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डार्क मोड

ई-गेम का खेल खत्म

नए कानून और एजेंसियों के तालमेल के साथ भारत ने ऑनलाइन सट्टेबाजी पर शिकंजा कसा. ओमान में महादेव के प्रमोटर सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी दे सकती है विदेश से चलने वाले सबसे बड़े सट्टा सिंडिकेटों में से एक की परतें खोलने का अब तक का सबसे अहम सुराग

The Big Story online betting 
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/एआइ
अपडेटेड 3 नवंबर , 2026

कभी कुछ साल पहले तक सौरभ चंद्राकर छत्तीसगढ़ के भिलाई में छोटी-सी दुकान से फलों का जूस बेचता था. आज उस पर महादेव ऑनलाइन बुक नाम का अवैध सट्टा साम्राज्य खड़ा करने का आरोप है, जिसका रोजाना कारोबार अधिकतम 240 करोड़ रुपए से ज्यादा बताया गया.

आरोप है कि दुबई में बैठकर 31 वर्षीय चंद्राकर ने ऐसा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बनाया जो लाखों भारतीयों से दांव लगवाता और उसके प्रमोटरों के लिए बेहिसाब दौलत जुटाता था. मगर इस साल जून में उसकी किस्मत ने साथ छोड़ दिया.

भारतीय जांचकर्ताओं के मुताबिक, जाली पासपोर्ट पर अरब मुल्क ओमान में दाखिल होने के आरोप में उसे राजधानी मस्कट में गिरफ्तार किया गया. चंद्राकर की गिरफ्तारी ने देश के सबसे बड़े ऑनलाइन सट्टेबाजी घोटालों में एक की जांच में भारत को अहम सुराग दिया है.

चंद्राकर का गुमनामी से हैरतअंगेज उभार शायद नजर में न आता, अगर उसने नई-नई दौलत का इतना खुला दिखावा न किया होता. फरवरी 2023 में उसने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में अपनी आलीशान शादी पर कथित तौर पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च किए.

रिश्तेदारों और मेहमानों को चार्टर्ड विमानों से बुलाया और बॉलीवुड सितारों से नाच-गाने के कार्यक्रम करवाए. यह फिजूलखर्ची संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की जांच कर रहे अधिकारियों के लिए बड़ा सुराग बनी.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पैसे की कड़ी जोड़ी तो उसके मुताबिक, देश भर में सैकड़ों स्थानीय पैनलों से चलने वाले विशाल सट्टा सिंडिकेट का पता चला. इससे हुई कमाई हजारों बैंक खातों, हवाला ऑपरेटरों और विदेशी संस्थाओं के जरिए ठिकाने लगाई जाती थी.

अदालत में पेश‌ किए गए ईडी के शुरुआती अनुमान के मुताबिक, महादेव और उससे कथित तौर पर जुड़े गोल्ड365, स्काईएक्सचेंज, टाइगर एक्सचेंज तथा लेजर247 जैसे ब्रांडों ने एक दशक में भारतीय ग्राहकों से 94,400 करोड़ रुपए तक का राजस्व जुटाया.

इन प्लेटफॉर्मों पर क्रिकेट मैच के नतीजे और एक ओवर के रन से लेकर फुटबॉल, टेनिस, कबड्डी, पोकर, तीन पत्ती, वर्चुअल स्लॉट मशीन, रूलेट तथा दूसरे कसीनो जैसे खेलों तक लगभग हर चीज पर सट्टा लगता था. जांचकर्ताओं का आरोप है कि चमकदार डिजिटल इंटरफेस के पीछे स्थानीय ऑपरेटरों, विदेशी ‘चेकरों’, फर्जी बैंक खातों और मुखौटा कंपनियों का जाल था. (देखें: महादेव के भीतर)

कैसे फला-फूला घोटाला
इस घोटाले का पैमाना समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि ये प्लेटफॉर्म लोकप्रिय क्यों हुए. ऑनलाइन सट्टेबाजी ने जुए को स्थानीय सटोरियों और गली-मुहल्लों के अड्डों से निकालकर स्मार्टफोन तक पहुंचा दिया. इंटरनेट और डिजिटल भुगतान के व्यापक इस्तेमाल से ग्राहक चंद टैप में खाता खोल सकते थे, दांव लगा सकते थे और जीती हुई रकम ले सकते थे.

इस दुनिया में दो अलग तरह के कारोबार चलते थे. पहला महादेव, पारीमैच और 1एक्सबेट जैसे विदेशी सट्टेबाजों का था, जो खेल प्रतियोगिताओं और जुए के खेलों पर दांव लेते थे. दूसरा भारत का घरेलू रियल-मनी गेमिंग उद्योग था, जिसमें फैंटेसी स्पोर्ट्स, रमी, पोकर और दूसरे खेल शामिल थे.

इनमें नकद इनाम जीतने के लिए प्रवेश शुल्क दिया जाता था या पैसा दांव पर लगाया जाता था. ड्रीम11, गेम्सक्राफ्ट, विनजो, ए23, जूपी, प्रोबो, एमपीएल और स्पोर्ट्सबाजी जैसी कंपनियां इस बढ़ते क्षेत्र का चेहरा थीं. उनका तर्क था—जिसे रमी पर सुप्रीम कोर्ट के 1968 के फैसले से न्यायिक आधार मिला था—कि उनके उत्पाद मुख्य रूप से कौशल के खेल हैं, इसलिए कानूनी तौर पर जुए से अलग हैं.

यह फर्क बेहद अहम था. दशकों से भारतीय जुआ कानूनों और अदालतों के फैसलों ने किस्मत से चलने वाले तथा कौशल की मांग करने वाले खेलों के बीच अंतर माना था. इससे कई घरेलू कंपनियां ऐसे कानूनी माहौल में काम कर सकीं जिसके नियम हर राज्य में अलग थे.

गौर तलब है कि विदेशी सट्टेबाजों ने इसी बिखरी नियामक व्यवस्था का फायदा उठाया और ऐसे देशों से कारोबार चलाया जहां तक भारतीय जांच एजेंसियों की पहुंच काफी हद तक नहीं थी. 2025 की शुरुआत तक विदेशी सट्टेबाजी जिस हद तक पहुंच गया, उसकी वजह से खतरे की घंटी बजने लगी थी.

डिजिटल इंडिया फाउंडेशन के एक अध्ययन के मुताबिक, अक्तूबर-दिसंबर 2024 के तीन महीनों में भारत से केवल चार विदेशी ऑपरेटरों—पारीमैच, स्टेक, 1एक्सबेट और बैटरी बेट—की चुनी हुई वेबसाइटों पर करीब 1.6 अरब बार विजिट किया गया.

कई मोर्चों पर चिंता बढ़ रही थी. पहली, सामाजिक कीमतः जल्दी कमाई के लालच में फंसते युवा और आर्थिक रूप से कमजोर ग्राहक, जो बार-बार जुआ खेलकर बड़ी बचत गंवा देते या कर्ज में डूब जाते थे. दूसरी, सरकारी खजाने का नुक्सानः ऑपरेटर भारतीय ग्राहकों से भारी रकम वसूलकर कथित तौर पर टैक्स से बच रहे थे.

तीसरी, वित्तीय अपराधः पैसे की आवाजाही छिपाने के लिए हजारों बैंक खातों, मुखौटा कंपनियों, हवाला चैनलों और क्रिप्टोकरेंसी का संदिग्ध इस्तेमाल. मार्च 2025 में जीएसटी इंटेलिजेंस महानिदेशालय (डीजीजीआइ) ने बताया कि टैक्स चोरी के संदेह में करीब 700 विदेशी गेमिंग संस्थाओं की जांच की जा रही है. उसने 357 वेबसाइट और यूआरएल ब्लॉक किए तथा करीब 2,400 बैंक खाते फ्रीज किए थे.

नियमन की एंट्री
इस व्यापक समस्या की गंभीरता को देखते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने अगस्त 2025 में संसद से ऑनलाइन गेमिंग प्रोत्साहन और नियमन कानून पारित कराया. इसके तहत ‘ऑनलाइन मनी गेम्स’ पर देशभर में रोक लगा दी गई. इसे लागू करने के जरूरी नियमों के साथ कानून इस साल मई में प्रभावी हुआ.

इस कानून की सबसे अहम बात यह थी कि पाबंदी के मामले में कौशल और संयोग पर आधारित खेलों का पुराना फर्क खत्म कर दिया गया. नए कानून के तहत पैसे का दांव लगाने वाले ऑनलाइन गेम पर रोक लग सकती थी, भले ही जीत ज्ञान, निर्णय क्षमता, अनुभव या किस्मत पर निर्भर हो.

इसका मतलब था कि पाबंदी ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए तक सीमित न रहकर घरेलू रियल-मनी गेमिंग कारोबार पर भी लागू हुई. इसमें विदेश से संचालित प्लेटफॉर्म भी शामिल थे. नए कानून ने ऑनलाइन मनी गेम्स के विज्ञापन और प्रचार पर रोक लगाई तथा बैंकों और भुगतान प्रणालियों को उनसे जुड़े लेनदेन करने से मना कर दिया.

प्रतिबंधित गेम चलाने या उनसे जुड़े वित्तीय लेनदेन में मदद करने वालों को तीन साल तक की जेल, एक करोड़ रुपए तक जुर्माना या दोनों हो सकते थे. इनके विज्ञापन पर दो साल तक की जेल और 50 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान था.

नया कानून केंद्र और राज्यों के मौजूदा कानूनों के साथ लागू होना था, लेकिन टकराव की स्थिति में इसे प्राथमिकता मिलनी थी. यही नहीं, सरकार ने नई व्यवस्था लागू करने, प्रतिबंधित मनी गेम्स और मान्य ऑनलाइन सोशल गेम्स तथा ई-स्पोर्ट्स के बीच फर्क तय करने और गैरकानूनी सेवाओं के खिलाफ कार्रवाई में तालमेल के लिए भारतीय ऑनलाइन गेमिंग प्राधिकरण भी बनाया.

हालांकि, यह ऑनलाइन गेमिंग प्रोत्साहन और नियमन कानून विवादों से घिर गया. भारत की घरेलू गेमिंग कंपनियों का कहना था कि सरकार ने वैध, कौशल-आधारित कारोबार को गैरकानूनी जुआ सिंडिकेट के बराबर खड़ा कर दिया. उद्योग प्रतिनिधियों ने कंपनियों का मूल्य खत्म होने, नौकरियां जाने और कर राजस्व के नुक्सान की चेतावनी दी.

तब से ऐसे सभी प्लेटफॉर्म भारत में रियल-मनी गेमिंग बंद कर चुके हैं, लेकिन कई कंपनियों ने कानून को अदालत में चुनौती दी. मई 2026 में जंगल गेम्स से जुड़े एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार पैसा दांव पर लगने के बाद कौशल और संयोग का फर्क बेमानी हो जाता है.

विदेशी नेटवर्क की चुनौती
अलबत्ता, विदेशी सट्टा सिंडिकेटों के लिए भारत की पाबंदी ने जोखिम तो बढ़ाया, लेकिन कारोबार के मौके पूरी तरह खत्म नहीं किए. इनमें से कई पहले ही विदेश से चल रहे थे. उनकी वेबसाइटें, वित्तीय नियंत्रक और प्रमोटर भारत से बाहर थे, जबकि ग्राहक और वसूली एजेंट देश के भीतर.

इसलिए रोक के बाद भी कुछ ऑपरेटर वैकल्पिक वेबसाइटों, मैसेजिंग ग्रुप और लेनदेन की असली प्रकृति छिपाने वाली भुगतान व्यवस्थाओं के जरिए भारतीय खिलाड़ियों को निशाना बनाते रहे. वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) से यूजर स्थान आधारित कुछ पाबंदियों को चकमा दे सकते थे.

सरोगेट विज्ञापन भारतीय बाजार में पहुंचने का एक और रास्ता पहले ही बना चुके थे. सट्टा संचालकों से जुड़े ब्रांडों को ऐसे नामों से प्रचारित किया गया, जो खेल समाचार, खेल गतिविधियों या दूसरी कथित वैध सेवाओं का आभास देते थे.

मसलन, 1एक्सबेट की ईडी जांच में 1एक्सबैट और 1एक्सबैट स्पोर्टिंग लाइन्स जैसे नामों से किए गए प्रचार की पड़ताल हुई. मशहूर हस्तियों के विज्ञापनों और खेलों से जुड़े प्रचार ने इन ब्रांडों को भारतीय दर्शकों के बीच पहचान दिलाई. चुनौती पूरे तंत्र को ध्वस्त करने की थी.

ईडी ने सट्टेबाजी की कमाई के लेनदेन और उसे विदेशी संपत्तियों तथा भारतीय निवेश में खपाने की पड़ताल शुरू की. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने कथित भ्रष्टाचार और नेटवर्क के घरेलू मददगारों की जांच की, जबकि टैक्स अधिकारियों ने उस भारी कमाई की छानबीन की जिस पर संचालकों ने कथित रूप से टैक्स नहीं चुकाया था.

इस तालमेल की सबसे बड़ी मिसाल पारीमैच की जांच थी. अगस्त 2025 में ईडी ने साइप्रस स्थित इस सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म के सिलसिले में आठ भारतीय शहरों में 17 ठिकानों की तलाशी ली और करीब 110 करोड़ रुपए वाले उन बैंक खातों को फ्रीज किया, जिनका इस्तेमाल रकम जमा करने या छिपाने में होने का संदेह था.

एजेंसी के मुताबिक, पारीमैच ने एक साल में भारतीय यूजरों से 3,000 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाए थे. जांचकर्ताओं का आरोप था कि ग्राहकों की जमा रकम म्यूल खातों—खाताधारकों की जानकारी के बिना खोले गए या पैसा इधर-उधर करने के लिए इस्तेमाल हुए बैंक खातों—में ली गई और भुगतान कंपनियों के जरिए आगे भेजी गई.

1एक्सबेट की एक अन्य जांच में 6,000 से ज्यादा संदिग्ध म्यूल खाते मिले, जिनके लेनदेन से 1,000 करोड़ रुपए से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग के संकेत मिले. मार्च 2026 तक ईडी इस मामले में 37.23 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क कर चुकी थी. इंडिया टुडे ने पारीमैच और 1एक्सबेट से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

म्यूल खातों की समस्या ने भुगतान व्यवस्था में भी बदलाव को मजबूर किया. भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआइ) ने बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को यूपीआइ लेनदेन के लिए रियल-टाइम धोखाधड़ी जोखिम प्रणाली लागू करने का निर्देश दिया.

आरबीआइ के एआइ आधारित म्यूलहंटर.एआइ को 53 में से 26 बैंक अपना चुके हैं और अब इसमें भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र की रजिस्ट्री से संदिग्ध पहचान संबंधी जानकारी डाली जा रही है. अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआइ को म्यूल खातों के लिए मानक प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया, जिसमें अस्थायी रूप से डेबिट रोकना भी शामिल है.

महादेव से जुड़ी व्यापक जांच में ईडी ने 116 आरोपियों को नामजद किया है. इनमें इस सितंबर दाखिल छठी अभियोजन शिकायत के 42 आरोपी शामिल हैं. एजेंसी ने 14 गिरफ्तारियां की हैं और कम से कम 4,336 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त या कुर्क की है.

उधर, सीबीआइ ने करीब 100 आरोपियों को नामजद करते हुए आठ आरोपपत्र दाखिल किए हैं. उसने चंद्राकर के सहयोगी अभिषेक कुमार को 24 सितंबर को दुबई से हैदराबाद हवाई अड्डे पर उतरते ही हिरासत में ले लिया.

चंद्राकर खुद अलग-अलग देशों में घूमते हुए भारतीय अधिकारियों की पहुंच से बाहर रहा है. उसे पहले दुबई में हिरासत में लिया गया था, लेकिन भारत की प्रत्यर्पण मांग पर अमल न होने के बाद रिहा कर दिया गया. भारत अब ओमान से उसके प्रत्यर्पण की कोशिश कर रहा है, मगर वहां का कानून पासपोर्ट मामले की कार्रवाई पूरी होने तक उसे सौंपने की इजाजत नहीं देता.

इससे उसकी वापसी में देर हो सकती है. इंडिया टुडे से बात करने वाले ईडी अधिकारियों के मुताबिक, चंद्राकर ने गवाह संरक्षण के बदले नेटवर्क की जानकारी देने की पेशकश की है.
उसके सह-संस्थापक रवि उप्पल के बारे में सरकार ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वह कथित रूप से “दुबई से फरार” हो गया.

जनवरी में उसने कथित तौर पर इंटरपोल आयोग के सामने अपने खिलाफ जारी रेड नोटिस को चुनौती देते हुए मामले को राजनीति से प्रेरित बताया. उसका ठिकाना अब भी अज्ञात है. वैसे, यहां नामित किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया है. ईडी के आरोपों की अदालत में जांच अभी बाकी है और उसकी अस्थायी कुर्की भी आगे की समीक्षा के अधीन है.

कार्रवाई ने प्रवर्तन की मुश्किलें भी उजागर की हैं. भुगतान एग्रीगेटर और बैंक भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में वैध और जरूरी भूमिका निभाते हैं. अपराधियों ने उनकी सेवाओं का इस्तेमाल किया, केवल इससे यह साबित नहीं होता कि संस्थाएं या उनके अधिकारी जानबूझकर गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल थे.

इसलिए सफलता का असली पैमाना सिर्फ प्रतिबंधित ऐप, ब्लॉक की गई वेबसाइटों या फ्रीज किए गए बैंक खातों की संख्या नहीं होगी. असल कसौटी यह होगी कि भारत विदेशी सट्टा सिंडिकेटों को ध्वस्त कर पाता है या नहीं और उनके घरेलू संरक्षकों को कानून के शिकंजे में ला पाता है या नहीं.

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