
अगर किसी शो को बड़े पर्दे पर लाने की सबसे ज्यादा जरूरत थी तो वह 'मिर्जापुर' था. देसी पृष्ठभूमि में बनी 'द गॉडफादर' की इस कहानी में राजनीति, हिंसा, गाली-गलौज, इलाके की जंग और सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैलने वाले डायलॉग्स थे.
यही वजह थी कि इसे तुरंत बड़ी संख्या में दर्शक मिले. तीसरा सीजन सबसे कमजोर रहा था. ऐसे में मेकर्स जानते थे कि दर्शकों को फिर से जोड़ने के लिए क्या करना होगा : मुन्ना (दिव्येंदु) की वापसी हुई.
2018 में सेट 'मिर्जापुर: द मूवी' का एक बड़ा हिस्सा किरदारों को स्थापित करने और उन लोगों के लिए इस दुनिया को समझाने में जाता है जो पूर्वांचल की राजनीति के 'गंदे' खेल से परिचित नहीं हैं.
लेकिन फिल्म बार-बार याद दिलाती है कि मुन्ना ही इसकी धुरी है. फिल्म के कुछ गिने-चुने अच्छे और मजेदार पल भी दिव्येंदु के हिस्से में आते हैं.
एक सीन में वह बेकरी से जन्मदिन का केक लेने जाता है और वहां के मालिक को डांटने लगता है. दूसरे में वह सीटी बजाकर एक नेता को परेशान करता है. एक और सीन में वह फेशियल कराने जाता है लेकिन पता चलता है कि उसका दुश्मन उससे पहले ही वहां आकर फेशियल करा चुका है.
मुन्ना की शेखी यहां खुलकर सामने आती है. उसके हर कारनामे और डायलॉग से उसकी हैसियत याद दिलाई जाती है. एक अहम डील के सिलसिले में जब उसे जैसलमेर जाना होता है, तो वह कहता है, "जैसलमेर ने हमको देखा नहीं है."
लेकिन यही फिल्म का अच्छा हिस्सा है. 'मिर्जापुर' कई बार इस बात की किताब जैसा लगता है कि सत्ता की गद्दी पर कैसे बैठना है और उसे कैसे बनाए रखना है. बिजनेसमैन-गैंगस्टर कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) की तरफ से ऐसे कई सूत्र दिए जाते हैं.

ऐसा लगता है कि मिर्जापुर के बड़े बॉस होने के साथ-साथ वे ‘गद्दी का नियम’ नाम की किताब के लेखक और प्रकाशक भी हैं.
लेखकों ने इस बात को बेहतर तरीके से सामने रखा है कि 'मिर्जापुर' सिर्फ गद्दी की लड़ाई नहीं है. यह बड़े पैमाने पर निराश पिताओं और नाराज बेटों की कहानी भी है. मुन्ना और गुड्डू (अली फजल) अपने-अपने पिता से स्वीकृति और प्यार पाने की कोशिश कर रहे हैं.
कालीन भैया कहते भी हैं, "काबिल औलाद बड़ी मुश्किल से मिलती है; कभी मिलती भी नहीं." वे इस बात का दुख जताते हैं कि गद्दी संभालने के लिए उन्हें कोई काबिल वारिस नहीं मिला.
पंकज त्रिपाठी और दिव्येंदु के शानदार अभिनय से यह फैमिली ड्रामा हंसाता भी है और मुन्ना के लिए सहानुभूति भी पैदा करता है. दो बिल्कुल अलग भावनाओं के बीच आसानी से आने-जाने की यही क्षमता फिल्म को असरदार बनाती है.
लेकिन 'मिर्जापुर' खास तौर पर रोमांस के मामले में कमजोर पड़ती है. कहानी में इसका असर महसूस ही नहीं होता क्योंकि इसे ठीक से डेवलप नहीं किया गया है. श्रिया पिलगांवकर की स्वीटी को एक डांस करने और गुड्डू के साथ थोड़ी फ्लर्टिंग करने का मौका मिलता है.
वहीं श्वेता त्रिपाठी की गोलू को इससे भी कम स्क्रीन टाइम मिला है. जिस अभिनेत्री के किरदार को एक पक्की कहानी दी गई है, वे हैं रसिका दुग्गल. हालांकि उनकी कहानी आखिरी एक्ट में जाकर सामने आती है.
यह उन दुर्लभ मौकों में से एक है जब किसी किरदार की बैकस्टोरी इसलिए दिखाई जाती है ताकि दर्शक एक अहम किरदार की सोच और उसके फैसलों को बेहतर ढंग से समझ सकें. अफसोस, बाकी किरदारों को इतनी तवज्जो नहीं मिली.
इसके बजाय एक नया किरदार बब्बन (रवि किशन) पेश किया गया है. वह जैसलमेर में रहने वाला ड्रग डीलर है जो कालीन भैया के दुश्मनों के साथ मिलकर मिर्जापुर की गद्दी पर हिस्सेदारी चाहता है.
हालांकि रवि किशन के ज्यादातर सीन सपोर्टिंग कास्ट के साथ हैं. अहम किरदारों के साथ उसका आमना-सामना सीमित है और काफी देर से होता है. इस वजह से बब्बन को लेकर न तो कोई बड़ा खतरा महसूस होता है, न ही टकराव का असर पैदा होता है.
पुनीत कृष्णा के डायलॉग्स में फिर से कई मीम बनने की पूरी क्षमता है. कालीन भैया का यह डायलॉग, "चू*** है ये इंपोर्टेंट नहीं है; हमारा बेटा है ये इंपोर्टेंट है" सुनते ही हॉल में दर्शकों की तरफ से जोरदार तालियां आईं.
किरदारों की महत्वाकांक्षाओं को दिखाने के लिए अंग्रेजी का भी चतुराई से इस्तेमाल किया गया है. जैसे ‘विन-विन सिचुएशन’ और ‘सेल्फ-असेसमेंट कीजिए.’
गुड्डू यहां अजीब से 'इनक्रेडिबल हल्क' मोड में नजर आता है. वह बार-बार अपनी टी-शर्ट उतारकर अपनी गठीली बॉडी दिखाता है. विक्रांत मैसी की जगह बबलू का किरदार निभा रहे जितेंद्र कुमार को अपनी छाप छोड़ने का ज्यादा मौका नहीं मिलता.
डायरेक्टर गुरमीत सिंह ने फैनबेस को ध्यान में रखते हुए शूटआउट, पीठ में छुरा घोंपना, जाति की राजनीति और गुस्से से भरी युवा पीढ़ी जैसे 'मिर्जापुर' के जाने-पहचाने मसाले शामिल किए हैं.
लेकिन गाने, खासकर बीच-बीच में आने वाले पंजाबी हिप-हॉप ट्रैक, कम से कम कहें तो कहानी से मेल नहीं खाते. तीन घंटे 17 मिनट की 'मिर्जापुर: द मूवी' किसी दिलचस्प कहानी को बताने से ज्यादा अपने कुछ रंगीन किरदारों को भुनाने की कवायद लगती है.

