लोकसभा के बजट सत्र के बीच अचानक लखनऊ लौटना और सीधे पार्टी मुख्यालय पहुंचकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाना, समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव का यह कदम महज एक तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं था. यह संकेत था कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगली बड़ी लड़ाई की शुरुआत हो चुकी है, और उसका मैदान मतदाता सूची है.
3 फरवरी को विक्रमादित्य मार्ग स्थित सपा मुख्यालय में मीडिया के सामने अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के जरिए चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मिलकर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) समुदाय के वोटरों को सूची से बाहर करने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्होंने फॉर्म 7 को इस कथित साजिश का औजार बताया, जिसका इस्तेमाल मौजूदा मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा रहा है. फॉर्म 7 मतदाताओं की ओर से मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल होने पर आपत्ति जताने या पहले से सूचीबद्ध नाम को हटाने का अनुरोध करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला आधिकारिक आवेदन पत्र है.
यह दावा करते हुए कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपने राज्य में ऐसी ही स्थिति का सामना कर रही हैं, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा, ''कुछ लोग कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात एक आइएएस अधिकारी कमिश्नरों और जिला मजिस्ट्रेटों पर पीडीए मतदाताओं के नाम लिस्ट से हटाने के लिए दबाव डाल रहा है.'' उन्होंने कहा कि वे बाद में उस अधिकारी का नाम बताएंगे.
सपा प्रमुख ने दावा किया कि भाजपा उन विधानसभा क्षेत्रों में ऐसा कर रही है जहां वह 2022 के विधानसभा चुनाव में हार गई थी. उन्होंने आरोप लगाया कि उनके लोकसभा क्षेत्र कन्नौज में सिर्फ एक पोलिंग स्टेशन से मुस्लिम समुदाय के लगभग 1,200 वोट हटा दिए गए. उन्होंने मांग की कि एसआइआर के दौरान अब तक भरे गए सभी फॉर्म 7 को रद्द किया जाए और पहले से जमा किए गए फॉर्म पर हस्ताक्षरों की न्यायिक जांच शुरू की जाए. यह बयान एक राजनैतिक चेतावनी और संगठन के लिए एक आदेश था. उन्होंने इसे 'करो या मरो' की स्थिति बताते हुए स्पष्ट किया कि यह लड़ाई बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अदालत तक जाएगी.
अखिलेश के आरोपों के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) नवदीप रिणवा सामने आए. उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में कुछ मामलों में यह पाया गया कि फॉर्म 7 पर जिन लोगों के हस्ताक्षर थे, फॉर्म असल में उन्होंने स्वयं जमा नहीं किए थे. इसी वजह से सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स को निर्देश दिए गए हैं कि वे हर फॉर्म 7 की जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि उसे सही व्यक्ति ने भरा है.
चुनाव आयोग का आधिकारिक रुख यही रहा है कि एसआइआर एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना और योग्य नागरिकों को जोड़ना है. आयोग बार-बार यह दोहराता रहा है कि किसी समुदाय, वर्ग या राजनैतिक दल को निशाना बनाने का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां हर प्रशासनिक प्रक्रिया का राजनैतिक अर्थ निकाला जाता है, आयोग की यह सफाई सपा को संतुष्ट नहीं कर पाई.
एसआइआर को लेकर सपा और चुनाव आयोग के बीच यह टकराव अचानक नहीं हुआ. इसकी पृष्ठभूमि जनवरी की शुरुआत में ही तैयार हो चुकी थी. 6 जनवरी को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 2.89 करोड़ नाम कटने के बाद सपा ने आयोग की मंशा पर सवाल उठाए. पार्टी का आरोप था कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटना सामान्य प्रक्रिया नहीं हो सकती. 7 जनवरी को सपा मीडिया सेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर मुख्यमंत्री के एक बयान का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि उस बयान के बाद चुनाव आयोग ने सक्रिय होकर लगभग एक करोड़ नाम जोड़ दिए.
सपा ने सवाल किया कि अगर प्रक्रिया निष्पक्ष थी, तो इतनी बड़ी संख्या में नाम जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी. इसके जवाब में मुख्य चुनाव अधिकारी कार्यालय ने न सिर्फ आंकड़े जारी किए, बल्कि सपा के आरोपों पर तंज भी कसा. आयोग ने इसप फेबल्स की 'द बॉय हू क्राइड वुल्फ' (भेड़िया आया, भेड़िया आया) कहानी का हवाला देते हुए कहा कि बार-बार झूठे आरोप लगाने से भरोसा खत्म हो जाता है.
आयोग का कहना था कि न तो पहले बेईमानी हो रही थी और न ही अब हो रही है. यहीं से यह मुद्दा प्रशासनिक बहस से निकलकर खुली राजनैतिक जंग में बदल गया. 12 जनवरी को विवाद ने एक और मोड़ लिया, जब वोटर आइडी कार्ड को मोबाइल नंबर से जोड़ने में लगने वाले समय को लेकर चुनाव आयोग और सपा के बीच सोशल मीडिया पर तीखी जुबानी जंग हुई. आयोग ने दावा किया कि यह प्रक्रिया सिर्फ 5-10 मिनट में पूरी हो जाती है. इसके जवाब में सपा मीडिया सेल ने कटाक्ष करते हुए लिखा कि 'झूठ बोलने पर कौआ भी काट लेता है.' आयोग ने पलटवार करते हुए मोबाइल नंबर जोड़ने के फायदे गिनाए और लिखा, ''पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें.'' यह बहस बताती है कि दोनों पक्ष अब हर छोटे मुद्दे पर भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतकर भाजपा को दूसरे स्थान पर ढकेलना सपा के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त थी. पार्टी नेतृत्व मानता है कि यह जीत सिर्फ गठबंधन या परिस्थितियों की वजह से नहीं थी, बल्कि पीडीए वोटों की मजबूत एकजुटता का नतीजा थी. यही वजह है कि सपा एसआइआर को सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि अपने कोर वोट बैंक के अस्तित्व से जुड़ा सवाल मान रही है. पार्टी का आकलन है कि अगर मतदाता सूची में गड़बड़ी को समय रहते नहीं रोका गया, तो 2027 की विधानसभा चुनावी रणनीति कमजोर पड़ सकती है.
एसआइआर को लेकर सपा की सबसे बड़ी रणनीतिक पहल 'पीडीए प्रहरी' का गठन है. बूथ स्तर पर तैनात यह नेटवर्क हर संशोधित वोटर लिस्ट की जांच कर रहा है. कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए हैं कि अगर किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो आधार या पहचान पत्र की प्रति के साथ उसे दोबारा जुड़वाने की कोशिश करें. पार्टी ने जिला और तहसील स्तर पर निगरानी समितियां बनाई हैं, जो रोजाना रिपोर्ट इकट्ठा कर प्रदेश नेतृत्व तक भेज रही हैं. शिकायतें पहले जिला अध्यक्ष के पास जाती हैं, फिर राज्य अध्यक्ष श्याम लाल पाल के जरिए चुनाव आयोग को भेजी जाती हैं. सपा प्रमुख ने 12 जनवरी को कार्यकर्ताओं को साफ निर्देश दिए थे कि एसआइआर के दूसरे चरण पर कड़ी नजर रखें और किसी भी साजिश के तहत पीडीए समुदाय के नाम न छूटने दें. उन्होंने पहली बार वोट देने वालों की पहचान कर उन्हें फॉर्म 6 भरने में मदद करने पर भी जोर दिया.
एसआइआर ने सपा संगठन के भीतर भी जवाबदेही तय कर दी है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जो जिला अध्यक्ष या पदाधिकारी इस प्रक्रिया में 'एक्टिव' नहीं पाए गए, उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी है. होली के बाद संगठनात्मक बदलाव के संकेत दिए जा चुके हैं. एक वरिष्ठ सपा नेता के मुताबिक, ''यह सिर्फ चुनाव आयोग से लड़ाई नहीं है. यह हमारी अपनी परीक्षा भी है. अगर कोई वोट बचाने में लापरवाही करता है, तो उसके लिए पार्टी में जगह नहीं है.''
सपा ही नहीं, यूपी भाजपा भी एसआइआर पर जमकर पसीना बहा रही है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, भाजपा ने राज्य में सबसे ज्यादा 1.60 लाख बूथ लेवल एजेंट तैनात किए हैं. इसके बाद सपा के 1.56 लाख और बसपा के 1.53 लाख बीएलए हैं. कांग्रेस ने लगभग 95 हजार बूथों पर एजेंट तैनात किए हैं. भाजपा एसआइआर को एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताती है और विपक्ष के आरोपों को राजनीति से प्रेरित करार देती है. लेकिन सपा इसे 'छिपा हुआ एनआरसी' बताकर अपने समर्थकों को सतर्क रहने का संदेश दे रही है. राष्ट्रीय लोकदल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल हो के बाद सपा की रणनीति पूरी तरह कांग्रेस और अपने पीडीए आधार पर केंद्रित है. पार्टी ने उन 108 विधानसभा सीटों की पहचान की है, जिन्हें वह पिछले तीन चुनावों में हारती रही है. इन सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा जल्दी करने और स्थानीय संगठन को मजबूत करने की योजना है.
राजनैतिक विश्लेषक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विनम्र वीर सिंह कहते हैं, ''एसआइआर के मुद्दे ने सपा को एक ऐसा राजनैतिक नैरेटिव दिया है, जिसमें प्रशासनिक प्रक्रिया, लोकतंत्र का सवाल और संगठन की मजबूती तीनों जुड़ जाते हैं. अखिलेश यादव इसे सिर्फ भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम के खिलाफ लड़ाई बता रहे हैं, जो उनके मुताबिक सत्ता के पक्ष में काम कर रहा है.'' सपा नेताओं के मुताबिक, यह लड़ाई अदालत तक जाएगी. लेकिन उससे पहले यह सड़क, सोशल मीडिया और बूथ स्तर तक लड़ी जा रही है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव की असली लड़ाई मतदान से पहले मतदाता सूची पर जीतने से शुरू होती है. सपा ने इस बार उस लड़ाई को समय से पहले और पूरी ताकत से शुरू कर दिया है. अब सवाल यही है कि क्या यह रणनीति 2027 में सत्ता की राह आसान बनाएगी, या फिर यह टकराव भाजपा को प्रशासनिक स्थिरता और व्यवस्था का नैरेटिव गढ़ने का मौका देगा. हालांकि एक बात साफ है, उत्तर प्रदेश में अगला चुनाव अब सिर्फ विकास या जातीय समीकरणों पर नहीं, बल्कि इस सवाल पर भी लड़ा जाएगा कि वोटर लिस्ट किसके हाथ में सुरक्षित है. दव चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं. चुनाव में जनता इसका जवाब देगी.

