैमाने कैपिटल एक्सपेंडिचर पर सालाना 18,500 करोड़ रुपए खर्चे. हालांकि असल खर्च अमूमन इससे कम ही हुआ. अब इस बजट में 39,338 करोड़ रु. के रिकॉर्ड कैपिटल आउटले का प्रस्ताव है. यह नए हवाईअड्डों, ददनपत्रबार में एक डीप-सी पोर्ट, दुर्गापुर में एक सेमीकंडक्टर ईकोसिस्टम और बड़ी सड़क तथा पुल परियोजनाओं के लिए है.

बड़ा उलटफेर
यह प्रस्ताव तृणमूल कांग्रेस के उस रवैए से बिल्कुल अलग है जिसमें उसने सिंगूर और नंदीग्राम के राजनैतिक नतीजों के बाद औद्योगिक जमीनों को लेकर चौकन्ना रुख अपना लिया था. दोनों जगहों पर अनिवार्य अधिग्रहण के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद बंगाल में जमीन की राजनीति का कायापलट हो गया था. भाजपा सरकार मानती है कि अपने हाल पर छोड़ दी गई औद्योगिक जगहों का फिर इस्तेमाल करना राजनैतिक रूप से कम विवादास्पद और आर्थिक रूप से औद्योगिकीकरण का कहीं ज्यादा तेज रास्ता है. इसके अलावा वह प्राइवेट प्रोजेक्ट्स के लिए केस-दर-केस आधार पर वह जमीनों का अधिग्रहण भी करवा सकती है.

भूमि सुधारों में शहरी भूमि (सीमा और विनियमन) अधिनियम 1976 को खत्म करना भी शामिल होगा. यह कानून बड़े शहरों में खाली पड़ी शहरी भूमि के मालिकाना हक पर सीमित करता है. राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून औद्योगिकीकरण की राह में रुकावट है, जबकि वामपंथी और तृणमूल सरकारों ने इसे बनाए रखा. ज्यादातर राज्य सरकारों ने 1999 में संसद के भीतर शहरी भूमि (सीमा और विनियमन) निरसन अधिनियम बनाए जाने के बाद इसे खत्म कर दिया, लेकिन बंगाल में इसे बनाए रखा.

लक्ष्यबद्ध नीति
दासगुप्ता का कहना है कि जमीन को लेकर यह पहल ज्यादा व्यापक नीतिगत बदलावों का हिस्सा है. वे कहते हैं, ''हमने करीब दस क्षेत्रों की पहचान की है जहां समर्पित नीतिगत रूपरेखा तैयार की जा रही है.'' इनमें से औद्योगिक नीति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नीति और स्टार्ट-अप नीति सरीखी कुछ रूपरेखाओं का वे जिक्र करते हैं.

दासगुप्ता कहते हैं, ''राज्य को बड़े निवेश के लिए पूरी तरह तैयार होने में साल दो साल लगेंगे. हम निवेशकों से बातचीत करते हुए उस क्षमता का निर्माण कर रहे हैं. हमारी कोशिश यह पक्का करने की है कि जब निवेश के फैसले लिए जाएं तो पश्चिम बंगाल नीतिगत अनिश्चितता, नाकाफी बुनियादी ढांचे और जमीन की अड़चनों के कारण अब और पीछे न रहे.'' बंगाल की औद्योगिक मरुभूमि जादुई स्पर्श का इंतजार कर रही है. 

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