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बोतल छुड़ाने में अब भी छूटता पसीना

बिहार में शराबबंदी का एक दशक पूरा लेकिन राज्य में पुरुषों की पीने की लत कायम. ताजा एनएफएचएस-6 सर्वेक्षण में ऐसे कई पहलुओं का खुलासा. इस नीति के नफे-नुक्सान पर बहस तेज हो गई है

Special Report: Bihar/sharababandi
अवैध कारोबार  पटना में 13 जून को बरामद शराब 
अपडेटेड 1 जुलाई , 2026

अभी इसी 15 जून को बिहार में शराबबंदी पर अमल करने वाला तंत्र हर जगह सक्रिय दिखा. भोजपुर में आबकारी अधिकारियों ने दो कारों से 112.32 लीटर विदेशी शराब जब्त की और तीन आरोपियों को पकड़ा. वहीं गया में 197 लीटर शराब ले जा रही एक चौपहिया गाड़ी और दो मोटरसाइकिलों को रोका और छह लोगों को हिरासत में लिया गया.

गोपालगंज में भी उसी दिन कई जगह जब्ती हुई. एक कार से 305.25 लीटर और दूसरी से 301.125 लीटर शराब मिली, जबकि एक अलग ऑपरेशन में एक और गाड़ी से 171 लीटर शराब बरामद की गई और एक व्यक्ति को पकड़ा गया. सारण में भी एक टेंपो से 137.28 लीटर विदेशी शराब बरामद हुई और एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया.

भोजपुर में एक और टीम ने दो कारों से 112.32 लीटर शराब पकड़ी. पटना में एक चौपहिया गाड़ी से 171 लीटर विदेशी शराब मिली. दिन के अंत तक हालात सामने थे. जिस राज्य ने शराब की सप्लाइ रोकने में एक दशक बिता दिए हों, वह अब भी सड़कों, गांवों और सीमावर्ती रास्तों पर इधर-उधर शराब की धड़पकड़ में लगा हुआ है. कानून की नजर में बिहार भले ही शराब-मुक्त हो मगर असल में वहां शराब अब भी मौजूद है.

बिहार में शराबबंदी के दस साल पूरे हो गए, मगर सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि शराब का धंधा खत्म होने के बदले ज्यादा चालाकी भरे, नए-नए तरीके से और अमूमन ज्यादा खतरनाक अंडरग्राउंड धंधे में बदल गया है. राज्य सरकार अपने ठीक-ठाक धरपकड़ रिकॉर्ड का जिक्र कर सकती है.

वह छापेमारी, गिरफ्तारी, जब्ती और मजबूत बॉर्डर पोस्ट का हवाला दे सकती है. मगर वह भरोसेमंद तरीके से यह नहीं कह सकती कि रोजमर्रा की जिंदगी से शराब गायब हो चुकी है. दरअसल, उसका बाजार बना हुआ है और मांग भी. दूसरी ओर, राज्य का यह भरोसा भी बना हुआ है कि शायद अगली छापेमारी से आखिरकार हालात बदल जाएं.

शराब जब्त करने का सिलसिला बिहार के हर कोने में लगातार जारी है. पुलिस सख्ती दिखा रही, तो तस्कर भी कम नहीं. वे हर कार्रवाई का जवाब नई चालाकी से देते हैं. पिछले कुछेक सालों में आबकारी अधिकारियों और पुलिस ने मुर्दाघर की गाड़ियों, दूध के टैंकरों, एम्बुलेंस, डाक विभाग की गाड़ियों, सब्जी ढोने वाले ट्रकों, स्कूटरों और साइकिलों तक से शराब बरामद की है.

पुलिस की गिरफ्त में आरोपी शराब तस्कर

बोतलें नकली सतह के नीचे, बनावटी पैनल के पीछे, फ्यूल टैंक में और खासतौर पर बनाए गए चेसिस के हिस्सों में छिपाई जाती रही हैं. हर बार जब शराब पकड़ी जाती है, तो छिपाने का कोई नया तरीका सामने आता है. असल में मुनाफे का लालच ही ऐसा है.

शराबबंदी की कहानी अप्रैल 2016 में शुरू हुई. बिहार सरकार ने नैतिक फैसले लिए और प्रशासनिक सुधार के भरोसे शराब पर पूरी तरह रोक लगा दी. इस प्रतिबंध को कई समस्याओं के साझा समाधान के तौर पर पेश किया गया था. यानी घरेलू हिंसा, घर-परिवार की परेशानियां, सार्वजनिक अव्यवस्था, कमाई का नुक्सान और राज्य के कुछ हिस्सों में शराब की वजह से लंबे समय से सामाजिक ताने-बाने का टूटना वगैरह.

इस कानून ने सरकार को दमदार दावा करने का मौका दिया कि बिहार में अब शराब की बिक्री और सेवन नहीं चलेगा. इस कानून को लागू हुए दस साल हो गए हैं, मगर नतीजे उसके पैरोकारों की सोच से कहीं ज्यादा पेचीदा हो गए हैं.

ताजा आधिकारिक आंकड़े चिंताजनक हैं. हाल में आए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-6 के अनुमान के मुताबिक, बिहार में 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के 16.5 फीसद पुरुष अब भी शराब पीते हैं, जबकि एनएफएचएस-5 में यह आंकड़ा 15.4 फीसद था.

गांवों में यह आंकड़ा ज्यादा (17.1 फीसद) है और शहरों में कुछ कम (12.8 फीसद). महिलाओं के बीच यह आंकड़ा 0.4 फीसद है. ये आंकड़े उस लत के हैं जिसने प्रतिबंध के हिसाब से खुद को ढाल लिया, तरीके बदल लिए और खत्म होने के बजाए इसका कार्य-व्यापार छिपकर होने लगा है.

शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में उसके लिए निगरानी और जब्ती की समानांतर व्यवस्था तैयार की गई है. राज्य में 10 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं, 16 लाख से ज्यादा लोगों को पकड़ा गया है, लगभग 4.5 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई है और करीब 1.6 लाख गाड़ियां जब्त की गई हैं.

आबकारी जिलों का विस्तार किया गया है, सीमा पर पुलिस तैनाती तेज की गई है और राज्य की सीमाओं को स्थायी एनफोर्समेंट जोन में बदल दिया गया है. ड्रोन, नाव, स्कैनर, ब्रेथ एनालाइजर और चेक-पोस्ट अब यहां आम औजार बन गए हैं. यह अब सिर्फ एक कानून का मामला नहीं रह गया, बल्कि एक पूरी प्रशासनिक व्यवस्था तैयार हो गई है.

शराब की हर जब्ती एक तरह की जीत है, मगर यह सबूत भी कि सप्लाइ चेन अभी भी जिंदा है. हर गिरफ्तारी संकेत है कि कारोबार दबाव में है, मगर यह भी कि बिहार के हाइवे, नदी के रास्तों और गांव की गलियों से शराब ले जाने का जोखिम उठाना फिर भी फायदेमंद है. वे इस बात का सबूत हैं कि शराबबंदी की जंग अभी भी जिले-दर-जिले, गाड़ी-दर-गाड़ी, लीटर-दर-लीटर लड़ी जा रही है.

वैसे, इस प्रतिबंध के सामाजिक तर्क को अनदेखा करना मुश्किल है. बिहार में शराबबंदी का सियासी महत्व है, खासकर महिला वोटरों और सुधारवादी सोच वाले परिवारों के बीच, जो शराब को घरेलू उपेक्षा, हिंसा और कर्ज से जोड़कर देखते हैं.

कई पैरोकारों के लिए शराबबंदी पर राज्य का पीछे न हटना जिद नहीं, बल्कि गंभीरता का सबूत है. यह ऐसी सरकार का आईना है जो सार्वजनिक अनुशासन के लिए निजी आदतों में दखल देने को तैयार है. वह नैतिक तर्क अभी भी मायने रखता है. यही कारण है कि यह नीति तब भी बनी हुई है जब इसे लागू करना भगीरथ कार्य बन गया है.

भौगोलिक चुनौतियां भी हैं. बिहार के कई जिलों की सीमाएं उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल से लगती हैं. इन सभी राज्यों में शराब की खुली बिक्री है और आसानी से मिलती है. फिर उत्तर में नेपाल के साथ 800 किलोमीटर लंबी सीमा हजारों गांवों से होकर गुजरती है. वहां लोग रोज व्यापार, पूजा-पाठ और—अगर चाहें तो—शराब पीने के लिए सीमा पार करते हैं. सीमा पूरी तरह से सील करना नामुमकिन है.

मगर नैतिक प्रतीकात्मकता आर्थिक हकीकत को नहीं बदल सकती. शराबबंदी से पहले शराब बिक्री से बिहार के खजाने में काफी आबकारी राजस्व आता था. प्रतिबंध के बाद राजस्व में तेज गिरावट हुई. राज्य में प्रतीकात्मक समाज सुधार तो हुआ लेकिन एक बड़ा आर्थिक स्रोत हाथ से निकल गया.

साथ ही, उसे एक महंगा एनफोर्समेंट सिस्टम भी मिला, जिसे हर साल बनाए रखना पड़ता है. असल में बिहार ने एक साफ-सुथरे कर आधार को छोड़कर पुलिसिया तंत्र का बोझ उठा लिया. यह बोझ निचली अदालतों, जमानत की सुनवाई, जेलों में कैदियों की संख्या और न्याय व्यवस्था के रोजमर्रा के कामकाज पर भी पड़ता है.

मामले को और जटिल बनाता है नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का बदलता स्वरूप. दरअसल, बिहार में कोडीन-बेस्ड कफ सिरप, गांजा, अफीम और दूसरे नशीले पदार्थों को लेकर चिंता बढ़ गई है. राज्य का एनफोर्समेंट फोकस भले ही शराब से शुरू हुआ हो मगर अब यह नशीले पदार्थों के बड़े नेटवर्क तक फैल गया है.

बिहार मॉडल का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है. उसे गलत आदत कम करने के लिए बनाया गया था मगर उसने जोखिम बढ़ा दिया है. अवैध शराब ने संकट बढ़ा दिया है. अवैध शराब को कंट्रोल करना मुश्किल होता है, और पीने पर यह कहीं ज्यादा खतरनाक होती है. जहरीली शराब से होने वाली मौतें इसका सबसे भयानक रूप हैं.

जब शराब का कारोबार छिपकर होने लगता है, तो उसमें मिलावट आसान हो जाती है, क्वालिटी कंट्रोल खत्म हो जाता है और सिस्टम की इस पहल की पूरी कीमत पीने वाले को चुकानी पड़ती है. अप्रैल में पूर्वी चंपारण में जहरीली शराब से हुई मौतें कोई अपवाद नहीं थीं. वे इस बात की याद दिलाती हैं कि शराबबंदी से शराब से होने वाले सामाजिक नुक्सान खत्म नहीं होते, बल्कि यह उसके सबसे खतरनाक रूप को और बढ़ा सकती है.

दस साल बाद बिहार में शराबबंदी की कहानी न तो पूरी तरह उसके पक्ष में है और न ही पूरी तरह उसके खिलाफ. यह राजनैतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक उम्मीदों, प्रशासन की हद से ज्यादा सख्ती और कारोबार की मजबूती का मिला-जुला किस्सा है. एक तरफ सरकार है जो अपने नैतिक संकल्प का दावा करती है. दूसरी तरफ अवैध कारोबार जिसने खुद को बदला, टिके रहने का रास्ता निकाला और अपने काम के तरीके बदले. इस तरह से वह बंद नहीं हुआ.

खास यह है कि बिहार में शराबबंदी को लेकर सबसे तीखी आलोचना खुद सरकार के भीतर से निकली है. मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन मंत्री मदन सहनी ने उसके अमल में खामियों पर सरेआम नाराजगी जताई. उनका कहना है कि शराबबंदी की नाकामी के लिए केवल तस्करों की चालाकी या बिहार की खुली सीमाएं जिम्मेदार नहीं.

मंत्री के मुताबिक, पुलिस के कुछ हलकों में ढिलाई और कई मामलों में कथित मिलीभगत से इस नीति का असर कमजोर हुआ है. सहनी ने थोड़े कर्मचारियों के बावजूद शराबबंदी के अमल में आबकारी अधिकारियों की तारीफ की, मगर यह भी कहा कि बिहार पुलिस हमेशा तत्परता से काम नहीं कर पाई है, जिस पर शराबबंदी से जुड़े छापों की बड़ी जिम्मेदारी है.

हाल में मंत्री ने यह कहकर भारी विवाद भी खड़ा कर दिया कि उन्होंने शराबबंदी पर अमल की संयुक्त समीक्षा के लिए पुलिस महानिदेशक से संपर्क करने की तीन बार कोशिश की, मगर उनके कॉल का न तो जवाब दिया गया और न ही वापस कॉल किया गया. इस घटना से तालमेल और इरादों को लेकर असहज हकीकत उजागर होती है.

वैसे, मदन सहनी ने 16 जून को कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नैतिक सोच के आधार पर सामाजिक सुधार के लिए शराब पर रोक लगाई थी. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''हम लगातार इस कानून के अमल की समीक्षा कर रहे हैं और जहां भी कमियां दिख रही, उन्हें दूर कर रहे हैं.

मैंने साफ निर्देश दिए हैं कि न सिर्फ बिहार में पकड़े गए लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए जाएं, बल्कि बिहार में शराब पहुंचाने की कोशिश करने वाले राज्य के बाहर के शराब व्यापारियोंं और सप्लायरों के खिलाफ भी कार्रवाई हो. हमारा फोकस इसे और सख्त तथा असरदार बनाने पर है.’’

जाहिर है, कानून की नजर में बिहार में शराबबंदी है मगर सीमाएं खुली हैं. तस्करी के तरीके भी हालात के हिसाब से बदलते रहते हैं. दस साल बाद बिहार में शराबबंदी की यही कहानी है. यह रोजाना की ऐसी जंग है जिसमें कोई निर्णायक जीत नहीं मिली है. यह प्रतिबंध इतना लंबा खिंच गया है कि वह उसी समस्या का हिस्सा बन गया है जिसे हल करने के लिए उसे लागू किया गया था.

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