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पिता के एक ताने से एशियन गेम्स के सोने तक, प्राची चौधरी का सफर

सहारनपुर के झबीरण गांव की प्राची चौधरी ने जापान में चल रहे एशियन गेम्स में भारतीय टीम के साथ महिलाओं की 4x400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीता है

प्राची चौधरी एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतने के बाद
अपडेटेड 1 अक्टूबर , 2026

सहारनपुर के झबीरण गांव की प्राची चौधरी के लिए 29 सितंबर सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि वर्षों की मेहनत और एक अधूरे वादे के पूरा होने का दिन बन गया. जापान में चल रहे एशियन गेम्स में प्राची ने भारतीय टीम के साथ महिलाओं की 4x400 मीटर रिले में दौड़ते हुए स्वर्ण पदक जीता. 

कुछ वर्ष पहले चीन के हांगझोऊ में हुए एशियन गेम्स में जब प्राची 4x400 मीटर रिले टीम का हिस्सा थीं तब भारत को रजत पदक मिला था. उस समय उनके पिता जयवीर सिंह ने बेटी से सिर्फ इतना कहा था, "बेटी, मजा नहीं आया." पिता के ये शब्द प्राची के मन में इस तरह बस गए कि उन्होंने अगली बार एशियन गेम्स से सोना लेकर लौटने का लक्ष्य तय कर लिया.

हांगझोऊ में प्राची के साथ विथ्या रामराज, ऐश्वर्या मिश्रा और सुभा वेंकटेशन टीम में थीं. भारतीय टीम ने 3 मिनट 27.85 सेकंड का समय निकाला था और उसे रजत पदक से संतोष करना पड़ा था. इस बार प्राची का लक्ष्य सिर्फ टीम के साथ दौड़ना नहीं था, बल्कि उस रजत को स्वर्ण में बदलना था. 

एशियन गेम्स के इसी संस्करण में वे महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में कांस्य पदक भी जीत चुकी हैं. यानी एक ही प्रतियोगिता में उनके खाते में व्यक्तिगत स्पर्धा का कांस्य और रिले का स्वर्ण आ चुका है.

प्राची के परिवार के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनका सफर किसी बड़े शहर की आधुनिक खेल सुविधाओं से नहीं बल्कि एक किसान परिवार और छोटे से गांव से शुरू हुआ था. पिता जयवीर सिंह किसान हैं और मां राजेश गृहिणी हैं. 

भारत की 4x400 मीटर रिले टीम जिसने एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक जीता है
भारत की 4x400 मीटर रिले टीम जिसने एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक जीता है

परिवार के लोगों के मुताबिक प्राची ने दस वर्ष की उम्र में दौड़ना शुरू किया था. चाचा सचिन बताते हैं कि बचपन से ही प्राची में दौड़ को लेकर अलग जुनून था. जिला स्तर से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे प्रदेश, राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचा. 

करीबियों के मुताबिक प्राची के शुरुआती दिनों में संसाधनों की कमी भी थी. एक समय ऐसा आया जब पिता ने उधार लेकर बेटी के लिए जूते खरीदे. इन्हीं जूतों से प्राची ने ट्रैक पर अभ्यास शुरू किया. उस दौर में शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि इन्हीं संघर्षों से निकली एक गांव की लड़की आगे चलकर भारत के लिए एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतेगी.

दस साल की उम्र में चुना ट्रैक

प्राची ने एथलेटिक्स को महज शौक के तौर पर शुरू किया था लेकिन जल्द ही दौड़ उनकी जिंदगी का लक्ष्य बन गई. चाचा सचिन के मुताबिक दस वर्ष की उम्र से शुरू हुआ यह सफर लगातार अभ्यास और अनुशासन के साथ आगे बढ़ता गया. प्राची ने जिला स्तर की प्रतियोगिताओं से अपनी पहचान बनानी शुरू की और फिर राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने लगीं. 

2018 में राज्य स्तर की प्रतियोगिता में उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता. वर्ष 2019 में दोहा, कतर में हुई एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक हासिल किया. इसी वर्ष चेक गणराज्य में हुई प्रतियोगिता में भी उनके नाम एक स्वर्ण और एक रजत पदक रहा. 

लगातार बेहतर प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय एथलेटिक्स के अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया. 400 मीटर उनकी प्रमुख स्पर्धाओं में रही है. ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित कलिंगा स्पोर्ट्स स्टेडियम में हुई पांचवीं राष्ट्रीय सीनियर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में प्राची ने उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में पहला स्थान हासिल किया. उन्होंने 400 मीटर की दौड़ 53.24 सेकंड में पूरी की. 

एशियन गेम्स के लिए इस स्पर्धा का न्यूनतम मानक 53.72 सेकंड था. भुवनेश्वर के बाद प्राची ने एशियन गेम्स की तैयारी को अपना अगला बड़ा लक्ष्य बना लिया. प्राची के चाचा बताते हैं कि अभ्यास के दौरान उन्होंने कभी जी नहीं चुराया. दौड़ की तकनीक हो या फिटनेस, वह छोटी से छोटी कमी को सुधारने की कोशिश करती थीं. इसी मेहनत का नतीजा था कि वर्ष 2023 में हांगझोऊ एशियन गेम्स की 4x400 मीटर रिले टीम में उन्हें जगह मिली. भारतीय टीम ने रजत पदक जीता. 

यह पदक प्राची के अंतरराष्ट्रीय सफर में बड़ी उपलब्धि था, लेकिन उनके लिए कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. पिता का वह एक वाक्य उन्हें बार-बार याद आता रहा. रजत के बाद अब लक्ष्य स्वर्ण था. इसके बाद उन्होंने 2024 के पेरिस ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया. 4x400 मीटर रिले में भाग लेने वाली भारतीय टीम का हिस्सा बनना अपने आप में उनके करियर की बड़ी उपलब्धि थी. 

हालांकि पेरिस में उन्हें पदक नहीं मिला लेकिन ओलंपिक तक पहुंचने वाली सहारनपुर की पहली महिला एथलीट के रूप में उन्होंने जिले के खेल इतिहास में अपनी जगह बनाई.

अब पुलिस की वर्दी का सपना

प्राची का एशियन गेम्स का सफर सिर्फ पदकों के रंग बदलने की कहानी नहीं है. यह उस लक्ष्य का भी उदाहरण है जिसे उन्होंने वर्षों पहले तय किया था. हांगझोऊ के रजत पदक के बाद उनके पिता की प्रतिक्रिया ने उन्हें निराश करने के बजाय आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. 

इस बार जब भारतीय टीम ने 4x400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीता तो उनके परिवार और सहारनपुर के खेल प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई. प्राची के करीबियों के मुताबिक उनका सपना सिर्फ एथलेटिक्स में पदक जीतने तक सीमित नहीं है. वे पुलिस की वर्दी पहनकर डीएसपी बनना चाहती हैं. वर्तमान में वे जिला युवा कल्याण एवं प्रादेशिक विकास दल अधिकारी के पद पर तैनात हैं. रजत पदक जीतने के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी मिली थी और उनकी पोस्टिंग लखनऊ में रही है. 

एशियन गेम्स के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने पुलिस की वर्दी के लिए माप भी दिया था. अब स्वर्ण पदक जीतने के बाद परिवार और करीबियों को उम्मीद है कि उनका यह सपना भी आगे पूरा हो सकेगा. प्राची को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जनवरी में रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड से भी सम्मानित किया गया. 

एक किसान परिवार की बेटी से अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता और ओलंपियन बनने तक का प्राची का सफर कई पड़ावों से होकर गुजरा है. दस साल की उम्र में शुरू हुई दौड़ ने उन्हें पहले जिले से प्रदेश तक पहुंचाया फिर देश की टीम तक और आखिरकार ओलंपिक और एशियन गेम्स के मंच तक. 

आज प्राची चौधरी के पास एशियन गेम्स का स्वर्ण है, लेकिन उनकी कहानी में सबसे ज्यादा चमक उस पदक की नहीं बल्कि उस रास्ते की है जिस पर चलते हुए वह यहां तक पहुंचीं. कभी उधार लेकर खरीदे गए जूतों से शुरू हुआ अभ्यास अब अंतरराष्ट्रीय ट्रैक पर भारत के लिए सोना जीतने तक पहुंच चुका है.

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