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बांग्लादेश के लिए कपड़ा मजदूरों का आंदोलन संभालना क्यों हुआ मुश्किल?

बांग्लादेश में न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर सैकड़ों कपड़ा कारखानों में कामकाज ठप है. मजदूरों और कारखाना मालिकों के बीच टकराव के साथ सरकार के सामने 40 अरब डॉलर के निर्यात उद्योग और लाखों श्रमिकों के हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है

बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन करते मजदूर (फाइल फोटो)
अपडेटेड 6 नवंबर , 2026

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को एक बड़ा झटका लगने की आशंका पैदा हो गई है. इसकी वजह है सैकड़ों कपड़ा कारखानों का बंद होना. दरअसल यहां पिछले कुछ दिनों से मजदूर वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं.

बांग्लादेश के प्रमुख बंगाली दैनिक प्रोथोम आलो की रिपोर्ट के मुताबिक ढाका जिले के गाजीपुर और सावर में 414 कारखानों में कामकाज रोक दिया गया. कुछ अन्य अनुमानों के मुताबिक, बंद कारखानों की संख्या बढ़कर 500-600 तक पहुंच सकती है. विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए. गाजीपुर, मीरपुर और सावर में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जोरदार झड़पों और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं.

रिपोर्टों के मुताबिक, गाजीपुर में वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ की घटना का वीडियो बना रहे लैला गारमेंट्स के 21 वर्षीय मजदूर तौफीक शेख (कुछ रिपोर्टों में तौफीक हुसैन) पर हमला किया गया. गंभीर चोटों के कारण उसकी मौत हो गई.

करीब 40 अरब डॉलर का रेडीमेड गारमेंट उद्योग बांग्लादेश की कुल निर्यात कमाई में लगभग 80-84 फीसदी का योगदान देता है. बांग्लादेश बैंक की तिमाही समीक्षा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इस उद्योग की हिस्सेदारी 8.5 फीसदी रही. इससे करीब 40 लाख लोगों को रोजगार मिलता है.

3 नवंबर को वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन का चौथा दिन था. इस दिन प्रदर्शनकारियों ने ढाका-टांगाइल हाईवे पर रास्ता रोक दिया. मजदूरों की मांग है कि न्यूनतम वेतन 12,500 टका से बढ़ाकर 30,000 टका किया जाए. इससे पहले 1 नवंबर को बांग्लादेश सरकार ने कपड़ा मजदूरों के वेतन की समीक्षा के लिए एक वेतन बोर्ड का गठन किया था. साथ ही कर्मचारियों से काम पर लौटने की अपील की थी.

बांग्लादेश की निर्यात कमाई में कपड़ा उद्योग की हिस्सेदारी 80-84 फीसद तक है (सांकेतिक तस्वीर)
बांग्लादेश की निर्यात कमाई में कपड़ा उद्योग की हिस्सेदारी 80-84 फीसद तक है (सांकेतिक तस्वीर)

मजदूरों का कहना है कि उनकी मांग की वजह देश में तेजी से बढ़ती महंगाई है. प्रदर्शन कर रहे मजदूर माहिन हुसैन ने कहा, "जब रहने-खाने का खर्च आसमान छू रहा है तो इतनी कम तनख्वाह में हम अपने परिवार का गुजारा कैसे करें?"

सितंबर तक देश में सालाना आधार पर महंगाई दर 8.34 फीसदी थी. यह अगस्त में दर्ज 8.26 फीसदी से थोड़ी अधिक थी. सब्जियों की कीमतें घटने से खाद्य पदार्थों और गैर-अल्कोहल पेय पदार्थों की महंगाई दर 7.22 फीसदी पर रही. हालांकि प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतें ऊंची बनी रहीं. इसके अलावा, ऊर्जा और ईंधन की कीमतें बढ़ने से गैर-खाद्य महंगाई दर भी 9.22 फीसदी पर ऊंची बनी रही.

सरकार ने छह सदस्यों वाले न्यूनतम वेतन बोर्ड का गठन किया है. इसके बाद उसने मजदूरों से काम पर लौटने की अपील की. इस बोर्ड में नियोक्ताओं और मजदूरों, दोनों के प्रतिनिधि शामिल हैं. मजदूरों के प्रतिनिधि के तौर पर बाबुल अख्तर को नियुक्त किया गया है. बोर्ड ने घोषणा की है कि वह दिसंबर तक वेतन का नया ढांचा तय कर देगा. यह जनवरी से लागू होगा. हालांकि इससे विरोध प्रदर्शन थमने के आसार नहीं दिखे हैं.

कारखाना मालिकों ने गृह मंत्रालय से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की मांग की है. वहीं मजदूरों के प्रतिनिधियों ने वेतन बोर्ड की जल्द बैठक बुलाने की मांग की है. उन्होंने यह भरोसा भी मांगा है कि आंदोलन में शामिल होने के कारण मजदूरों को परेशान नहीं किया जाएगा और न ही मनमाने ढंग से गिरफ्तार किया जाएगा.

हालांकि मौजूदा न्यूनतम वेतन में करीब 140 फीसदी बढ़ोतरी की मांग ने इसे आर्थिक रूप से लागू करने की क्षमता पर भी सवाल खड़े किए हैं. बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक बांग्लादेश बैंक के पूर्व गवर्नर अहसान मंसूर कहते हैं, "12,500 टका से बढ़ाकर 30,000 टका करने की मांग बेतुकी है. अगर सरकार इस मांग को मान लेती है तो यह आर्थिक रूप से बड़ी भूल होगी. तीनों पक्षों की बैठक के जरिए बीच का रास्ता निकालना होगा."

मंसूर ने बताया कि पूर्ववर्ती अवामी लीग सरकार ने एक समय न्यूनतम वेतन में हर साल कुल 13-14 फीसदी बढ़ोतरी करने की व्यवस्था पर विचार किया था. मंसूर ने कहा, "यह व्यावहारिक नहीं है. इतनी बढ़ोतरी का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है."

इस आंदोलन का समय ऐसे उद्योग के लिए खास मायने रखता है, जो बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर और तय समय पर उत्पादन पूरा करने पर निर्भर है. मौजूदा बाधा ऐसे वक्त आई है, जब वसंत और गर्मियों के लिए निर्यात किए जाने वाले कपड़ों का उत्पादन चल रहा है. 

बांग्लादेश एचएंडएम, जारा, वॉलमार्ट और प्राइमार्क जैसे दुनिया के बड़े फैशन रिटेल कारोबारियों को कपड़ों की आपूर्ति करता है. अगर कामकाज लंबे समय तक बाधित रहता है तो अंतरराष्ट्रीय खरीदार बांग्लादेश से खरीदारी की अपनी व्यवस्था पर फिर विचार कर सकते हैं. वे अपने ऑर्डर दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों के कारखानों को भी दे सकते हैं.

उद्योग से जुड़े लोगों ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि अगर कारखाने बंद रहे, तो उनके लिए बैंक का कर्ज चुकाना और मजदूरों को वेतन देना मुश्किल हो जाएगा. बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (BGMEA) ने चेतावनी दी है कि अगर उत्पादन दोबारा शुरू नहीं हो पाया तो कारखानों को 'काम नहीं तो वेतन नहीं' का प्रावधान लागू करना पड़ सकता है.

BGMEA के पूर्व निदेशक एमडी मोहिउद्दीन रुबेल के मुताबिक, आर्थिक नुकसान कितना हुआ है, इसका आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी. रुबेल ने कहा, "लेकिन यह स्वाभाविक है कि किसी भी कारखाने में एक दिन काम बंद रहने का असर पड़ता है. हालांकि, अगर कुछ ही दिनों तक कामकाज बाधित रहता है तो नुकसान की भरपाई की जा सकती है." उन्होंने यह भी कहा कि सभी कारखाने एक साथ बंद नहीं हुए हैं. उनके मुताबिक, "जिन इलाकों में झड़पें हो रही हैं वहां सुरक्षा कारणों से कारखाने बंद किए जा रहे हैं."

बांग्लादेश में न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग नई नहीं है. नवंबर 2023 में भी देश में कपड़ा मजदूरों ने इसी तरह का हिंसक आंदोलन किया था. उस समय शेख हसीना की सरकार सत्ता में थी. आंदोलन के दौरान चार मजदूरों की मौत हुई थी. इनमें से तीन की मौत कथित तौर पर पुलिस कार्रवाई में हुई थी, जबकि एक की जान आगजनी की घटना में गई थी. 7 नवंबर को वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बाद सरकार ने न्यूनतम मासिक वेतन 8,000 टका से बढ़ाकर 12,500 टका कर दिया था. यह 50 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी थी.

मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने भी मजदूरों की शिकायतों को दूर करने की कोशिश की थी. हालांकि उसने न्यूनतम मूल वेतन में बदलाव नहीं किया. जनवरी 2025 में सरकार ने कपड़ा मजदूरों की सालाना वेतन वृद्धि 5 फीसदी से बढ़ाकर 9 फीसदी कर दी थी. लेकिन न्यूनतम मासिक वेतन 12,500 टका ही रहा.

बार-बार हो रहे ये विरोध प्रदर्शन बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग की एक गहरी समस्या की ओर इशारा करते हैं. देश की अर्थव्यवस्था कम लागत पर कपड़े बनाने वाले उद्योग पर निर्भर है लेकिन इस उद्योग को चलाने वाले मजदूरों का खर्च लगातार बढ़ रहा है. निर्माताओं का तर्क है कि वेतन में बड़ी बढ़ोतरी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. वहीं मजदूरों का कहना है कि महंगाई के मुकाबले मौजूदा वेतन लगातार नाकाफी होता जा रहा है.

अवामी लीग और उसके नेता इन प्रदर्शनों और उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार की नाकामी के तौर पर पेश कर रहे हैं. सरकार के सामने ऐसी सहमति बनाने की चुनौती है, जिससे न तो कपड़ा निर्माता अपना कारोबार समेटने को मजबूर हों और न ही मजदूरों की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ें. अगर टकराव लंबा खिंचता है, तो दोनों पक्षों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. मजदूरों की रोजाना की कमाई छिन सकती है, जबकि कारखाना मालिकों को उत्पादन और निर्यात के ऑर्डर गंवाने पड़ सकते हैं. इससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा भी कमजोर हो सकता है.

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