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"कानून न्याय तक पहुंचने का रास्ता है, स्वयं न्याय नहीं है"

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की हाल में प्रकाशित पुस्तक करुणा, 'द पावर ऑफ कम्पैशन' युद्धरत दुनिया में करुणा को हर समस्या का समाधान बताती है.

कैलाश सत्यार्थी
कैलाश सत्यार्थी
अपडेटेड 16 मार्च , 2026

करुणा पर आधारित किताब लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं. आज दौलत, ज्ञान, तकनीक, कानून और सरकारों की शक्ति पहले से कहीं ज्यादा है लेकिन इसके बावजूद समस्याएं कम नहीं हुईं. कई बार समाधान से ही नई समस्याएं पैदा हो रही हैं. आज नैतिक जिम्मेदारी की कमी है. इसीलिए करुणा को पुनर्परिभाषित करने और उसे समाधान की शक्ति के रूप में स्थापित करने की जरूरत महसूस हुई.

अगर करुणा समस्या-समाधान की शक्ति है, तो नीतियों और व्यवस्था में इसका अभाव क्यों दिखता है?

क्योंकि समाधानकर्ता और समस्याग्रस्त लोगों के बीच दूरी बढ़ गई है. करुणा ही नजदीक लाएगी. करुणा चार प्रक्रियाओं का मेल है: संज्ञान यानी आसपास की पीड़ा और परिस्थिति समझना; दूसरा है जुड़ाव, पीड़ित व्यक्ति से भावनात्मक संबंध स्थापित करना; फिर है, गहन अनुभूति यानी दूसरे की पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह लगे; और चौथा है, ऐक्शन यानी पीड़ा दूर करने के लिए सक्रिय प्रयास.

आपने लिखा, कम्पैशन इज द सोल ऑफ जस्टिस. लेकिन न्याय तो तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए, करुणा के आधार पर कैसे होगा?

तथ्य और कानून न्याय तक पहुंचने के रास्ते हैं, स्वयं न्याय नहीं हैं. करुणा न्याय को मानवीय बनाती है. न्याय की आत्मा निष्पक्षता और पीड़ित-केंद्रित दृष्टि में होती है.

करुणा अगर इतना हावी होगी तो तार्किक दृष्टि और वैज्ञानिक सोच तो पीछे छूट जाएगी!

नहीं, वे एक-दूसरे के पूरक हैं. वैज्ञानिक सोच तथ्य और प्रमाण देती है, लेकिन करुणा उन तथ्यों को नैतिक दिशा देती है. करुणा भावुकता नहीं, विवेकपूर्ण कर्म की प्रेरणा है. बिना करुणा के रैशनलिटी और बिना रैशनलिटी के करुणा प्रभावी नहीं हो सकती.

हम एआइ के दौर में हैं, अकेलापन और अवसाद भी डिजिटल युग में बढ़ा है. ऐसे में करुणा का क्या महत्व?

वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि दूसरों की मदद से मस्तिष्क में ऐसे रसायन बनते हैं, जो हमें वास्तविक खुशी और संतोष देते हैं. इसलिए बनावटी संवाद और डिजिटल आक्रामकता के दौर में करुणा-आधारित वातावरण जरूरी है ताकि हम समाधानकर्ता बन सकें. एआइ के विकास में भी नैतिक जिम्मेदारी को केंद्र में रखना होगा क्योंकि करुणा-विहीन मानसिकता से बनी तकनीक मानवता के लिए खतरा हो सकती है.

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