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‘सिनेमा अखबार की बासी खबर नहीं’

मलयालम सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार अदूर गोपालकृष्णन सिनेमाघरों की अहमियत, अदूर मैजिक और खुद को लेजेंड कहे जाने पर

Q+A
अदूर गोपालकृष्णन (फोटो- बंदीप सिंह)
अपडेटेड 19 अक्टूबर , 2026

● आपका कहना है कि आप सिनेमा हॉल के लिए फिल्में बनाते हैं, ओटीटी के लिए के लिए नहीं. ऐसा क्यों?

कोविड के दौरान जब लोग सिनेमाघरों से दूर हुए तो ओटीटी का चलन बढ़ा. मुझे तो लगने लगा कि जैसे फिल्म बनाना ही बेकार है. मेरा मानना रहा है कि फिल्म अच्छे ऑडिटोरियम में, अंधेरे में और बेहतर साउंड के साथ देखी जानी चाहिए. फिल्म बस यूं ही देखी जाने वाली चीज नहीं. उसे देखने का पूरा एक अनुभव होना चाहिए. इसीलिए मेरी फिल्में सिनेमाघर के लिए बनती हैं.

● आपकी नजर में एक फिल्म निर्देशक का दायित्व क्या है?

दर्शक जब कई फिल्मों में से आपकी फिल्म चुनकर उसे देखने आता है, तो आपकी जिम्मेदारी है कि आप उसे कुछ सार्थक दें. वह अपने जीवन के दो घंटे दे रहा है. तस्वीरें, आवाज आदि सब चीजें मिलकर दर्शक पर प्रभाव डालती हैं इसलिए मैं फिल्म को सिर्फ एक कहानी या मनोरंजन की चीज नहीं मानता. मेरी इच्छा रहती है कि फिल्म देखने के बाद दर्शक अधिक समझदार बनें. उनमें आलोचनात्मक दृष्टि विकसित हो. वे दुनिया को एक अलग नजरिए से समझना शुरू करें.

● आपकी फिल्मों में दर्शकों को एक ‘अदूर मैजिक’ मिलता है. आपको क्या लगता है, इसकी क्या वजह है?

यह मूल रूप से एक भावनात्मक जुड़ाव है. मैं फिल्म में जीवन को जीवंत करने की कोशिश करता हूं. उन्हें अखबार की खबर की तरह नहीं बरतता. अखबार की खबर आज के लिए है. अगले दिन वह पुरानी हो जाती है जबकि मैं चाहता हूं कि मेरी फिल्में समय बीतने के बाद भी प्रासंगिक बनी रहें.

● इतने लंबे फिल्मी सफर के बाद क्या आप खुद को ‘लेजेंड’ मानते हैं और क्या आपने कभी अपनी फिल्मों से समझौता किया?

न खुद को लेजेंड मानता हूं, न समझौता किया. हां, मेरे लिए फिल्म की पहली और वास्तविक जगह सिनेमाघर ही है, इसे आप समझौता कह सकते हैं. सिनेमाघरों में दिखा दिए जाने के बाद फिल्म ओटीटी पर दिखाए जाने पर मुझे कोई ऐतराज नहीं.

—अक्षिता नंदगोपाल

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