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'सतलुज' बताती है कि इतिहास बीतता नहीं, बार-बार लौटता है

निर्देशक हनी त्रेहान और दिलजीत दोसांझ की मुख्य भूमिका वाली ‘सतलुज’ इतिहास, सत्ता और इंसाफ की एक बेचैन कर देने वाली कहानी है

'सतलुज' के अपने किरदार में दिलजीत दोसांझ
अपडेटेड 7 जुलाई , 2026

हनी त्रेहान की फिल्म सतलुज  पंजाब के उथल-पुथल भरे अतीत से नजरें नहीं चुराती. यह उन लोगों को भी कटघरे में खड़ा करती है जिन्हें अक्सर जवाबदेही से बचा लिया जाता है. सेंसर बोर्ड के साथ लंबी लड़ाई झेल चुकी इस फिल्म में अर्जुन रामपाल का सीबीआई अधिकारी और नैरेटर एक जगह कहता भी है, “हिसाब तो पंजाब का है ही कॉम्प्लिकेटेड.”

असल जिंदगी के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा, जिनका किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है, की तरह त्रेहान भी अपने मकसद पर डटे रहे. उन्होंने सत्ता के आगे झुकने से इनकार किया. इस मामले में उनका सामना सेंसर बोर्ड से था. उनकी यह जिद आखिरकार रंग लाई और पहले पंजाब '95  नाम से बनी यह फिल्म सतलुज  के रूप में उसी कट में ZEE5 पर रिलीज हुई, जैसा उसका निर्माता चाहता था. हालांकि यह रिलीज ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी.

सतलुज  देखना आसान नहीं है लेकिन है जरूरी. त्रेहान ने लेखक निरेन भट्ट और उत्सव मैत्रा के साथ मिलकर डर और बेखौफ सत्ता के माहौल को दिखाया है. फिल्म में पंजाब पुलिस को उग्रवादियों के सफाए के नाम पर तबाही मचाते हुए दिखाया गया है. फिल्म में कई बेचैन कर देने वाले दृश्य हैं. शुरुआती सीन ही झकझोर देता है. यह दिखाता है कि उस दौर में कैसे बर्बरता सामान्य बात बन गई थी और नैतिकता पूरी तरह खत्म हो चुकी थी. हताहत, लापता लोग, लावारिस शव और फर्जी मुठभेड़ जैसे शब्द रोजमर्रा की भाषा बन जाते हैं. फिर एक आदमी, जसवंत, जवाबदेही की मांग करता है.

जसवंत एक निडर कार्यकर्ता हैं. वह समाज की अंतरात्मा हैं और निस्वार्थ योद्धा भी. वे कठिन सवाल पूछते हैं, मुश्किल लड़ाई लड़ते हैं और उन परिवारों के लिए न्याय चाहते हैं जिन्होंने उग्रवाद विरोधी कार्रवाई में अपने बेटे, पिता, भाई, पति और दोस्तों को खो दिया. जसवंत ऐसे कार्यकर्ता हैं जिन्हें खुद सुर्खियों में आने से ज्यादा अपने मकसद को सामने लाने की चिंता है. दिलजीत दोसांझ ने इस किरदार की सादगी को पूरी ईमानदारी से अपनाया है. यहां न कोई भाषण है, न चीख-पुकार. सिर्फ ठंडे तथ्यों की सीधी प्रस्तुति है.

जैसे-जैसे जसवंत के आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है, वैसे-वैसे पुलिस की नजर उस शख्स पर टिक जाती है जिसे वह सबसे बड़ा सिरदर्द मानती है. पुलिस अधिकारी की भूमिका में सुविंदर विक्की ने शानदार अभिनय किया है. सतलुज जहां असहज सच सामने लाती है, वहीं यह उन कुछ अच्छे लोगों की दुखद नियति की नींव भी रखती है जो इस संघर्ष का हिस्सा बनते हैं.

सतलुज  दो हिस्सों में बंटी कहानी है. पहले हिस्से में एक व्यक्ति न्याय की तलाश करता है. दूसरे में कोई और उसी व्यक्ति के लिए न्याय चाहता है. लेकिन दोनों हिस्सों की बुनियाद एक ही है. हर कार्रवाई का अंजाम होता है और हिंसा, जो फिर हिंसा को जन्म देती है.

अर्जुन रामपाल सीबीआई अधिकारी की भूमिका में प्रभाव छोड़ते हैं. उनका किरदार एक ऐसे माहौल में पहुंचता है जहां हर तरफ दुश्मनी है और उसे लापता जसवंत का पता लगाना है. फिल्म कुछ जगह कमजोर भी पड़ती है क्योंकि वह जांच-पड़ताल पर आधारित कहानी और कोर्टरूम ड्रामा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है. लेकिन त्रेहान का धीमी रफ्तार वाला अंदाज समझ में आता है. न्याय की लड़ाई हमेशा लंबी, थकाने वाली और रुकावटों से भरी होती है. मंजिल भी अक्सर हाथ नहीं आती.

सतलुज  वेत्रिमारन की चर्चित तमिल फिल्म विसारणई  की तरह, सबसे असरदार तब बनती है जब वह दिखाती है कि कानून-व्यवस्था की रक्षा करने वाले ही हिंसा करने लगें और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करें तो क्या होता है. त्रेहान बड़ी बेरहमी और सटीकता से उन लोगों की पहचान करते हैं जिन्होंने पंजाब के संकट को बढ़ावा दिया, उससे फायदा उठाया और उसका लाभ लिया. लेखक इसे शांति के नाम पर चलने वाला ‘धंधा’ कहते हैं. फिल्म का सबसे बड़ा असर इस बात में है कि यह एक साधारण इंसान की बहादुरी पर रोशनी डालती है जिसका सबसे बड़ा 'अपराध' सिर्फ इतना था कि उसने बेबस लोगों की आवाज उठाई.

करीब तीन दशक पुरानी घटनाओं पर आधारित होने के बावजूद यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक और असरदार लगती है. शायद यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. जब आईपीएस अधिकारी बिट्टा के किरदार में कंवलजीत सिंह के मुंह से ‘विदेशी ताकतों के पपेट्स हैं’ और ‘प्रोपेगेंडा’ जैसे संवाद निकलते हैं. इनका इस्तेमाल सरकार की आलोचना करने वालों को चुप कराने के लिए किया जाता है या वहीं जब वह अपने कदमों को सही ठहराने के लिए 'डेमोक्रेसी' का सहारा लेता है तो यह सब आज के दौर का जाना-पहचाना घटनाक्रम लगता है. फिल्म की शुरुआत में अर्जुन रामपाल का नैरेटर कहता है, “बहती हुई लाशें बहता हुआ इतिहास होती हैं.” सतलुज  याद दिलाती है कि इतिहास चाहे जितना भी दर्दनाक क्यों न हो, उसे कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए.

जरूरी बात : सतलुज  की रिलीज बहुत कम समय के लिए रही. ZEE5 ने एक बयान जारी कर कहा कि जबरदस्त प्रतिक्रिया मिलने के बावजूद उसे फिल्म हटानी पड़ रही है. भारत में फिल्म हटाने की वजह ‘करंट डेवलपमेंट्स’ बताई गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि वे क्या थे. हालांकि प्लेटफॉर्म ने कहा कि वह ‘उचित प्रक्रिया’ का पालन करते हुए फिल्म को वापस लाने के लिए हर रास्ता तलाशेगा. इसके बावजूद इतना तय है कि फिल्म का बिना कट वाला संस्करण रिलीज होना कुछ लोगों को इतना असहज कर गया कि ऐसी प्रतिक्रिया जरूरी समझी गई.

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